Thursday - 6 May 2021 - 7:09 PM

एकदलीय शासन व्यवस्था किन लोगों को रास आ रही है

के. पी. सिंह

पश्चिम बंगाल में विधान सभा चुनाव के चौथे चरण में कूच बिहार में जो हिंसा हुई उससे यह बात पूरी तरह उजागर होकर सामने आ गई है कि राज्य में चुनाव नहीं युद्ध हो रहा है।

गत विधान सभा चुनाव में राज्य की 294 सीटों में से 211 सीटें टीएमसी को मिली थी लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में तीन साल में ही भाजपा की शक्ति इस राज्य में इतनी बढ़ी कि यहां लोकसभा की 42 सीटों में से 18 उसके हाथ में आ गई और टीएमसी उससे मात्र चार सीटें आगे रह सकी।

भाजपा का इसके बाद उत्साहित होना स्वाभाविक था। इसलिए इस बीच उसने वर्तमान चुनाव में राज्य की सत्ता हथिया लेने के इरादे से कटिबद्ध होकर काम किया।

किसी भी राजनीतिक पार्टी द्वारा अपनी सत्ता के अधिक से अधिक विस्तार का मंसूबा रखना अनैतिक नहीं है। लेकिन भाजपा लोकतांत्रिक संस्कृति का हनन करके अपने अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े को दौड़ा रही है जो चिंतनीय है और इसके खतरनाक दूरगामी नतीजों का अनुमान किया जा सकता है।

मोदी सरकार पहले तक लोकतांत्रिक सिस्टम के दायरे में देश की प्रगति को आगे बढ़ाने का लक्ष्य सबके दिमाग में था। लोकतांत्रिक सिस्टम यानि बहुदलीय व्यवस्था जिसके तहत यह सोचा जा सकता था कि मूलभूत रूप से देश की संवैधानिक व्यवस्था कायम रखते हुए समय-समय पर होने वाले चुनावों में विभिन्न दलों के बीच बेहतर विकल्प का इस्तेमाल करने की सुविधा जनता को हासिल है।

इसलिए प्रतिपक्ष के अधिकार और सम्मान को तब तक बहुत महत्व दिया जाता था। केन्द्र में पहली बार जब गैर कांग्रेसी सरकार 1977 में बनी थी तो इसी भावना के तहत उसने केन्द्र और राज्यों में नेता प्रतिपक्ष को कैबिनेट मंत्री का दर्जा देने का फैसला घोषित किया था। पर 2014 के बाद इस माइंड सेट को बहुत करीने से आहिस्ता-आहिस्ता बदला गया।

2014 और 2019 में लोकसभा में तकनीकी आधार की आड़ लेकर नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति को जो रोका गया उसका सीमित उद्देश्य नहीं माना जाना चाहिए। देश में नई कवायद के लिए यह पहला चरण था। धीरे-धीरे यह बात बहुसंख्यक लोगों के मन में बिठा दी गई कि बहुदलीय लोकतंत्र अल्पसंख्यक तुष्टीकरण जैसी बुराईयों के लिए अभिशप्त है। इसलिए इससे छुटकारा पाना होगा।

कांग्रेस मुक्त भारत के नारे में इसकी प्रारम्भिक अभिव्यक्ति की गई लेकिन इसकी परिणति एक दलीय शासन तक पहुंचने की थी जिसमें अन्य प्रतिद्वंदी दलों को निरस्त किया जाना था और भाजपा का यह अभियान आज बहुत स्पष्टता के साथ प्रकट होकर सामने आ गया है।

भाजपा लोगों के एक बड़े हिस्से को इस बात से सहमत करने में सफल हो गई है कि बहुदलीय व्यवस्था के चलते ऐसा शासन तंत्र देश में कायम रहा जिसका अघोषित ध्येय हिन्दुओं को अपमानित और उत्पीड़ित करना हो गया था।

