Tuesday - 28 September 2021 - 4:58 PM

डंके की चोट पर : पहले लोग गिद्ध कहते थे तो शर्मिंदगी लगती थी

शबाहत हुसैन विजेता

दुनिया कोरोना महामारी से जूझ रही है. साल 2020 में कोरोना आया था तब इसका नाम तक नया था. इसकी कभी दवा भी बन पायेगी यह ख्वाबों की बात थी.

साल बीतते-बीतते लोगों को इस बीमारी से काफी हद तक सुकून मिल गया. कोरोना की वैक्सीन भी तैयार हो गई. डाक्टरों ने इसे ठीक हो जाने वाला मर्ज़ बना लिया.

2021 आया तो लोगों ने यही दुआ की कि 2020 की यादें दफ्न हो जाएँ. वैसा फिर कभी दुनिया में कहीं न हो. बदले हुए साल की बात करें तो यह साल तो अपने नाम के मुताबिक़ पिछले साल पर 21 ही साबित हुआ.

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कोरोना के अस्पताल है, इलाज करने वाले डॉक्टर हैं, काफी हद तक यह पता है कि मरीज़ को क्या देना है. लोग रिकवर भी हो रहे हैं. वैक्सीन भी आ गई है. बड़ी तादाद में लोग वैक्सीन लगवा भी रहे हैं.

बीते कुछ घंटों की बात करें तो ज़मीं खा गई आस्मां कैसे-कैसे? वह नामवर चेहरे जो सिर्फ अपने नाम से पहचान थे. जिनकी इज्जत थी. जिन्हें लोग पढ़ना और सुनना चाहते थे. उन पर कब वायरस ने अटैक किया,

कब वह अस्पताल पहुंचे और कब उनकी साँसों की डोर टूट गई यह पता भी नहीं चला. सोशल मीडिया की हालत यह कि हर स्क्रोल पर एक मौत की खबर. उफ़्फ़…………. बंद कर दिया मोबाइल. न कुछ देखना है न सुनना है.

बिस्तर पर करवटें बदल रहा हूँ. वायरल से जूझ रहा हूँ. हाथ-पैरों में गज़ब की टूटन है. खाली लेटे-लेटे सोशल मीडिया ने जो डरावनी तस्वीर दिखाई उसने यह शक पैदा कर दिया कि कहीं कोरोना तो नहीं हो गया है.

अगर वाकई कोरोना हो गया है तो क्या यह किसी बात का संकेत है. अपने बचे हुए कामों को निबटा लेने की मोहलत है यह. मगर हालत ऐसी है कि बचे हुए कम निबट भी तो नहीं सकते. बहुत से साथी जो कुछ ही घंटों में गुजर गए वह भी बहुत कुछ करना चाहते थे.

छत पर घूमते पंखे, और कम रौशनी के बल्ब की रौशनी में पूरी रात एक फिल्म सी गुजर जाती है. श्मशान घाट के बाहर एम्बूलेंस की लम्बी लाइन लगी है.

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बिजली से लाशें फूंकने वाले के पास दम मरने की भी फुर्सत नहीं है. एम्बूलेंस के साथ लाश फूंकने आये पीपीई किट पहने लोग तीस-तीस घंटे इंतजार को मजबूर हैं.

कोविड गाइडलाइन है कि कोरोना से मरने वाला बिजली वाले सिस्टम से जलाया जाएगा. एम्बूलेंस बढ़ती जा रही हैं. एक प्रशासनिक अधिकारी ऐसे में थोड़ी ढील देने की बात कर रहा है.

वह कहता है कि श्मशान के प्लेटफार्म की तरफ कोई नहीं जाएगा. लाश लेकर प्लेटफार्म के पीछे जाओ, नदी के बिल्कुल किनारे. वहां फूंक दो. मगर एक बार में छह से ज्यादा लाशें नहीं.

