गहरी आत्मसमीक्षा का समय है विश्व पर्यावरण दिवस

प्रोफेसर अशोक कुमार

हर साल 5 जून को ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ मनाना एक वैश्विक औपचारिकता बन चुका है। सेमिनार होते हैं, वृक्षारोपण के संकल्प लिए जाते हैं और डिजिटल मंचों पर पर्यावरण संरक्षण की दुहाई दी जाती है।
परंतु अगले ही दिन से प्रकृति के दोहन और प्रशासनिक उदासीनता की वही पुरानी कहानी फिर शुरू हो जाती है। आज जब हम जलवायु परिवर्तन, अनियंत्रित शहरीकरण और प्रदूषण के चरम दौर में जी रहे हैं, तब यह दिन केवल उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि हमारी जीवनशैली और विकास के मॉडल की गहरी आत्म-समीक्षा करने का है।
- आधुनिक विकास और ‘शहरी प्रदूषण’ (Urban Pollution)
आज के दौर का सबसे बड़ा संकट यह है कि हमने विकास की परिभाषा को केवल कंक्रीट के जंगलों, चौड़ी सड़कों और ऊंची इमारतों तक सीमित कर दिया है। जयपुर जैसे ऐतिहासिक और तेजी से बढ़ते शहरों का उदाहरण हमारे सामने है, जहाँ मास्टर प्लान और कॉम्प्रिहेंसिव मोबिलिटी प्लान जैसी बड़ी-बड़ी कागज़ी रिपोर्टें तो बनती हैं, लेकिन उनमें दीर्घकालिक दूरदर्शिता का अभाव होता है।
सड़कों को चौड़ा करने के नाम पर दशकों पुराने पेड़ों को काट दिया जाता है और हरियाली को ‘स्लिप लेन’ या ‘फ्री लेफ्ट टर्न’ की बलि चढ़ा दिया जाता है। परिणाम? शहरों का तापमान लगातार बढ़ रहा है, भूजल स्तर रसातल में जा रहा है और हवा जहरीली हो रही है। यह केवल भौतिक प्रदूषण नहीं है, बल्कि यह हमारे नीति-नियोजकों की सोच का ‘प्रशासनिक प्रदूषण’ भी है। - उपभोक्तावाद और कचरा प्रबंधन की विफलता
आधुनिक जीवनशैली ने हमें अत्यधिक उपभोक्तावादी बना दिया है। ‘यूज़ एंड थ्रो’ (उपयोग करो और फेंको) की संस्कृति ने प्लास्टिक और ई-कचरे (E-waste) का ऐसा पहाड़ खड़ा कर दिया है जिसका कोई स्थायी समाधान हमारे पास नहीं है। शहरों के डंपिंग यार्ड्स आज सुलगते हुए टाइम बम बन चुके हैं, जो न केवल वायु को प्रदूषित कर रहे हैं, बल्कि भूमिगत जल को भी रासायनिक रूप से दूषित कर रहे हैं। जब तक हम अपनी आवश्यकताओं को सीमित नहीं करेंगे और पुनर्चक्रण (Recycling) को अनिवार्य नहीं बनाएंगे, तब तक प्रकृति को राहत मिलना असंभव है। - समाधान की दिशा: कागज़ से ज़मीन की ओर
पर्यावरण संरक्षण को लेकर हमारे पास कानूनों और नीतियों की कोई कमी नहीं है, कमी है तो केवल ‘इच्छाशक्ति’ और ‘क्रियान्वयन’ (Implementation) की। यदि हम वास्तव में इस धरा को बचाना चाहते हैं, तो हमें निम्नलिखित स्तंभों पर काम करना होगा
सतत शहरी गतिशीलता (Sustainable Urban Mobility): शहरों के परिवहन नियोजन में केवल निजी गाड़ियों को रास्ता देने के बजाय सार्वजनिक परिवहन (मेट्रो, इलेक्ट्रिक बसें) और पैदल यात्रियों तथा साइकिल चालकों के लिए सुरक्षित गलियारे (Green Corridors) बनाने होंगे।
शहरी वानिकी (Urban & Vertical Farming): कंक्रीट के बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिए छतों, बालकनियों और उपलब्ध सीमित शहरी स्थानों में वर्टिकल फार्मिंग और सघन वन (जैसे मियावाकी पद्धति) को बढ़ावा देना होगा। यह न केवल तापमान को नियंत्रित करेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर पोषण और ऑक्सीजन की उपलब्धता को भी सुधारेगा।
सख्त प्रशासनिक जवाबदेही: पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करने वाले उद्योगों, अवैध खनन करने वालों और हरित क्षेत्रों पर अतिक्रमण करने वाले भू-माफियाओं के खिलाफ बिना किसी राजनीतिक या प्रशासनिक ढिलाई के सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। - निष्कर्ष
पर्यावरण कोई ऐसी बाहरी वस्तु नहीं है जिसे हम अपनी सुविधानुसार बचाएं या नष्ट करें; हम स्वयं इस पर्यावरण का एक हिस्सा हैं। यदि प्रकृति बीमार होगी, तो मानव सभ्यता का स्वस्थ रहना असंभव है। आइए, इस पर्यावरण दिवस पर हम केवल एक पौधा लगाने की रस्म न निभाएं, बल्कि प्रकृति के प्रति अपनी सोच, अपनी प्रशासनिक नीतियों और अपनी दैनिक आदतों में सुधार करने का एक ईमानदार संकल्प लें। पृथ्वी को बचाने का समय कल नहीं, बल्कि ‘अभी’ है।
“लेखक कानपुर और गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति हैं।”



