Monday - 3 August 2020 - 2:22 PM

विकास दुबे बन गया सरकार के गले की हड्डी

केपी सिंह

विकास दुबे प्रकरण में सरकार की खोखली कार्रवाइयां उजागर हो गई। विकास दुबे ने कुछ ही दशकों में मामूली हैसियत से अरबों रूपये की संपत्ति जुटा ली थी। जबकि उसका अपराध क्षेत्र भी बहुत व्यापक नहीं था। विकास दुबे का गुर्गा जय वाजपेयी 6-7 साल पहले 4000 रूपये की नौकरी में गुजारा करता था लेकिन इतने कम समय में उसकी गिनती भी कानपुर के बड़े रईसों में विकास दुबे के करिश्में के बदौलत होने लगी थी। विकास दुबे और उसके जय वाजपेयी जैसे पलेतों का कारोबार अभी बदस्तूर चलता रहता अगर उसने थोक में पुलिस कर्मियों को शहीद न किया होता।

सच बात यह है कि न जाने कितने विकास दुबे पड़े हैं जो हर शहर और महानगर में गलत कार्य करके करोड़पति और अरबपति बन चुके हैं। अपराध और काले धन की इस समानान्तर व्यवस्था को तोड़ने में सरकार और प्रशासन की दिलचस्पी न तो कभी रही है और न है। अगर सरकार समय रहते इन्हें कानून के शिकंजे में जकड़ने के लिए तत्पर हो जाये तो न तो पुलिस कर्मियों को शहीद करके माफिया सरकार की नाक काट सकते हैं और न ही सरकार के लिए आम जनता जो कि कपोतव्रती है, को अंधाधुंध टैक्स के कुल्हाड़े से हलाल करने की जरूरत पड़ सकती है।

पहले की सरकारें अपराधियों की सरपरस्ती में खुले आम लगी रहती थी क्योंकि शार्ट कट में चुनाव जीतना और अपनी कई पुस्तों के लिए शाही बंदोबस्त करना उन्हें चलाने वाले सूरमाओं ने अपना मकसद बना रखा था पर वर्तमान केन्द्र और राज्य सरकार के कमांडर तो अलग फितरत के लोग लगते हैं जिन्हें न खुद जायदाद बनाना है और न ही अपने खानदानियों को सत्ता कैश कराने की छूट देना गवारा है। फिर ये लोग गलत काम करने वालों पर कृपालु क्यों हैं यह एक रहस्य है।

केन्द्र सरकार के पास सीबीआई, आयकर, ईडी आदि तमाम सरंजाम है। अगर व्यवस्था बदलनी थी तो उसे रातोंरात कुबेर बने लोगों की कुंडली जांचने का अभियान चलाना चाहिए था। चुनाव के पहले तो सत्तारूढ़ पार्टी के नेता दम भरते थे कि देश में इतना काला धन है जो बरामद कर लिया जाये तो नये टैक्स लगाना तो दूर सरकारी खजाने में इतना माल आ जायेगा कि हर नागरिक के खाते में 15-15 लाख रूपये की रकम पहुंचायी जा सके। लेकिन जब पार्टी सरकार में आ गई तो कालाधन बाहर निकालने की जिम्मेदारी को लेकर उसने अपनी आंखे मूंद ली। इन मामलों में कार्रवाई करने वाले उसके विभाग केवल प्रतिद्वंदी पार्टियों के नेताओं के दमन तक अपने सरोकार समेटे हुए हैं। भाजपा के प्रति लोगों में इसी कारण मोह भंग हो रहा है जबकि उसके इकलौते बचे विश्वास के भी हश्र को देखने की परिणति लोगों की लोकतंत्र में अनास्था के रूप में सामने आ सकती है जो कि काफी खतरनाक होगा।

राज्य सरकार का भी यही आलम है। लोकायुक्त, एन्टीकरप्शन, भ्रष्टाचार निवारण संगठन, आर्थिक अपराध अनुसंधान संगठन आदि का लम्बा तामझाम उसने सफेद हाथी बनाकर रख छोड़ा है। विकास दुबे प्रकरण के बाद भी सरकार जागती नहीं दिखाई दे रही है जबकि उसे अपने इस भारी भरकम तंत्र को पहले से ही नव धनाढ़यों की जांच में लगा देना चाहिए था।

भूमाफियाओं के खिलाफ योगी जी ने चुनाव के पहले बड़ी जोरदार गर्जना की थी लेकिन बाद में कार्रवाई के नाम पर उसने जनता के साथ सिर्फ धोखा किया। शहरों में करोड़ों रूपये की जायदाद ताबड़तोड़ हथियाने वाले बदमाश, भूमाफिया विरोधी अभियान से मुक्त रखे गये और इसका आपरेशन गांव में ग्राम समाज की संपत्ति पर कब्जा करने वाले छुटभैयों तक सीमित कर दिया गया। इसमें भी निरंतरता नहीं रखी गई नतीजतन जो कब्जे हटाये गये थे अभियान ढ़ीला पड़ते ही वे फिर से कायम हो गये।

अधिकारियों का यह हाल है कि अपनी तरफ से तो उन्हें गलत आदमियों के खिलाफ कोई पहल करना सूझता ही नहीं है, अगर किसी ने शिकायत की तो उस पर भी प्रभावी जांच गवारा नहीं है। मुख्यमंत्री पोर्टल तक ढ़कोसला साबित होकर रह गया है। निराश होकर लोगों ने अपने साथ होने वाले अन्याय की बात हो या काले धंधे और जोर जबरदस्ती की। सूचना देने की खामोश रहना ही अपनी नियति मान लिया है।

