चंपत राय और अनिल मिश्रा के इस्तीफों का क्या है कानूनी सच?

जुबिली स्पेशल डेस्क
अयोध्या। अयोध्या के भव्य राम मंदिर में करोड़ों रुपये के चढ़ावे की चोरी और एसआईटी (SIT) जांच के बीच ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ में बड़ा भूचाल आया हुआ है। दान से जुड़े कथित घोटाले और एसआईटी के चौंकाने वाले खुलासों के बाद ट्रस्ट के दो सबसे प्रमुख पदाधिकारियों-महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने ‘नैतिक आधार’ पर अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ एक पत्र सौंप देने से इनका इस्तीफा प्रभावी हो गया है?
कानूनी जानकारों और इंडियन ट्रस्ट एक्ट, 1882 (Indian Trusts Act) के नियमों के मुताबिक, किसी पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट में इस्तीफा देना केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं होता, बल्कि इसके पीछे एक बेहद जटिल कानूनी प्रक्रिया होती है।
क्या केवल इस्तीफा पत्र देने से पद खाली हो जाता है?
पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट होने के नाते राम मंदिर ट्रस्ट पर देश-दुनिया के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और दान का प्रबंधन टिका हुआ है। टाइम्स ऑफ इंडिया और आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, भले ही दोनों पदाधिकारियों ने इस्तीफे सौंप दिए हैं, लेकिन वे अभी औपचारिक रूप से पदमुक्त नहीं हुए हैं:
- ट्रस्ट की बैठक का इंतजार: ट्रस्ट की ओर से जारी आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, इस्तीफे प्राप्त हो चुके हैं, लेकिन इन पर अंतिम निर्णय ट्रस्ट की अगली औपचारिक बैठक में ही लिया जाएगा।
- वोटिंग और अधिकार: ट्रस्ट में कुल 15 सदस्य हैं (स्थायी, नामित और एक्स-ऑफिशियो)। जब तक बोर्ड बैठक के एजेंडे में इसे शामिल कर सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास नहीं किया जाता, तब तक इस्तीफा कानूनी रूप से मान्य नहीं होता।
इंडियन ट्रस्ट एक्ट (1882) की धारा 46: क्यों आसान नहीं है पद छोड़ना?
कानूनी वेबसाइट ‘लॉ जिस्ट’ और ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के अनुसार, इंडियन ट्रस्ट एक्ट की धारा 46 के तहत कोई भी ट्रस्टी जिम्मेदारी स्वीकार करने के बाद सामान्य परिस्थितियों में तुरंत पद नहीं छोड़ सकता। इस्तीफा प्रभावी होने के लिए तीन ही रास्ते हैं:
- ट्रस्ट डीड के विशेष प्रावधान: यदि ट्रस्ट के मूल गठन दस्तावेज (Trust Deed) में इसके लिए कोई विशेष छूट या नियम हो।
- लाभार्थियों की सहमति: सभी लाभार्थियों की लिखित सहमति हो। सार्वजनिक ट्रस्ट में यह व्यावहारिक रूप से असंभव है क्योंकि इसके लाभार्थी देश की आम जनता और श्रद्धालु हैं।
- सिविल कोर्ट की अनुमति: यदि कोर्ट को लगता है कि ट्रस्टी पर कोई अनुचित बोझ है या स्वास्थ्य कारणों से वह काम करने में असमर्थ है, तभी कोर्ट इसकी अनुमति देता है।
नए ट्रस्टी की नियुक्ति और पारदर्शिता की मांग
चूंकि राम मंदिर का निर्माण और संचालन एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, इसलिए कानून की धारा 73 और 74 के तहत रिक्त पदों को लंबे समय तक खाली नहीं रखा जा सकता। यदि सरकार द्वारा नामित सदस्यों का इस्तीफा स्वीकार होता है, तो नए चयन में केंद्र या राज्य सरकार की भूमिका भी तय होगी।
वर्तमान में, दान चोरी मामले के 8 मुख्य आरोपियों के घरों पर पुलिस की ताबड़तोड़ छापेमारी जारी है। इस बीच, एसआईटी जांच और इन हाई-प्रोफाइल इस्तीफों ने ट्रस्ट के भीतर जवाबदेही और वित्तीय पारदर्शिता (Transparency) को लेकर एक बड़ी राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है।



