Monday - 12 April 2021 - 12:14 AM

अदालत के इस ऐतिहासिक फैसले पर क्यों हो रही है बहस?

जुबिली न्यूज डेस्क

देश में संभवत: ऐसा पहली बार हुआ है जब बिहार में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने अपनी तरह का एक अनोखा फैसला सुनाया। अदालत ने अपने फैसले में कानून की जगह मानवीय तथा सामाजिक पहलू का ख्याल रखा।

बिहार शरीफ किशोर न्यायालय परिषद ने एक ऐसा फैसला दिया है, जिसकी चारों ओर प्रशंसा भी हो रही है, लेकिन इसने एक नई बहस को भी जन्म दे दिया है।

अदालत ने अपने फैसले में 18 साल से कम उम्र की नाबालिग लड़की को शादी की नीयत से भगाकर ले जाने और बलात्कार करने जैसे अपराध से एक किशोर को दोषमुक्त कर दिया।

प्रतीकात्मक तस्वीर.

इसके साथ ही अदालत ने इस हालात से उत्पन्न परिस्थिति के मद्देनजर सामाजिक व मानवीय हित में नाबालिग की शादी को भी जायज करार दिया।

जबकि ऐसे मामले में तीन से दस साल तक की सजा का प्रावधान है। हालांकि इससे पहले भी देश की कई अदालतों ने मानवीय या अन्य कारणों से सजा कम करने के फैसले दिए हैं।

क्या है मामला?

यह मामला अपै्रल 2019 का है। बिहार के नूरसराय थाना क्षेत्र में 17 साल के एक किशोर तथा 16 साल की एक नाबालिग लड़की ने भागकर शादी कर ली। यह एक अंतरजातीय विवाह था।

इस मामले में लड़की के पिता ने लड़के के अलावा उसके माता-पिता और दो बहनों का आरोपित करते हुए नूरसराय में एफआइआर दर्ज करा दिया।

इस मामले के इन्वेस्टिगेटिंग आफिसर (आइओ) ने माता-पिता व बहन को निर्दोष बताते हुए केवल किशोर के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की और यह मामला जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (जेजेबी) में भेजा दिया गया।

23 अगस्त 2019 को किशोर न्याय परिषद में लड़की पेश हुई और उसने बयान दर्ज कराते हुए कहा कि वह अपने प्रेमी के साथ स्वेच्छा से भागी थी।

लड़की ने यह भी बताया कि दोनों ने शादी भी कर ली है। उनसे कहा कि उसकी जान को उसके माता-पिता से खतरा है और वह अपने प्रेमी के साथ रहना चाहती है।

उस दिन अदालत में आरोपित किशोर भी उपस्थित हुआ। लड़की के माता-पिता ने अंतरजातीय विवाह को कारण बताते हुए बेटी बेटी को अपनाने से इंकार कर दिया।

इस मामले में जेजेबी के प्रधान दंडाधिकारी मानवेंद्र मिश्रा तथा बोर्ड के सदस्य धर्मेंद्र कुमार व ऊषा कुमारी ने सभी अभिलेखों का अध्ययन किया।

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26 फरवरी को जेजेबी ने नाबालिग दंपति व उनके परिजनों की मौजूदगी में घंटों की गई सुनवाई के बाद अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

लड़की अपनी चार माह की बच्ची के साथ कोर्ट में पेश हुई थी। उसने रो-रोकर अदालत को बताया कि उसके मां-बाप उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। अगर उसके पति को सजा दी जाती है, तो उसकी तथा उसकी बेटी की जान संकट में पड़ जाएगी।

लड़की ने ऑनर किलिंग का अंदेशा भी जताया। वर्तमान में लडके की उम्र 19 व लड़की की 18 साल है।

कोर्ट ने किशोर को किया बरी

इस मामले की सुनवाई के बाद प्रधान दंडाधिकारी मानवेंद्र मिश्रा ने अपने फैसले में सुबूत होने के बाद भी नाबालिग लड़की को भगाकर शादी करने तथा शारीरिक संबंध बनाने के आरोप से लड़के को बरी करते हुए दोनों को साथ रहने का आदेश दिया।

प्रधान दंडाधिकारी ने अपने फैसले में यह भी कहा कि इस जजमेंट को नजीर बनाकर कोई अन्य पक्षकार खुद को निर्दोष साबित करने का प्रयास नहीं कर सकेगा।

अदालत ने किशोर के माता-पिता को भी आदेश दिया कि वे दंपती के वयस्क होने तक उनकी तथा उनकी बच्ची की देखभाल व सुरक्षा करेंगे।

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इसके अलावा अदालत ने स्थानीय बाल संरक्षण पदाधिकारी को भी किशोर, उसकी नाबालिग पत्नी व बच्चे की सतत निगरानी का निर्देश देते हुए कहा कि वे दो वर्ष तक प्रत्येक छह माह में उनके हालात की विस्तृत रिपोर्ट किशोर न्याय परिषद को देंगे।

फैसला सुनाते हुए प्रधान दंडाधिकारी मानवेंद्र मिश्रा ने कहा कि हर अपराध के लिए सजा देना न्याय नहीं है। यह बात सही है कि किशोर नाबालिग लड़की को भगा कर ले गया और उससे अवैध संबंध बनाया जिससे बच्ची पैदा हुई। वास्तव में यह अपराध है, लेकिन अब जब बच्ची जन्म ले चुकी है और उसकी मां यानी नाबालिग लड़की को उसके मां-बाप अपनाने को तैयार नहीं हैं, तो ऐसे में आरोपित किशोर को दंडित कर तीन नाबालिगों की जान खतरे में नहीं डाली जा सकती है।

उन्होंने कहा कि ऐसे हालात में तीन जिंदगियां बर्बाद हो जाएंगी। लड़का पत्नी व बच्चे को स्वीकार करते हुए उनकी देखभाल कर रहा है और आगे भी उनकी देखभाल करने का वचन कोर्ट को दिया है, ऐसे में यहां पर न्याय के साथ तीन लोगों का हित भी देखना जरूरी है।

कानून के जानकारों ने क्या कहा?

फिलहाल किशोर न्याय परिषद के इस ऐतिहासिक फैसले को कानून के जानकार अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं। अधिवक्ता सुधीर चौहान अदालत के इस फैसले से इत्तेफाक रखते हैं तो वहीं अधिवक्ता अजय सिंह इत्तफाक नहीं रखते.।

सुधीर चौहान ने कहा कि अगर नाबालिग दंपति को सजा दे दी जाती तो एक छोटे बच्चे की जिंदगी तो प्रभावित होती ही, साथ ही तीन लोगों की जिंदगी भी प्रभावित हो जाती।

तो वहीं अधिवक्ता राजेश सिंह कहते हैं, ”यह सही है कि बच्ची के वेलफेयर को देखते हुए यह फैसला दिया गया है। ऑनर किलिंग की आशंका भी जायज है लेकिन जिस समय लड़की ने बयान दिया उस समय वह नाबालिग थी इसलिए उसके बयान का कोई मायने नहीं था। इस तरह से अगर फैसला दिया जाएगा, जिसके लिए 366-ए के तहत सजा का प्रावधान है, तो ऐसे कृत्यों को एक हद तक बढ़ावा ही मिलेगा।

 

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