मोदी अब क्या करेंगे?

हुकूमत सिर्फ दो चीजो से चलती है – इकबाल और भरोसा , और बीते 30 दिनों में भारत की मोदी सरकार के लिए ये दोनों आधार दरक चुके हैं ।

प्रोपेगेंडा की राजनीति और युवा आबादी की बढ़ती बेचैनी के बीच जो अंतर्विरोध अब तक परदे के पीछे थे, वे अब खुलकर सामने आ चुके हैं। बीते 12 सालो में नरेंद्र मोदी के लिए यह सबसे कठिन मोड़ है, क्योंकि वे अपनी जिस राजनीतिक शैली के सहारे इतने आगे बढ़ चुके थे, उसी शैली में अब आगे बढ़ते रहना पहले जितना आसान नहीं रह गया है।

धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इस अर्थ में महज एक प्रशासनिक घटना नहीं, बल्कि एक ठिठकन है। मोदी अब तक जिस रफ्तार, आत्मविश्वास और नैरेटिव-निर्माण के सहारे सत्ता को हांकते आए थे, वहां पहली बार रुकने की मजबूरी दिखाई दी है। लेकिन रुकना और मुड़ना एक नहीं होते; सत्ता का वाहन कुछ देर ठहर सकता है, अपनी दिशा उतनी आसानी से नहीं बदल सकता।

जेन जी आंदोलन ने मोदी की छवि पर ऐसी चोट की है जिसे सिर्फ बयानबाजी या मीडिया-प्रबंधन से संभालना मुश्किल होगा। बारह वर्षों में पहली बार यह व्यापक रूप से महसूस हुआ कि डर का जो घेरा सत्ता के इर्द-गिर्द बना हुआ था, उसमें दरारें पड़ने लगी हैं। और यह दरारें सबसे मुखर रूप में एक ऐसी युवा पीढ़ी के जरिए सामने आईं, जिसे भय दिखाकर चुप कराना अब संभव नहीं रहा।

इस आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धि यह रही कि आंदोलनकारियों ने सत्ता प्रतिष्ठान के पैंतरों को पहले ही समझ लिया। वे जानते थे कि मुख्यधारा के कई मीडिया चैनल आंदोलन की धार को भोथरा करने की कोशिश करेंगे, इसलिए उन्होंने उन्हें स्पेस ही नहीं दिया। बल्कि कई जगहों पर उन्हें सार्वजनिक अवमानना का सामना करना पड़ा।क्या यह महज अवमानना थी ? नहीं यह सिर्फ विरोध नहीं था, यह उस पूरे संचार तंत्र से असहमति थी जो लंबे समय से सत्ता के पक्ष में नैरेटिव सेट करता रहा था।

सोशल मीडिया ने इस आंदोलन को वह गति दी जो किसी पारंपरिक संगठन के बूते संभव नहीं थी। दुसरे देशो के जनांदोलनो की तरह यहां भी डिजिटल माध्यम ने सिर्फ सूचना नहीं पहुंचाई, बल्कि बेचैनी को साझा अनुभव में बदला। यही वजह रही कि यह आक्रोश दिल्ली की सीमाओं में नहीं रुका, बल्कि देश के कई हिस्सों में इसकी गूंज सुनाई देने लगी।

आंदोलन के केंद्र में शिक्षा, पेपर लीक, भर्ती में पारदर्शिता, रोजगार और अवसरों की कमी जैसे ठोस सवाल थे, साथ ही यह किसी एक राजनितिक दल का कार्यक्रम नहीं था और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत भी थी। सत्ता या उसके अनुगामी मीडिया के लिए इसे देशद्रोह, सांप्रदायिकता, हिंदू-मुसलमान या किसी और परिचित प्रोपेगेंडा फ्रेम में फंसाना आसान नहीं था।

जब सवाल पेट्रोल में इथेनॉल की मिलावट से लेकर पेपर लीक और भ्रष्टाचार तक फैलते हैं, तब पुराने नैरेटिव अपनी उपयोगिता खोने लगते हैं।

