AI के दुरुपयोग पर सख्ती की तैयारी, केंद्र सरकार ला सकती है नया कानून

नई दिल्ली: सोशल मीडिया और साइबर क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते दुरुपयोग पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार एक नया कानून लाने की तैयारी कर रही है। सरकार का मानना है कि मौजूदा कानूनी ढांचा AI से जुड़ी नई और जटिल चुनौतियों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं है।
IT मंत्रालय ने दिए नए कानून के संकेत
सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय (IT) के सचिव एस. कृष्णन के अनुसार मौजूदा कानून डीपफेक और कंटेंट लेबलिंग जैसे मामलों से आंशिक रूप से निपट सकते हैं, लेकिन तेजी से बदलती AI तकनीक कई नई चुनौतियां पैदा कर रही है।
उन्होंने संकेत दिया कि इसी कारण सरकार AI के नियमन के लिए नए और व्यापक कानून पर विचार कर रही है। इस दिशा में विशेषज्ञों से लगातार परामर्श भी लिया जा रहा है।
क्यों जरूरी माना जा रहा है नया कानून?
विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक कानून मानव व्यवहार को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं, जबकि AI सिस्टम कई मामलों में स्वायत्त तरीके से निर्णय लेते हैं। इसी कारण जवाबदेही, अधिकार और नियंत्रण को लेकर कई कानूनी खालीपन सामने आ रहे हैं।
जवाबदेही का सवाल
AI सिस्टम द्वारा लिए गए निर्णयों में गलती होने पर जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो जाता है—क्या यह डेवलपर की गलती है, यूजर की, या सिस्टम की—यह स्पष्ट नहीं है।
स्वायत्त मशीनों की चुनौती
यदि AI आधारित रोबोट सर्जरी में गलती करे या सेल्फ-ड्राइविंग वाहन दुर्घटना कर दे, तो मौजूदा आपराधिक कानूनों में सीधे जिम्मेदारी तय करना जटिल हो जाता है।
कॉपीराइट और बौद्धिक संपदा पर संकट
AI के जरिए बनाई गई पेंटिंग, संगीत या कोड के मालिकाना हक को लेकर भी स्पष्ट नियम नहीं हैं। इसके अलावा, AI मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए इंटरनेट से बड़े पैमाने पर डेटा स्क्रैपिंग की जा रही है, जिससे कॉपीराइट उल्लंघन का मुद्दा गंभीर होता जा रहा है।
डीपफेक और फर्जी जानकारी बड़ा खतरा
AI तकनीक के जरिए किसी भी व्यक्ति की आवाज और चेहरे की नकल कर फर्जी वीडियो बनाना आसान हो गया है। इससे पहचान की चोरी और वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में तेजी आई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया धीमी होने के कारण डीपफेक कंटेंट अक्सर तेजी से फैलकर बड़ा नुकसान कर देता है, जिसे बाद में नियंत्रित करना मुश्किल होता है।
अदालतों में AI के गलत इस्तेमाल पर चिंता
हाल के मामलों में यह भी सामने आया है कि कुछ कानूनी प्रक्रियाओं में AI द्वारा तैयार किए गए फर्जी संदर्भों का इस्तेमाल किया गया, जो वास्तव में अस्तित्व में ही नहीं थे।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि बिना सत्यापन के AI-जनित सामग्री का उपयोग पेशेवर कदाचार माना जाएगा।
एल्गोरिदमिक भेदभाव और निगरानी पर सवाल
AI सिस्टम कई बार पुराने और पूर्वाग्रह से भरे डेटा पर प्रशिक्षित होते हैं, जिससे रोजगार और ऋण जैसे क्षेत्रों में भेदभाव की आशंका बढ़ जाती है।
इसके साथ ही फेशियल रिकग्निशन तकनीक के जरिए बढ़ती निगरानी को लेकर भी गोपनीयता अधिकारों पर सवाल उठ रहे हैं।
डिजिटल डेटा कानून की सीमाएं
भारत का डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट 2023 व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा तो सुनिश्चित करता है, लेकिन AI द्वारा डेटा प्रोसेसिंग और प्रोफाइलिंग पर इसका दायरा सीमित माना जा रहा है।
आगे क्या?
सरकार अब ऐसे कानून पर काम कर रही है जो AI के इस्तेमाल को नियंत्रित करने के साथ-साथ नवाचार को भी बाधित न करे। विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले समय में यह कानून भारत की डिजिटल और साइबर नीति का अहम हिस्सा साबित हो सकता है।



