खामेनेई की मौत का कश्मीर में असर, घाटी में प्रदर्शन और नेताओं ने ईरानी दूतावास में दी श्रद्धांजलि

जुबिली स्पेशल डेस्क

आयतुल्लाह अली खामेनेई के निधन के बाद कई देशों में शोक की लहर देखी जा रही है। भारत में खासकर जम्मू और कश्मीर में उनके निधन पर लोगों ने गहरा दुख जताया है। कश्मीर घाटी के कई इलाकों में लोगों ने अमेरिका और इजराइल के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी किए। जहां एक तरफ कुछ लोग खामेनेई के समर्थन में नारे लगाते दिखाई दिए, वहीं दूसरी ओर कई कश्मीरी नेता नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास, नई दिल्ली पहुंचकर शोक व्यक्त कर रहे हैं।

पिछले कुछ दिनों में कश्मीर और लद्दाख के कई वरिष्ठ नेताओं ने ईरानी मिशन का दौरा किया और शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर कर अपनी संवेदनाएं व्यक्त कीं। नेताओं ने दिवंगत नेता को श्रद्धांजलि देते हुए ईरानी राजनयिकों से मुलाकात भी की। इन दौरों को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के कुछ हिस्सों में ईरान को लेकर मौजूद भावनात्मक और राजनीतिक प्रभाव के रूप में देखा जा रहा है।

फारूक अब्दुल्ला ने जताई संवेदना

फारूक अब्दुल्ला, जो नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री हैं, मंगलवार को नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास पहुंचे। वहां उन्होंने शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर कर जम्मू-कश्मीर के लोगों की ओर से संवेदना व्यक्त की। उनके साथ सांसद चौधरी मोहम्मद रमजान, सज्जाद अहमद किचलू और गुरविंदर सिंह ओबेरॉय भी मौजूद थे।

प्रतिनिधिमंडल ने भारत में ईरान के उप-राजदूत से भी मुलाकात की और इस कठिन समय में ईरानी जनता के साथ एकजुटता दिखाई। इससे एक दिन पहले महबूबा मुफ्ती, जो पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष हैं, भी खामेनेई को श्रद्धांजलि देने के लिए ईरानी दूतावास और ईरानी सांस्कृतिक केंद्र पहुंचीं। उन्होंने बडगाम के विधायक आगा सैयद मुंतजिर मेहदी के साथ भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फतहली से मुलाकात की।

कश्मीरी छात्रों का मुद्दा भी उठाया

महबूबा मुफ्ती ने कहा कि उन्होंने ईरानी जनता के प्रति अपनी संवेदनाएं व्यक्त कीं और दिवंगत नेता की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। उन्होंने ईरान में रह रहे कश्मीरी छात्रों की सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया और राजदूत से उनकी मदद करने का आग्रह किया।

इसी क्रम में लद्दाख ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल (LAHDC), कारगिल के चेयरमैन और मुख्य कार्यकारी पार्षद मोहम्मद जाफर अखून भी शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर करने के लिए ईरानी दूतावास पहुंचे। उन्होंने कहा कि लद्दाख, खासकर कारगिल के लोग ईरान के दुख में बराबर के साझेदार हैं। बाद में उन्होंने लद्दाख के सांसद हाजी हनीफा जान के साथ ईरानी प्रतिनिधियों से भी मुलाकात की।

घाटी में शोक सभाएं और प्रदर्शन

खामेनेई की हत्या के बाद कश्मीर घाटी के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन और शोक सभाएं भी हुईं। श्रीनगर, बडगाम और बांदीपोरा समेत कई इलाकों में प्रदर्शनकारियों ने उनकी तस्वीरें लेकर हमले की निंदा करते हुए नारे लगाए।

स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षाबलों ने कुछ स्थानों पर आंसू गैस का इस्तेमाल किया और प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था की। रिपोर्टों के मुताबिक प्रदर्शन के दौरान कई लोगों को हिरासत में भी लिया गया।

ईरान में पढ़ने जाते हैं कश्मीर के छात्र

पिछले कुछ वर्षों में ईरान कश्मीर और कारगिल के छात्रों के लिए पढ़ाई का एक बड़ा केंद्र बन गया है, खासकर मेडिकल और धार्मिक शिक्षा के लिए। ऐसे में वहां पढ़ रहे छात्रों को लेकर उनके परिवारों में चिंता भी बढ़ गई है। कश्मीर घाटी और लद्दाख के कारगिल जिले में शिया समुदाय की बड़ी आबादी है, विशेषकर बडगाम, श्रीनगर के पुराने शहर और कारगिल में।

1980 में किया था कश्मीर का दौरा

आयतुल्लाह अली खामेनेई ने इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के सुप्रीम लीडर बनने से काफी पहले जुलाई 1980 में कश्मीर घाटी का एक संक्षिप्त लेकिन महत्वपूर्ण दौरा किया था। यह दौरा आज भी स्थानीय लोगों की यादों में दर्ज है।

बताया जाता है कि उस समय के ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी के निर्देश पर खामेनेई ने अपनी भारत यात्रा के दौरान कश्मीर को भी शामिल किया था। इस दौरान उन्होंने प्रसिद्ध कश्मीरी शिया विद्वान आगा सैयद यूसुफ अल‑मूसावी अल‑सफवी से मुलाकात की थी, जो कश्मीर में शिया समुदाय के प्रमुख धार्मिक नेताओं में से एक थे और ईरानी इस्लामिक क्रांति के समर्थक माने जाते थे।

मूसावी कश्मीर के शिया समाज में एक प्रभावशाली व्यक्तित्व थे और उन्होंने धार्मिक, सामाजिक तथा शैक्षणिक मामलों में समुदाय का मार्गदर्शन किया। साथ ही उन्होंने ईरान के धार्मिक नेताओं के साथ मजबूत संबंध बनाए रखे, जिससे कश्मीर और ईरान के बीच एक अहम वैचारिक और धार्मिक जुड़ाव बना रहा।

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