इसलिए ऐसी व्यवस्था को दफन करके नया रास्ता अख्तियार करना लाजिमी हो गया है। जाहिर है कि इस उठापटक में संविधान के फंडामेंटल की अपरिवर्तनीयता का सिद्धांत आप्रासांगिक बना दिया है।

भाजपा शासित राज्यों में हिन्दू राष्ट्र की झलक देते हुए फैसले खुल्लम खुल्ला लिये जा रहे हैं। इससे संवैधानिक लोकतांत्रिक सिस्टम को व्यवहार के स्तर पर नकारे जाने की स्थिति साफ दिखाई दे रही है।

देश की विभिन्न स्वायत्त संस्थायें धीरे-धीरे सरकार की अनुचर संस्थाओं में तब्दील हो रही हैं। पश्चिम बंगाल में जब कोरोना और कानून व्यवस्था पर आधारित लचर दलीलों के हवाले से आठ चरणों में मतदान कराने का फैसला लिया गया था तभी साबित हो गया था कि चुनाव आयोग से अब स्वतंत्र निकाय के रूप में काम करने की आशा रखना व्यर्थ है।

इसके बाद बंगाल व अन्य चुनावी राज्यों में ऐसे कई और प्रसंग भी सामने आये जिससे इसकी पुष्टि हुई। असम में भाजपा नेता हेमंत विस्वा सरमा पर उनके धमकी भरे बयान के कारण लगाया गया 48 घंटे का फैसला 24 घंटे तक सीमित कर देना भी इसका उदाहरण बना। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी बंग्लादेश यात्रा का जो चुनावी इस्तेमाल किया उस पर चुनाव आयोग को हस्तक्षेप करना चाहिए था पर वह अपने मुंह में दही जमाये रहा।

यह भी अदभुत स्थिति पहली बार देखी गई कि पश्चिम बंगाल में एक जगह मतदान होता रहता था और बगल में दूसरी जगह सभा में प्रधानमंत्री के भाषण का अविकल प्रसारण इलेक्ट्रोनिक चैनलों पर चलता रहता था जिसकी रोकटोक की कोई जरूरत चुनाव आयोग नहीं समझ रहा था।

पहले सत्तारूढ़ पार्टी की इस धांधलगर्दी के कारण जनता में प्रतिक्रिया हो जाती थी और विपक्ष को उसकी सहानुभूति का लाभ मिल जाता था लेकिन अब ऐसा क्यों नहीं हो रहा इसको समझने की जरूरत है। लोगों के इस बदले माइंड सेट की वजह से ही सरकार को चुनावी पवित्रता के साथ खिलवाड़ करते समय लोकलाज का डर बिल्कुल नहीं लगता।

मुख्य राष्ट्रीय विपक्षी दल कांग्रेस के साथ-साथ कमोवेश अन्य राज्यों के विपक्षी दल भी भाजपा के बवंडर में फंसकर पस्त हो चुके हैं और बहुदलीय लोकतंत्र के मजबूत पिलर के रूप में प्रमुखता से टीएमसी का ही नाम रह गया है जिसकी उपस्थिति भले ही मात्र एक राज्य में हो लेकिन अपनी मुखरता के कारण ममता बनर्जी भाजपा को हलकान किये रहती हैं। इसलिए देश के प्रभावशाली वर्ग का जो नया माइंड सेट है उसे किसी भी तरह इस पिलर को गिराना जायज लग रहा है।

यह दूसरी बात है कि ममता बनर्जी के चुनावी प्रबंधन को देख रहे प्रशांत किशोर तक को भले ही लगने लगा हो कि भाजपा पश्चिम बंगाल में हिन्दु मुसलमान करने में सफल हो गई है। लेकिन फिर भी यह कहना मुश्किल है कि ममता की पार्टी सत्ता की पटरी से एकदम उतर जाने वाली है।

हो सकता है कि उसकी सीटों की संख्या काफी घट जाये फिर भी एक वर्ग मानता है कि ममता बनर्जी ही सबसे बड़े दल के रूप में फिर सामने आयेगी।