मोदी की राजनीति का सबसे बड़ा हथियार हमेशा यह रहा कि वे वास्तविक मुद्दों पर बहस को प्रतीकात्मक राजनीति, भावनात्मक राष्ट्रवाद और आक्रामक नैरेटिव-मैनेजमेंट में बदल देते थे। लेकिन इस बार वह फार्मूला कमजोर पड़ गया । धुरंधर जैसी प्रोपेगेंडा-धर्मी सिनेमा मशीनरी ने जिस छवि को चमकाया था , जब सवाल युवा पीढ़ी के बीच से उठे, तो वही चमक फीकी पड़ गई। मीम्स, नारों और व्यंग्य ने मिलकर उस आभामंडल को खरोंचना शुरू कर दिया जिसे वर्षों में बड़ी सावधानी से गढ़ा गया था।

धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वह सत्ता की मजबूरी का प्रतीक बन गया। यह कोई स्वैच्छिक नैतिक निर्णय कम, और तनाव को टालने की रणनीतिक कीमत अधिक लगता है। लेकिन जनता, खासकर युवा वर्ग, इसे सरकार की कमजोरी नहीं बल्कि अपने दबाव की जीत के रूप में पढ़ रहा है।

यही वह मनोवैज्ञानिक मोड़ है जहां सत्ता का भय टूटता है और सवाल पूछने की आदत पैदा होती है।

मोदी के सामने अब चुनौती केवल विपक्ष की नहीं है। चुनौती उनके अपने राजनीतिक मॉडल की है। राम मंदिर के चढ़ावों की लूट, महंगी शिक्षा, रोजगार संकट, पेपर लीक, और इथेनॉल मिलावट जैसे मुद्दे अब अलग-अलग खांचे में नहीं हैं; ये सब मिलकर उस शासन-विश्वास को चुनौती दे रहे हैं जिस पर मोदीवाद की इमारत टिकी थी। जब विकास, शुचिता और राष्ट्रवाद के दावे भ्रष्टाचार, असमानता और असुरक्षा के सवालों से टकराते हैं, तो प्रचार की दीवारें दरकने लगती हैं।

विदेश नीति के स्तर पर भी नैरेटिव का जादू लगातार कमजोर हुआ है। डोनाल्ड ट्रंप जैसी अक्खड़ और अपमानजनक टिप्पणियों ने उस छवि-निर्माण को बार-बार झटका दिया, जिसे सरकार अक्सर रणनीतिक सफलता की तरह प्रस्तुत करती रही। इससे यह साफ हुआ कि वास्तविकता को लंबे समय तक छिपाया नहीं जा सकता; एक न एक दिन वह राजनीतिक भाषण को पीछे छोड़कर सामने आ जाती है।

अब मोदी के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि वे क्या बोलेंगे, बल्कि यह है कि वे क्या बदलेंगे। यदि जवाब सिर्फ और अधिक प्रोपेगेंडा है, तो वह पहले से कमजोर होती सत्ता को और कमजोर करेगा। यदि जवाब संस्थागत सुधार, जवाबदेही और पारदर्शिता है, तब भी समस्या यह होगी कि क्या वे अपनी ही बनाई शैली से बाहर निकल सकते हैं।

सच यह है कि सत्ता का शीराजा बिखरना शुरू हो चुका है। मोदी अब उस स्थिति में नहीं हैं जहां वे हर संकट को अपनी ताकत में बदल दें। अब उन्हें मलबे को समेटना है, नई इमारत बनानी नहीं। और मलबा समेटना, इमारत खड़ी करने से कहीं कठिन काम होता है।

यही वह क्षण है जब जनता, खासकर युवा, सत्ता से पहले बार-बार पूछ रहे सवालों को दोहराने लगी है। और यही सवाल सबसे ज्यादा खतरनाक हैं, क्योंकि इनके जवाब मोदी के पास नहीं हैं — और शायद कभी थे भी नहीं।

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