Delhi Riots Case: कड़कड़डूमा कोर्ट से उमर खालिद और शरजील इमाम को झटका, जमानत याचिका खारिज

जुबिली स्पेशल डेस्क
2020 के दिल्ली दंगों की कथित ‘बड़ी साजिश’ (FIR 59/2020) के मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट का एक बड़ा फैसला सामने आया है।
अदालत ने इस मामले के दो मुख्य चेहरों-उमर खालिद और शरजील इमाम की नियमित जमानत (Regular Bail) याचिकाओं को एक बार फिर खारिज कर दिया है।
दोनों ही आरोपियों ने गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम यानी UAPA के तहत दर्ज इस मामले में राहत के लिए ट्रायल कोर्ट का रुख किया था। आइए इस फैसले और इसके कानूनी व राजनीतिक मायनों को एक नए नजरिए (New Angle) से समझते हैं…
1. कोर्ट का कड़ा रुख: ‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ बनाम ‘सुनियोजित साजिश’
इस फैसले ने एक बार फिर दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के उस दावे को कानूनी मजबूती दी है, जिसमें कहा गया था कि उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा कोई अचानक भड़का गुस्सा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीतिक साजिश थी।
- जांच एजेंसी का आरोप: दिल्ली पुलिस का कहना है कि CAA-NRC विरोधी प्रदर्शनों की आड़ में जानबूझकर सांप्रदायिक तनाव पैदा किया गया, ताकि देश की राजधानी में बड़े पैमाने पर हिंसा भड़काई जा सके।
- UAPA की धाराएं बनीं ढाल: आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) के तहत जमानत मिलना बेहद मुश्किल होता है। कड़कड़डूमा कोर्ट द्वारा याचिका खारिज होने का मतलब है कि अदालत को पहली नजर में (Prima Facie) आरोपियों के खिलाफ लगे आरोपों में गंभीरता नजर आई है।
2. उमर और शरजील के लिए कानूनी रास्ते अब क्या हैं?
ट्रायल कोर्ट से झटका लगने के बाद अब दोनों ही आरोपियों के कानूनी विकल्पों पर बात होना तय है:
- दिल्ली हाई कोर्ट का रुख: अब आरोपियों के वकीलों के पास इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती देने का विकल्प है। हालांकि, पूर्व में भी उच्च अदालतों से इन्हें तकनीकी आधारों पर राहत नहीं मिल सकी है।
- लंबा खिंचता ट्रायल: साल 2020 से जेल में बंद इन आरोपियों के वकीलों की दलील रही है कि ट्रायल शुरू होने में देरी के कारण उन्हें लंबे समय तक कस्टडी में रखा जा रहा है, लेकिन कोर्ट ने इस बार भी मामले की संवेदनशीलता को ऊपर रखा।
3. इस फैसले का राजनीतिक और सामाजिक असर
यह फैसला सिर्फ एक अदालती आदेश नहीं है, बल्कि इसके कई राजनीतिक और सामाजिक संदेश भी हैं:
- प्रदर्शनों की सीमाओं पर बहस: यह फैसला उन संगठनों और एक्टिविस्ट्स के लिए एक बड़ा संदेश है जो विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व करते हैं। अदालत के इस रुख से साफ है कि ‘राइट टू प्रोटेस्ट’ (प्रदर्शन का अधिकार) की आड़ में कानून-व्यवस्था को हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती।
- विपक्ष और सरकार के बीच तकरार: इस फैसले के बाद एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में बहस तेज होगी। जहां सत्तापक्ष इसे निष्पक्ष जांच और न्याय की जीत बताएगा, वहीं विपक्ष और मानवाधिकार संगठन इसे कड़े कानूनों (UAPA) के दुरुपयोग के तौर पर पेश कर सकते हैं।
फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़के सांप्रदायिक दंगों में 50 से अधिक लोगों की जान गई थी और सैकड़ों लोग घायल हुए थे।
दिल्ली पुलिस ने इसके पीछे एक ‘मार्कअप साजिश’ का दावा करते हुए FIR 59/2020 दर्ज की थी, जिसके तहत यह पूरी कार्रवाई चल रही है।
कड़कड़डूमा कोर्ट का यह फैसला दिखाता है कि दिल्ली दंगा साजिश मामले में कानून का शिकंजा ढीला होने वाला नहीं है। उमर खालिद और शरजील इमाम के लिए जेल की सलाखों से बाहर आने का इंतजार अब और लंबा हो गया है, और अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि ऊपरी अदालत इस मामले में क्या रुख अपनाती है।


