जन्मदिवस विशेष : उत्तराखंड की राजनीति के ‘ध्रुवतारे’ डॉ. शिवानंद नौटियाल, जिन्होंने कर्णप्रयाग से 6 बार चुनाव जीतकर रचा था इतिहास


आलोक श्रीवास्तव
Highlights
- जन्मदिन विशेष: 26 जून 1926 को पौड़ी के कोटला गांव में हुआ था डॉ. शिवानंद नौटियाल का जन्म
- चुनावी रिकॉर्ड: पौड़ी से 2 और कर्णप्रयाग सीट से रिकॉर्ड 6 बार विधायक चुने गए
- बड़ा राजनैतिक कद: 1979 में उत्तर प्रदेश (संयुक्त) सरकार में उच्च शिक्षा एवं पर्वतीय विकास मंत्री रहे
- शिक्षा को बनाया हथियार: राजनीति को व्यवसाय नहीं बल्कि समाज सुधार का पवित्र माध्यम माना
भारतीय राजनीति के समकालीन इतिहास में ऐसे गिने-चुने ही राजनेता हुए हैं, जिन्हें उनके पद या कद से नहीं, बल्कि जन-सरोकारों से जुड़े उनके ऐतिहासिक कार्यों की वजह से याद किया जाता है।
डॉ. शिवानंद नौटियाल सियासत के उसी ध्रुवतारे का नाम है, जिन्होंने राजनीति की पथरीली पिच पर आदर्शों और शुचिता का एक ऐसा प्रतिमान स्थापित किया, जिसकी चमक आज भी फीकी नहीं पड़ी है।
डॉ. नौटियाल महज़ सत्ता के गलियारों में जगह बनाने वाले नेता नहीं थे। उन्होंने अपने व्यक्तिगत ऐश्वर्य के लिए नहीं, बल्कि समाज के उस अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के लिए सपने देखे थे, जिसकी तरफ़ बरसों से मुख्यधारा की राजनीति ने अपनी नज़रें फेर रखी थीं।
शिक्षा को बनाया बदलाव का सबसे बड़ा हथियार
डॉ. शिवानंद नौटियाल इस बुनियादी सच को बख़ूबी समझते थे कि समाज का वास्तविक उत्थान केवल नारों से नहीं, बल्कि ज्ञान के उजाले से ही संभव है। यही वजह थी कि उन्होंने बच्चों की बुनियादी शिक्षा को अपने जीवन का मुख्य ध्येय बनाया।
उत्तराखंड जैसे विषम भौगोलिक और सीमित संसाधनों वाले क्षेत्र में, जहां अभावों की धुंध गहरी थी, वहां उन्होंने गरीब-गुरबों और वंचितों के हक की आवाज़ बुलंद की।
बुनियादीज़रूरतों (रोटी, कपड़ा और मकान) के साथ-साथ उन्होंने इस बात पर सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया कि हर गरीब के बच्चे की पहुंच गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक कैसे हो। वे मानते थे कि
शिक्षा ही वह इकलौती चाबी है, जो पीढ़ियों की ग़रीबी के ताले को खोल सकती है।”
पौड़ी से विधानसभा तक का प्रेरक सफर और सियासी रिकॉर्ड
डॉ. शिवानंद नौटियाल का जन्म 26 जून 1926 को पौड़ी जनपद के ग्राम कोटला में हुआ था। एक साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से निकलकर उन्होंने शिक्षा और समाजसेवा के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई।
- सक्रिय राजनीति में प्रवेश: वर्ष 1967 में उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा।
- पहली बार बने विधायक: इसके दो वर्ष बाद, 1969 में वह पौड़ी गढ़वाल क्षेत्र से विधायक निर्वाचित होकर विधानसभा पहुंचे।
- कर्णप्रयाग से रिकॉर्ड जीत: वह जनभावनाओं के ऐसे पारखी थे कि पौड़ी से 2 बार और कर्णप्रयाग जैसी प्रतिष्ठित सीट से रिकॉर्ड 6 बार विधायक चुनकर विधानसभा पहुंचे।

उनकी इसी अद्वितीय नेतृत्व क्षमता और दूरदर्शिता को देखते हुए साल 1979 में उन्हें उत्तर प्रदेश (संयुक्त) सरकार में उच्च शिक्षा एवं पर्वतीय विकास मंत्री की अहम जिम्मेदारी सौंपी गई।

राजनीति को माना ‘पवित्र मिशन’, साहित्य में भी छोड़ी छाप
आमतौर पर लोग राजनीति को शक्ति और प्रभाव के माध्यम के रूप में देखते हैं, लेकिन डॉ. नौटियाल के लिए राजनीति कोई व्यवसाय या शौक नहीं, बल्कि एक पवित्र मिशन थी। समकालीन दौर में जहां जनप्रतिनिधि अक्सर चुनाव जीतने के बाद अपनी ही जनता से दूरी बना लेते हैं, वहीं उनका संपूर्ण जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि यदि इच्छाशक्ति दृढ़ हो, तो राजनीति को लोक-कल्याण का सबसे सशक्त माध्यम बनाया जा सकता है।

वे केवल एक कद्दावर राजनेता ही नहीं थे, बल्कि एक प्रखर बुद्धिजीवी और लेखक भी थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में कई कालजयी पुस्तकों की रचना कर साहित्य जगत में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी। आज उनकी जयंती के अवसर पर पहाड़ के विकास में उनके योगदान को शिद्दत से याद किया जा रहा है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और उत्तराखंड की राजनीति पर अपनी पैनी नजर रखते है)



