चुनाव से पहले पार्टी बदलना कितना फायदेमंद? 2019 और 2024 के आंकड़ों ने तोड़ दिया बड़ा सियासी भ्रम

नई दिल्ली: भारतीय राजनीति में चुनाव से ठीक पहले नेताओं का पार्टी बदलना कोई नई बात नहीं है। हर चुनाव से पहले कई बड़े नेता सत्ता की संभावनाओं को देखते हुए नया राजनीतिक ठिकाना चुन लेते हैं। माना जाता है कि मजबूत पार्टी का टिकट मिलते ही जीत की राह आसान हो जाती है, लेकिन 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों के आंकड़े इस धारणा को गलत साबित करते हैं।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और चुनावी विश्लेषण बताते हैं कि दल बदलकर चुनाव लड़ने वाले अधिकांश नेताओं को जनता ने स्वीकार नहीं किया। खासकर लोकसभा चुनाव में ऐसे उम्मीदवारों की जीत का प्रतिशत बेहद कम रहा।

ADR की रिपोर्ट के मुताबिक, 2016 से 2020 के बीच 12 मौजूदा लोकसभा सांसदों ने अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा।

इनमें से करीब 42 प्रतिशत सांसद बीजेपी छोड़कर अन्य दलों में गए, जबकि लगभग इतने ही नेताओं ने कांग्रेस का दामन थामा।

लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इन 12 में से एक भी सांसद चुनाव नहीं जीत सका। यानी 2019 में दल-बदलू सांसदों का स्ट्राइक रेट 0 प्रतिशत रहा।

2024 के लोकसभा चुनाव में भी बड़ी संख्या में दूसरे दलों से आए नेताओं को टिकट मिला।

एक चुनावी विश्लेषण के अनुसार, बीजेपी ने 2024 में कुल 441 उम्मीदवार उतारे, जिनमें 110 उम्मीदवार ऐसे थे जो 2014 के बाद दूसरी पार्टियों से बीजेपी में शामिल हुए थे।

इन 110 उम्मीदवारों में से:

  • 69 उम्मीदवार चुनाव हार गए
  • यानी करीब 62 प्रतिशत दल-बदलू उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा।

विश्लेषण के मुताबिक, 2023 और 2024 के दौरान बीजेपी में शामिल हुए 34 नेताओं को टिकट दिया गया था।

इनमें से:

  • 27 नेता चुनाव हार गए
  • केवल 7 उम्मीदवार जीत दर्ज कर सके।

यानी चुनाव से ठीक पहले पार्टी बदलने वाले नेताओं की सफलता दर और भी कम रही।

बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले 110 बाहरी नेताओं में सबसे अधिक कांग्रेस से आए उम्मीदवार थे।

आंकड़ों के अनुसार:

  • कांग्रेस से – 38
  • बसपा से – 11
  • बीआरएस से – 9
  • टीएमसी से – 7
  • बीजेडी से – 6
  • एनसीपी से – 4
  • समाजवादी पार्टी से – 4

इनमें केवल कांग्रेस से आए 38 नेताओं में से 20 उम्मीदवार चुनाव हार गए।

हारने वाले प्रमुख दल-बदलू नेता

  • रवनीत सिंह बिट्टू
  • परनीत कौर
  • गीता कोड़ा
  • सुशील कुमार रिंकू
  • मेनका गांधी
  • हंस राज हंस
  • अर्जुन सिंह
  • सुनील मंडल
  • मार्गनी राम
  • ज्योतिरादित्य सिंधिया
  • रवि किशन
  • जितिन प्रसाद
  • नवीन जिंदल
  • रितेश पांडेय
  • अफजाल अंसारी
  • राहुल कस्वां
  • देवरायलु
  • वल्लभनेनी

इन उदाहरणों से साफ है कि कुछ नेताओं को सफलता जरूर मिली, लेकिन कुल मिलाकर दल-बदल जीत की गारंटी नहीं बन सका।

लोकसभा के उलट राज्यसभा चुनाव में दल बदलने वाले नेताओं का प्रदर्शन काफी बेहतर रहा।

ADR के अनुसार, 2016 से 2020 के बीच 16 राज्यसभा सांसदों ने पार्टी बदली।

दिलचस्प बात यह रही कि सभी 16 सांसद दोबारा राज्यसभा पहुंचने में सफल रहे।

इसकी बड़ी वजह यह मानी जाती है कि राज्यसभा चुनाव में आम जनता नहीं, बल्कि विधायक मतदान करते हैं।

ADR की रिपोर्ट में एक और दिलचस्प तथ्य सामने आया।

दल बदलकर चुनाव लड़ने वाले नेताओं की औसत संपत्ति में करीब 39 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

रिपोर्ट के मुताबिक उनकी संपत्ति में औसतन करीब 5.85 करोड़ रुपये का इजाफा हुआ, चाहे वे चुनाव जीते हों या हार गए हों।

ADR का कहना है कि बार-बार होने वाला राजनीतिक दल-बदल लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करता है।

संस्था ने सुझाव दिया है कि दल-बदल कानून के तहत सांसदों को अयोग्य घोषित करने का अधिकार केवल लोकसभा अध्यक्ष के पास न होकर राष्ट्रपति को दिया जाना चाहिए, ताकि निर्णय अधिक निष्पक्ष तरीके से हो सकें।

2019 और 2024 के चुनावी आंकड़े यह संकेत देते हैं कि चुनाव से ठीक पहले पार्टी बदलना हमेशा राजनीतिक सफलता की गारंटी नहीं होता। कई मामलों में मतदाता ऐसे नेताओं को स्वीकार नहीं करते और उनकी हार हो जाती है। वहीं, राज्यसभा चुनाव की प्रकृति अलग होने के कारण वहां दल-बदल का असर लोकसभा जैसा नहीं दिखता।

आंकड़ों से साफ है कि सिर्फ पार्टी का चुनाव चिह्न बदलने से जनता का भरोसा नहीं बदलता। चुनावी सफलता के लिए संगठन, स्थानीय पकड़, जनाधार और उम्मीदवार की विश्वसनीयता आज भी सबसे अहम कारक बने हुए हैं।

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