Wednesday - 25 November 2020 - 7:55 AM

बिहार की महाभारत में तेजस्वी अभिमन्यु होंगे या अर्जुन?

प्रीति सिंह

बिहार का महाभारत इस बार असल महाभारत के तर्ज पर ही लड़ा जा रहा है। इसमें इसमें छल, प्रपंच, मोहरे और बिसात सब कुछ है। बिहार के महाभारत में भी चक्रव्यूह, अभिमन्यु और अर्जुन सभी किरदार मौजूद हैं। कोई चक्रव्यूह बना रहा है तो कोई तोड़ रहा है, तो कोई चक्रव्यूह में फंसा हुआ है।

तेजस्वी यादव जहां नीतीश के लिए चक्रव्यूह बना रहे हैं तो वहीं जदयू और बीजेपी तेजस्वी के लिए चक्रव्यूह बना रही हैं।

यह भी एक सवाल है कि तेजस्वी यादव भले ही तीन बड़े विपक्षी दलों की नुमाइंदगी वाले महा गठबंधन की अगुवाई कर रहे हों, लेकिन उनके पास उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी नीतीश कुमार की तरह हथियार नहीं हैं।

नीतीश कुमार के साथ बीजेपी की पूरी ताकत और मशीनरी है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसी बड़ी ताकत, उनके मंत्रिमंडल के अहम सहयोगी और कई दिग्गज नेता हैं। इससे उलट तेजस्वी का प्रचार तंत्र वन मैन शो की तरह है।

लेकिन बिहार के चुनावी अखाड़े में सबसे ज्यादा किसी ने चौकाया तो वह है राजद नेता तेजस्वी यादव। महज एक महीनों में तेजस्वी ने सबका ध्यान खींचा है। आलम यह है कि चुनाव के पहले तक तेजस्वी को हल्के में ले रही बिहार एनडीए के लिए अब वह चुनौती बन गए हैं। जाति की राजनीति के लिए बदनाम बिहार में इस बार विकास, रोजगार की प्राथमिकता देने की बात हो रही है ।

तेजस्वी यादव की जनसभा में उमड़ने वाली भीड़ ने जदयू और बीजेपी की चिंता को बढ़ा दिया है। उसी चिंता का नतीजा था कि तेजस्वी के दस लाख नौकरी देने के चुनावी वादों के जवाब में बीजेपी को भी 19 लाख रोजगार और एक करोड़ महिलाओं के स्वरोजगार का वायदा करना पड़ा।

तेजस्वी के करीबियों का कहना है कि इस बार वह हर चीज पर खुद बारीकी से नजर रख रहे हैं। जीतन राम मांजी, उपेंद्र कुशवाहा और मुकेश सहानी को गठबंधन से बाहर जाने देना, उनका सोचा-समझा कदम था। उन्हें अहसास हो गया था कि इन दलों का वोट राजद की अगुवाई वाले गठबंधन को ट्रांसफर नहीं हो रहा। अगर वे अलग-अलग लड़ते हैं तो एनडीए के पारंपरिक वोट बैंक में ही सेंध लगाएंगे।

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पिता की छत्रछाया से निकलते तेजस्वी

बिहार की राजनीति के केंद्र में लालू यादव हमेशा से रहे हैं। बिहार की राजनीति में लालू का जो तिलिस्म है वह अब टूटता नजर आ रहा है। और यह कोई और नहीं उन्हीं के बेटे तेजस्वी यादव तोड़ रहे हैं। लोग तेजस्वी की सभाओं में जुटने वाली भीड़ की तुलना लालू यादव की जनसभा से कर रहे हैं।

दरअसल तेजस्वी अपने पिता लालू यादव की छत्रछाया से निकलते नजर आ रहे हैं। उन्होंने राजद के पोस्टरों से अपने माता-पिता की तस्वीरें भी हटा दीं, जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप थे। जनसभाओं में जहां जदयू और बीजेपी लालू यादव के 15 साल के कार्यकाल जनता को याद दिला रही है वहीं तेजस्वी जनता के बीच सवाल दागते हैं कि नौकरी चाहिए तो भीड़ की हुंकार सुनाई पड़ती है। फिर वह तफ्सील से बताते हैं कि अगर वह सत्ता में आते हैं तो किस तरह पहली कैबिनेट बैठक में दस लाख नौकरियों के आदेश पर हस्ताक्षर करेंगे।

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बिहार के युवाओं में तेजस्वी का क्रेज बढ़ रहा है। उनकी सभा में जुटने वाली युवाओं की भीड़ इसकी गवाही दे रहे हैं। तो सवाल उठता है कि क्या यह भीड़ ईवीएम पर अपना प्यार दिखायेगी? तो क्या इस बार कुल अलग होगा? ऐसे तमाम सवाल लोगों के जेहन में आ रहे हैं।

राजनीतिक पंडितों की माने तो यह सच है कि बिहार चुनाव में स्टार प्रचारकों और पिता के साथ करिश्माई नेता लालू प्रसाद यादव की गैर मौजूदगी में ३१ साल के तेजस्वी एक सहज और अनुभवी राजनेता बनकर उभरे हैं, लेकिन इस चुनावी चक्रव्यूह को तोड़ पाना उनके लिए आसान नहीं होगा।

हालांकि अब तक तेजस्वी विपक्ष के चक्रव्यूह में फंसने से बचते रहे हैं लेकिन अभी दो चरण का चुनाव शेष है इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगा कि वह इस महाभारत में अभिमन्यु नहीं बल्कि अर्जुन बनकर निकलेंगे।

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