ऐसे में व्यवस्था इस बात की भी है कि ममता की पार्टी में तोड़ फोड़ कराकर भाजपा अपना काम बना ले जाये। असम में भी उसकी स्थिति जिस तरह डांवाडोल होने का आभास हुआ है उससे भाजपा ने वहां भी प्रतिपक्ष के नये विधायकों पर डोरे डालने की कोशिशें अभी से शुरू कर दी हैं जिससे घबराई कांग्रेस को अपने कई उम्मीदवारों को राजस्थान में रखने की व्यवस्था करनी पड़ी है।

पांच राज्यों के चुनावों के बाद महाराष्ट्र की सरकार के खिलाफ एक बार फिर जोरदार आपेरशन चलेगा। इसमें पैसे का बहुत खर्चा होता है जिसकी बड़ी कीमत जनता को चुकानी पड़ती है। पर्दे के पीछे से जो उद्योगपति विधायकों की तोड़ फोड़ के लिए वित्त पोषण करते हैं वे सरकार से इसकी पूरी कीमत वसूलने में जुटे रहते हैं और तमाम नीतिगत बिडम्वनाओं व विफलताओं के पीछे यह एक बड़ा कारण है।

जो लोग अभी भी लोकतांत्रिक आदर्शो के पुराने युग में जी रहे हैं उन्हें यह घटनायें बहुत बेचैन करती हैं लेकिन तार्किक रूप से बेहद प्रभावशाली होने के बावजूद उनका प्रतिवाद अरण्यरोदन बनकर रह गया है और उनकी विफलता सत्ता पक्ष को ज्यादा बेहयायी के साथ मनमानी करने के लिए उकसा रही है।

वैसे लोकतंत्र ही सुचारू शासन व्यवस्था का एक मात्र माडल नहीं है इसका उदाहरण चीन है जहां एकदलीय शासन भी देश को बहुत प्रचंड तरीके से कामयाब बना रहा है। लेकिन भारत की एकदलीय शासन की संकल्पना और चीन की एकदलीय संकल्पना में अंतर है।

चीन में सर्वहारा का एकदलीय शासन है यानि समूचे मेहनतकश वर्ग को सर्वोपरि रखकर काम करने वाला शासन जिसकी अधिनायकवादी व्यवस्था के बरक्स बुर्जुआ लोकतंत्र का लोक कल्याणकारी निजाम परोसा गया। पर भारत जिस एकदलीय शासन तंत्र की ओर मुखातिब हो रहा है उसके लक्षण बहुत नायाब हैं।

इसका पैटर्न कुछ-कुछ साम्राज्यवादी विस्तार जैसा है। जहां शासन संचालन औपनिवेशिक होता है। स्पष्ट है कि इसमें लोक कल्याण की कोई गुंजाइश नहीं होती। इसीलिए देश की मौजूदा सरकार बड़े पैमाने पर नीतिगत विचलन का शिकार हो रही है।

हर सरकार को कम से कम इतना लोक कल्याणकारी तो बनना ही पड़ेगा कि आम लोग भी खुशहाल रह सकें पर आज हो यह रहा है कि आम लोगों के रोजगार छिन रहे हैं, उनकी आमदनी घट रही है और कोरोना के भीषण मंदी के दौर में भी सरकार के अंबानी, अडानी जैसे चहेते कारपोरेटों का मुनाफा काफी तेजी से बढ़ा है।

यह बाजीगरी लोगों के लिए अबूझ है। स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन जैसी सेवायें लोगों के शौक में नहीं बुनियादी जरूरतों में आती हैं। अगर कोई सरकार है तो उसे अपना औचित्य प्रमाणित करने के लिए इन जरूरतों को लोगों की औकात के भीतर के मूल्य पर उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी स्वीकार करनी पड़ेगी भले ही उसे घाटा हो।