जाहिर है कि जब कानून व्यवस्था ऐसी होगी तो विकास दुबे जैसे माफियाओं के लिए समाज का सिरमौर बनने का स्कोप बन ही जायेगा। उनके दरबार में फरियाद करने से कुछ तो निष्कर्ष निकलता है। हर जिले में माफियाओं की समानांतर सरकार इसी कारण फल फूल रही है।

विकास दुबे से अधिकारियों की सांठगांठ सामने आना भी एक पहलू है जिस पर गरमा गरम चर्चा की जा रही है। अधिकारियों को उन लोगों की सोहबत रास आती है जो कुछ माल दे सकें फिर भले ही वे माफियां हो या नटवरलाल। अभी कुछ दिनों पहले पशुपालन विभाग में आटा सप्लाई का ठेका दिलाने के नाम पर एक व्यापारी से 9 करोड़ रूपये ठग लिये जाने का प्रकरण सामने आया था। पता चला था कि जो पत्रकार इसमें पकड़ा गया वह एक सीनियर आईएएस और एक आईपीएस अधिकारी की किचन कैबिनेट का मेम्बर था। इनकी सरकारी गाड़ी तक का इस्तेमाल करता था इसलिए लोग उसका विश्वास कर लेते थे। ज्यादातर अधिकारियों की संगत ऐसे ही भले मानुषों में है।

झांसी में सचिवालय के बड़े अधिकारी के कृपापात्र का किस्सा सुनने को मिला जिसे कोई अर्हता न होने के बावजूद भौकाल के लिए सरकारी गनरों का लश्कर मिला हुआ था। उमा भारती जैसी दिग्गज नेता ने इसकी शिकायत ऊपर की तो उसके गनर छीने जाने लगे लेकिन कुछ ही घंटों में सचिवालय से फोन आ गया जिसके बाद स्थानीय अधिकारियों को उसके गनर वापस करने पड़े। जब उमा भारती तक को अगूंठा दिखाया जा सकता है तो आम आदमी की आपत्ति की विसात क्या है। इससे लगता है कि नौकरशाही की किस कदर मनमानी सूबे में चल रही है। मुख्यमंत्री अगर इससे अनभिज्ञ हैं तो सरकार और प्रशासन पर उनकी पकड़ को लेकर स्वाभाविक रूप से उगलियां उठेंगी ही।

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विकास दुबे प्रकरण में एक थानाध्यक्ष और एक चौकी इंचार्ज को उसकी मदद करने और शहीद पुलिस कर्मियों की हत्या के षणयंत्र में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिन पुलिस कर्मियों का जमीर इतना बिकाऊ हो कि वे माफिया आका की वफादारी के लिए अपने अधिकारी को मरवाने तक में संकोच न करें उन्होंने माफियाओं से कितना कमाया होगा। योगी सरकार ने एक अभियान चलाया था कि ऐसे पुलिस कर्मियों और अधिकारियों को चिन्हित कर बर्खास्त कराया जाये जिन्होंने नौकरी में रहते हुए अपनी हैसियत अनुमान से बहुत परे बढ़ा ली हो। लेकिन इस डींग में कितनी लफ्फाजी थी यह अब पता चल गया है। किसी भी जिले में इस पर कोई काम नहीं हुआ। जिनकी फाइलें पहले से ही लम्बी गैर हाजिरी या अन्य कारणों से तैयार थी उन्हीं की बर्खास्तगी कर सरकार ने अपना आंकड़ा गिना डाला। अगर अप्रत्याशित समृद्धि के सौपान चढ़ चुके पुलिस कर्मियों पर निष्ठापूर्वक निशाना साधा गया होता तो कानपुर के चौबेपुर के तत्कालीन थानाध्यक्ष जैसे आस्तीन के सांप पहले ही कुचल दिये गये होते। अभी भी अदने पुलिस कर्मियों पर कार्रवाई करके संदेह के घेरे में आये बड़े अफसरों की ओर से ध्यान बटाया जा रहा है।

जिलों के नाम परिवर्तन, मंदिर निर्माण आदि कार्य भाजपा के ऐजेंडे में रहे हैं और चुनाव में उसकी जीत से इस ऐजेंडे पर मुहर लग गई है। इसलिए सरकार अगर यह काम कर रही है तो उसे अन्यथा नहीं कहा जा सकता पर विचारधारा कुछ भी हो, सरकार का स्वरूप कुछ भी हो लेकिन उसकी प्राथमिकता के कार्य दूसरे होते हैं। इसलिए सरकार अपने मुख्य कर्तव्यों से क्षेपक कार्यो के आधार पर बरी नहीं हो सकती। अगर ऐसा किया जाता है तो बाद में इतिहास इस तरह की सरकार की बडाई करने वाला नहीं है। इसलिए शासन व्यवस्था के बुनियादी मोर्चो पर ध्यान देना ही होगा जो भ्रष्टाचार पर लगाम और चुस्त दुरूस्त कानून व्यवस्था में निहित है। खंडित सोच के कारण ही विकास दुबे का मामला प्रदेश सरकार की गले की हड्डी बन गया है जिससे उसके प्रति समर्पित मजबूत वोट बैंक में विद्रोह और आक्रोश की भावना देखी जा रही है।

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डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Jubilee Post उत्तरदायी नहीं है।
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