Bihar Byelection: बीजेपी के सबसे मजबूत ‘गढ़’ में प्रशांत किशोर की सीधी एंट्री! बांकीपुर की जंग क्यों बन गई सम्राट चौधरी के लिए नाक का सवाल?

  • रणवीर की सीधी एंट्री: 3 साल तक पर्दे के पीछे संगठन बनाने वाले प्रशांत किशोर पहली बार खुद लड़ेंगे चुनाव।
  • बीजेपी का अभेद्य किला: 1995 से (पहले पटना पश्चिम) इस सीट पर सिर्फ और सिर्फ बीजेपी का कब्जा रहा है।
  • सम्राट चौधरी की प्रतिष्ठा दांव पर: नितिन नबीन से ज्यादा यह चुनाव डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी के राजनीतिक रसूख की परीक्षा है।
  • जातीय समीकरण: कायस्थ और वैश्य बाहुल्य इस सीट पर पीके के आने से मुकाबला त्रिकोणीय होने के आसार।

बिहार की राजनीति में चुनावी रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) ने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा और रिस्की दांव खेल दिया है। राजनीति में कदम रखने के ठीक 3 साल बाद ‘पीके’ खुद चुनावी रण में उतरने जा रहे हैं। ‘जन सुराज’ पार्टी ने उन्हें पटना की हाई-प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा सीट से उपचुनाव के लिए अपना उम्मीदवार घोषित किया है।

यह सीट बीजेपी के दिग्गज नेता नितिन नबीन के राज्यसभा चुने जाने की वजह से खाली हुई है। उम्मीदवार बनते ही प्रशांत किशोर ने बांकीपुर के 18 लाख मतदाताओं और कार्यकर्ताओं का आभार जताते हुए कहा, “मेरी जिंदगी बिहार की जनता और जन सुराज के लिए है। मैं इस जिम्मेदारी को स्वीकार करता हूं।”

लेकिन, राजनीतिक गलियारों में इस वक्त पीके की उम्मीदवारी से ज्यादा उन 3 तीखे सवालों की चर्चा है, जो सीधे बिहार बीजेपी के बड़े चेहरों की नींद उड़ा रहे हैं।

जवाब: पिछले मुख्य विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर ने खुद मैदान में न उतरकर केवल पार्टी के संगठन पर ध्यान दिया था, जहां जन सुराज को महज 4% वोट मिले और खाता भी नहीं खुला। पीके जानते हैं कि अगर जन सुराज को बिहार में मुख्य राजनीतिक विकल्प बनना है, तो उन्हें खुद आगे आकर नेतृत्व करना होगा। बांकीपुर जैसी शहरी और जागरूक सीट को चुनकर पीके यह संदेश देना चाहते हैं कि वे शॉर्टकट नहीं, बल्कि सीधे बीजेपी के सबसे मजबूत फ्रंट पर लड़ना चाहते हैं।

जवाब: बांकीपुर को बीजेपी का सबसे सुरक्षित गढ़ माना जाता है। पिछले चुनाव (2025) में बीजेपी के नितिन नबीन को यहाँ रिकॉर्ड 62.66 प्रतिशत वोट मिले थे। पीके के लिए इस 62% के किले को भेदना लोहे के चने चबाने जैसा है। पीके की रणनीति यहाँ के नाराज शहरी मतदाताओं, युवाओं और जातिगत समीकरणों से परे ‘विकास’ के नाम पर साइलेंट वोटर्स को साधने की होगी।

जवाब: सबसे दिलचस्प पहलू यही है। नितिन नबीन तो राज्यसभा जाकर केंद्र की राजनीति में सेट हो चुके हैं, लेकिन बिहार में बीजेपी के सबसे बड़े चेहरे और डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी के लिए यह सीट बचाना नाक का सवाल है। अगर प्रशांत किशोर यहाँ बीजेपी को कड़ी टक्कर देते हैं या कोई उलटफेर करते हैं, तो इसका सीधा असर सम्राट चौधरी की लीडरशिप और संगठन पर उनकी पकड़ पर पड़ेगा। पीके को रोकना अब सम्राट चौधरी की व्यक्तिगत जिम्मेदारी बन चुकी है।

बांकीपुर विधानसभा (पुराना नाम पटना पश्चिम) में कुल 3.80 लाख मतदाता हैं। यहाँ का वोटिंग पैटर्न हमेशा से चौंकाने वाला रहा है:

मतदाता वर्ग / जातिअनुमानित संख्या (बांकीपुर सीट)
कायस्थ (가야स्थ)70, हजार (सबसे बड़ा वोट बैंक)
वैश्य-बनिया60 हजार के करीब
ब्राह्मण और भूमिहार45 हजार के आसपास
राजपूत30 हजार
दलित वोटर31 हजार
मुस्लिम / यादव30 हजार + 30 हजार
कोइरी-कुर्मी30 हजार के करीब

साफ है कि सवर्ण (खासकर कायस्थ) और वैश्य मतदाताओं की बहुलता के कारण यह सीट ट्रेडिशनल तौर पर बीजेपी के पाले में जाती रही है। अब देखना यह है कि प्रशांत किशोर का ‘जन सुराज’ मॉडल इस सवर्ण-वैश्य बहुल गढ़ में क्या सेंध लगा पाता है।

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