सरकार संसाधन जुटाने के लिए शौक वाली व्यवस्थाओं पर ही अधिक से अधिक शुल्क लगा सकती है। पर सरकार तो उल्टा कर रही है। बस किराये तक में वह जीएसटी वसूल करती है। उसने अपने अस्पताल कबाड़ बना रखे हैं जबकि निजी अस्पतालों को मनमाना मुनाफा मरीजों और उनके तीमारदारों से ऐंठने की छूट दे रखी है।

सत्तारूढ़ पार्टी को पहले इस बात से बहुत ऐतराज था कि देश में आयातित संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है जिसके संवाहक कांवेट स्कूल हैं। इनका प्रतिरोध करने के लिए उसने विद्या भारती के माध्यम से वैकल्पिक अभियान चलाया था और उसे बड़ी कामयाबी मिली थी। पर आज उसने अपने इरादे से मुंह मोड़ लिया है।

सरस्वती विद्या मंदिर और इंटर कालेज दुर्दशा के शिकार हैं और पूरी तरह से दोहरी शिक्षा प्रणाली के माध्यम से यह सरकार भी कान्वेंट स्कूलों के लिए समर्पित हो गई है। गांव देहात और गरीबों के बच्चों के लिए आधुनिक शिक्षा प्रणाली के यह मानक डार्विनी नियति के कारण बन रहे हैं जिसमें सर्वाइविल आफ फिटेस्ट के मानकों पर पीछे रह जाने के कारण उनके भविष्य पर कालिख पुत जाना लाजिमी है।

हालांकि बहुत से लोगों को यह आपत्ति हो सकती है कि इसे औपनिवेशिक शासन कैसे कहा जाये क्योंकि यह विदेशियों का अल्पसंख्यक शासन तो है नहीं। पर यह निश्चित रूप से औपनिवेशिक शासन की लाक्षणिक विशेषताओं के ही अनुरूप शासन है।

एक तो इसमें बहुमत का विश्वास जीतने की भावना नहीं झलकती क्योंकि अगर ऐसा होता तो हर चुनाव में भारी भरकम खर्चा और हर तरीके के हथकंडे के इस्तेमाल जैसी कुरीतियों का भाजपा स्थापित हो जाने के बाद संवरण करती नजर आती पर ऐसा नहीं हो रहा। नंदीग्राम में जहां ममता बनर्जी उम्मीदवार हैं चर्चा है कि भाजपा ने प्रत्येक मतदाता को पांच हजार रूपये नकद और एक-एक साड़ी बंटवायी।

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मंहगे चुनाव का खामियाजा जनता को ही भुगतना पड़ता है। यह बात ध्यान रखी जानी चाहिए। इसलिए यह सरकार चाहे भी तो जब तक सत्तारूढ़ पार्टी महंगे चुनाव के दलदल में धंसी है तब तक लोगों की भलाई के लिए बहुत नहीं कर सकती। दूसरे बहुसंख्यक जनता सत्तारूढ़ पार्टी के साथ नहीं रह पा रही है अन्यथा उसे राज्यों में एक के बाद एक सत्ता न खोनी पड़ती।

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विदेशी शासन की तरह अल्पसंख्यक प्रभावशाली वर्ग है जिसकी वर्ग सत्ता से भाजपा की दाल रोटी चल रही है। ऐसे में राज्यों में चुनी हुई सरकारों की उलट पुलट का सिलसिला लगातार जारी रखना और उसके लिए चहेते कारपोरेटों से कृतार्थ होना भाजपा की नियति बन गया है।

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भाजपा ने विपक्ष का मनोबल भले ही तोड़ दिया हो लेकिन बहुमत का भरोसा न संजो पाना उसकी विशेषता बन गया है और यही एक ऐसा बिन्दु है जो जताता है कि अंततोगत्वा वैकल्पिक नीतियां सफल होगीं और लोकतांत्रिक सिस्टम से होता लोगों का मोहभंग बहुत दिनों तक जारी नहीं रह पायेगा आपरेशन ।

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