प्रशासनिक अधिकारी अहसान कर चला जाता है. मरने वाले के घर वाले लकड़ियों के लिए दौड़ते हैं. लकड़ियाँ बहुत कम हैं. जो हैं वह कई गुना दाम पर हैं. मोलभाव चल रहा है. जो भी हो अब नदी के किनारे भी छह-छह लाशें जल रही हैं.

लाशों को सड़ने से बचाने के लिए गाइडलाइन्स में भी छूट दे दी गई. मगर यह छूट करेगी क्या? श्मशान पर तो भीड़ जहाँ की तहां नज़र आ रही है. जिसके घर मौत हुई उसके घर में दोहरी मुसीबत है. एक तरफ मौत, दूसरी तरफ अंतिम संस्कार में दिक्कत.

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हिन्दुस्तान के बहुत से सूबों में नाइट कर्फ्यू और लॉक डाउन की शुरुआत फिर से हो गई है. रात को नौ बजे से सुबह छह बजे तक घरों से निकलने की छूट नहीं है. शाम होते ही लोग घरों की तरफ भागने लगते हैं क्योंकि यह सबको पता है कि नौ बजे कोरोना जाग जाएगा.

मुल्क के पांच सूबों में चुनाव की बहार है. देश की सरकार इन पाँचों सूबों में डबल इंजन की सरकारें लाकर विकास की नदियाँ बहाने पर आमादा हैं.

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पाँचों प्रदेशों में सड़कों पर ऐसी भीड़ जमा है जैसे कि उत्सव चल रहा हो. न किसी के चेहरे पर मास्क. न कोई गाइडलाइन.

चुनाव मस्त होना चाहिए, कोरोना से तो फिर भी निबट लिया जायेगा. कुछ लाख लोग मर भी गए तो क्या फर्क पड़ता है. जो बचेंगे कम से कम वह तो शान की ज़िन्दगी गुजारेंगे.

कोरोना की गाइडलाइन दो ही जगह टूटी है. या तो श्मशान में या फिर वहां जहाँ चुनाव है. नयी उम्र के लोगों ने गिद्ध नहीं देखे, मेरे बचपन में खूब होते थे. आसमान में काफी ऊँचाई से वह ज़मीन पर पड़ी लाश देख लेते थे. और उसे खाकर अपना पेट भर लेते थे.

गिद्ध ज़्यादातर जानवरों की लाशें ही खाते थे, कई बार जंगलों में किसी का मर्डर हो जाता था तो उसे भी वह खा लेते थे. गिद्धों का पेट भरने के लिए पारसी समुदाय का यह रिवाज था कि मरने वाले की लाश को लकड़ी के तख्त पर खुले में लिटा दिया जाता था,

गिद्ध लाश खा लेते थे और हड्डियाँ दफ्न कर दी जाती थीं. यह परम्परा यही सोचकर शुरू की गई होगी कि जब तक जिस्म में सांसें हों सबका भला हो और जब जिस्म बेजान हो जाए तो किसी का पेट भर जाये.

देश के पांच सूबों में इलेक्शन, इलेक्शन में सभी ज़िम्मेदारों की भागीदारी, ऐसा नहीं कि उन्हें पता नहीं कि कोरोना ने अचानक से बड़ा हमला बोल दिया है.

वो सब जानते हैं. यह सारे लोग दिन में भाषण देते हैं, रात में कोरोना से मरने वालों की गिनती करते हैं. नाईट कर्फ्यू और लॉक डाउन का एलान करते हैं.

इन गाइडलाइन को तोड़ने वालों से वसूली का हुक्म जारी करते हैं. अभी पंचायत चुनाव भी कराना है. कोरोना को शहर से गाँव तक हर जगह पहुंचाना है.

सुबह होने लगी है. असमान में सूरज निकलने से पहले की रौशनी भेज रहा है. इस रौशनी के साथ यह अहसास भी पैदा हो रहा है कि कहीं गिद्धों ने खादी तो नहीं पहन ली.पहले लोग गिद्ध कहते थे तो शर्मिन्दगी लगती थी, अब नेता कहते हैं तो बुरा नहीं लगता.

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