Friday - 4 December 2020 - 12:59 PM

बिहार चुनाव में जाति बिला गई है?

प्रीति सिंह

बिहार का यह चुनाव राजनैतिक पंडितों, चुनावी रणनीतिकारों और जातीय-सम्प्रदाय की राजनीति करने वालों को हैरान कर रहा है। जिस प्रदेश का सारा हिसाब जाति पर चलता माना जाता रहा हो, जहां माई समीकरण से सत्ता मिल जाती हो, वहां इस बार ऐसा कुछ नहीं दिख रहा है।

बिहार के चुनाव में राजनीतिक दलों का जातीय समीकरण प्रभावी होता नहीं दिख रहा है, जिसकी वजह से उनकी चिंता बढ़ गई है, तो वहीं वे खुश हो रहे हैं कि जिन्होंने इस सबसे इतर जो बातें उठाई हैं, वे लोगों को पसन्द आ रही हैं, उन पर चर्चा हो रही है।

बिहार में अब तक हुए विधानसभा चुनाव में हावी रही जाति इस चुनाव में बिला गई हो ऐसा तो नहीं है लेकिन यहां जो लोग दो और दो चार के हिसाब से जातियों के आंकड़े और उम्मीदवारों की जाति तथा पार्टियों-नेताओं के साथ जातीय गोलबन्दियों का हिसाब लगाने पहुंच रहे हैं, उनको निराशा हाथ लग रही है।

दरअसल इस चुनाव में जातिगत पहचान और उसके आधार पर मतदान का मसला काफी पीछे हो गया लगता है। उन राजनेताओं को यह चुनाव ज्यादा निराश कर रहा है जो पाकिस्तान, कश्मीर, गांधी परिवार, लालू यादव के बाद अब मदरसा शिक्षा का सवाल उठाते आ रहे हैं। यह चिंतित इसलिए हैं क्योंकि ये मुद्दे लोगों में वांछित असर नहीं पैदा कर रहे हैं। उन्हें अब कोई मुद्दा सूझ नहीं रहा।

राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव शनिवार को एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जब नौकरी होगी तभी माई-बाबू जी खुश रहेंगे। बहू और बच्चा खुश रहेगा। नौकरी रहेगी तो माई-बाबू को तीर्थ यात्रा करा सकेंगे, बहू को घुमाने ले जाएंगे।

तेजस्वी अमूमन अपनी हर जनसभा में रोजगार का मुद्दा जोर-शोर से उठा रहे हैं। एक ओर वह दस लाख नौकरी देने की बात कह रहे हैं तो दूसरी ओर वह नीतीश सरकार को इसी मुद्दे के सहारे घेर भी रहे हैं।

यहां इसका जिक्र करना इसलिए जरूरी है क्योंकि तेजस्वी उसी पार्टी के नेता है जो माई (मुसलमान-यादव) समीकरण के सहारे बिहार की सत्ता में 15 साल रही है। लालू यादव मुसलमान और यादव वोटरों को ही साधकर सत्ता में पहुंचे। आज वहीं आरजेडी चुनाव में जाति की बात न कर सिर्फ रोजगार और विकास की बात कर रही है। जाहिर इससे हैरानी तो होगी ही।

निश्चित रूप से तेजस्वी यादव द्वारा 10 लाख लोगों को नौकरी देने के वायदे ने सबसे बडी चुनावी हलचल मचाई। तेजस्वी के तेवर देखकर तो यही लग रहा है कि वह पूरी तैयारी के साथ मैदान में आए हैं। उनके पिता-भाई और परिवार पर विपक्ष द्वारा निजी हमले हुए, पर वो इस पर डटे हुए हैं। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सारे लिहाज छोडकर तेज प्रताप की पत्नी ऐश्वर्या, जिनके साथ उनका तलाक का मुकदमा चल रहा है, उन्हें भी अपने मंच पर लाने से नहीं हिचके। जेडीयू के इस हरकत से आरजेडी का तो कुछ नहीं हुआ अलबत्ता तेजस्वी की सभाओं में उमड़ती भीड़ देख मजबूरी में बीजेपी को भी 19 लाख रोजगार और एक करोड़ महिलाओं के स्वरोजगार का वायदा करना पड़ा।

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यदि यह कहें कि बिहार की राजनीति में एक नई शुरुआत हो रही है तो गलत नहीं होगा। और यह शुरुआत जन अधिकार पार्टी के पप्पू यादव ने की है, जिन पर लोगों का भरोसा ज्यादा नहीं रहा है। पप्पू यादव लंबे समय से रोजगार का मुद्दा उठा रहे हैं। साथ ही वह गरीबों-दलितों और पिछड़ों के उत्थान की बात कर रहे हैं।

थोड़ा आगे बढ़ते हैं। अखबारों में विज्ञापन के जरिए राजनीति में प्रवेश करने वाली लंदन रिर्टन पुष्पम प्रिया चौधरी ने ‘प्लूरल्स’ नाम की पार्टी बनाकर बिहार को बदलने का ऐलान कर उन नेताओं की मुश्किलों में इजाफा किया जो अब तक जाति के नाम पर राजनीति करते आ रहे थे। ‘गोर रंग कपड़ा करिया, अबकी बार पुष्पम पिरिया’ के नारे वाली पुष्पम प्रिया चौधरी ने कम से कम नौजवानों में बिहार के पिछड़ेपन और रोजी-रोटी के मुद्दे की चर्चा शुरू की।

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चिराग पासवान का जिक्र करना भी जरूरी है। दलितों और उसमें भी मात्र दुसाधों के नेता बताए जाने वाले रामविलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति के नए नेता चिराग पासवान ने ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’  ने बिहारी पहचान का सवाल ऊपर किया और नीतीश कुमार से सीधे भिडऩे की हिम्मत दिखाकर जताया कि उन्हें 2020 की जगह 2025 के चुनाव की चिंता है। चिराग तो बिहार एनडीए में रहते हुए विकास के मुद्दे पर नीतीश कुमार की लगतार घेरते रहे।

फिलहाल बिहार जाति सम्प्रदाय की राजनीति से बाहर निकलने का प्रयास कर रहा है। नीतीश कुमार और बीजेपी ने शुरू में लालू राबड़ी के 15 साल बनाम अपने शासन के 15 साल को मुद्दा बनाने की कोशिश की, जिसका अब कोई प्रभाव नहीं दिख रहा। अब सभी राजनीतिक दल रोजगार और विकास के मुद्दे पर सिमटते जा रहे हैं।

अब कौन सच्चा माना जाता है और कौन झूठा और कौन 2 करोड़ रोजगार का वायदा करके मुकरा है, यह सब चुनाव तय कर देगा, लेकिन बिहार में रोजगार, बिहारी अस्मिता, पलायन का सवाल, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली मुख्य चुनावी मुद्दे बन जां तो इससे शुभ कुछ नहीं हो सकता।

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