भारत जब ब्रह्मोस मिसाइल बेचता है तो क्या रूस की मंजूरी जरूरी होती है? जानिए पूरा नियम

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल की क्षमता चर्चा का बड़ा विषय बनी थी। अब भारत ने इंडोनेशिया के साथ ब्रह्मोस मिसाइल सौदे पर सहमति बनाई है। इससे पहले फिलीपींस भी यह मिसाइल खरीद चुका है।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत ब्रह्मोस मिसाइल किसी भी देश को अपनी मर्जी से बेच सकता है या इसके लिए रूस की मंजूरी भी जरूरी होती है?

रक्षा मामलों के जानकारों के मुताबिक, ब्रह्मोस भारत और रूस का संयुक्त उपक्रम (Joint Venture) है। इसका विकास भारत के DRDO और रूस की NPO Mashinostroyenia ने मिलकर किया है। इसलिए किसी तीसरे देश को इसके निर्यात के लिए दोनों देशों की सहमति जरूरी मानी जाती है।

रक्षा विश्लेषक राहुल बेदी का कहना है कि फिलीपींस और इंडोनेशिया को ब्रह्मोस की बिक्री रूस की सहमति के बिना संभव नहीं होती। हालांकि दोनों देशों के बीच होने वाले राजस्व बंटवारे की आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं है।

सुरक्षा विशेषज्ञ सी. उदय भास्कर के अनुसार ब्रह्मोस का इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट (IPR) भारत और रूस, दोनों के पास है। इसलिए निर्यात से जुड़े फैसले भी दोनों देशों की सहमति से लिए जाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रह्मोस पूरी तरह स्वदेशी मिसाइल नहीं है। इसके कुछ अहम पुर्जे, खासकर रैमजेट इंजन, अभी भी रूस से आते हैं।

जानकारों के मुताबिक ब्रह्मोस एयरोस्पेस के बोर्ड में भारत और रूस दोनों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। यही बोर्ड तय करता है कि मिसाइल किस देश को बेची जाएगी और किन शर्तों पर निर्यात होगा।

अब तक भारत ने फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइल की आपूर्ति का समझौता किया है और इंडोनेशिया के साथ भी डील पर सहमति बनी है। इसके अलावा वियतनाम सहित कई अन्य देशों के साथ भी लंबे समय से बातचीत चल रही है।

दिलचस्प बात यह है कि जिन देशों में भारत ब्रह्मोस का निर्यात कर रहा है, उनमें से अधिकांश का दक्षिण चीन सागर या समुद्री सीमाओं को लेकर चीन के साथ विवाद है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रह्मोस केवल एक हथियार नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक कूटनीति का भी अहम हिस्सा बन चुका है।

इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे देशों की समुद्री सुरक्षा क्षमता बढ़ाकर भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपना प्रभाव मजबूत कर रहा है। इससे चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश भी मानी जा रही है।

  • सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल, जिसकी गति मैक 2.8 से 3 तक है।
  • थल, जल और वायु—तीनों प्लेटफॉर्म से दागी जा सकती है।
  • बेहद कम समय में लक्ष्य तक पहुंचने की क्षमता।
  • आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम के लिए भी इसे ट्रैक करना मुश्किल माना जाता है।
  • निर्यात संस्करण की रेंज लगभग 290 किलोमीटर रखी गई है।

पिछले कुछ वर्षों में भारत रक्षा निर्यात बढ़ाने पर लगातार जोर दे रहा है। ब्रह्मोस जैसे अत्याधुनिक हथियारों का निर्यात न सिर्फ विदेशी मुद्रा अर्जित करता है, बल्कि वैश्विक रक्षा बाजार में भारत की विश्वसनीयता और रणनीतिक प्रभाव को भी मजबूत करता है।

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