Wednesday - 12 August 2020 - 8:54 PM

समाज न पिता की ओर है न पुत्री की ओर

डॉ. श्रीश पाठक

जाति तथ्य है। जातिवाद तथ्य है। अंतरजातीय विवाह की अस्वीकार्यता तथ्य है। पितृसत्तात्मकता तथ्य है। स्त्री का वस्तु समझा जाना और पुरुष का नियामक समझा जाना तथ्य है।

एंथ्रोपोलॉजी एवं डीएनए तक की यात्रा हम मनुष्य कर चुके हैं, लेकिन जाति की माया से भी पुरजोर जकड़े हुए हैं। जाति की यह बीमारी अभी कितनी ही शहादतें लेगी, कितनी ही पीढिय़ां अभी इसकी आंच में कुम्हलायेंगी।

अपने देश में शिष्टाचार सुभाषित का पहला अध्याय ही संतानों से और संतानों के लिए ही प्रारंभ होता है, यह तथ्य है। मुझे साधारणतया कोई बुजुर्ग नहीं मिला जो अपने से छोटों के समक्ष विनम्रता से झुकने का साहस रखता हो और केवल जैसे-तैसे गुजरे वर्षों की खातिर अकाट्य सम्मान का लोभी न हो।

अध्ययन, बेरोजगारों के लिए समझा जाता है, नौकरी मिलते ही बहुधा अध्यापक भी केवल अखबार पढ़ते हैं। बदलते समय से कदमताल करने के लिए समाज को जिस सतत स्वाध्याय की आवश्यकता है, वह अनुपस्थित है, फिर सामाजिक अपवाद समझ कैसे आएंगे, उनसे ऐसे ही भद्दगी से निपटने की कोशिश होगी, जैसे माननीया आजतक की अं ओ क निपट रही हैं।

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साभार

आज के समाज में कैसा है पिता ?

अपने महान खानदान की इज्जत का सबसे उम्रदराज सेनापति। अपने लड़कों को वह सतत तैयार करता है ताकि वह उसकी जगह ले सके और खानदान की इज्जत बची रहे और लड़कियों को समझाबुझाकर अपनी इज्जत के संकीर्ण छिद्रों को ढंकता रहता है। इतनी तैयारी कैसे कर लेता है यह शख्श, क्योंकि अभी कुछ दिनों पहले तक यह दूसरों के इज्जत के किले ढहाता रहा है।

भावनाएँ स्वाभाविक हैं और जब कोई नहीं देख रहा होता तो वह खालिस पिता होता है, खूब फफक कर रोता है, इस अकेलेपन में वह निर्मम समाज को कोसता है, अपने उन रिश्तेदारों को कोसता है, जिन्होंने उससे हमेशा सहायता ली है पर आज खुलकर घटना की सच्चाई भांति-भांति प्रकार से बता फिर रहे, हर राहगीर को।

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किसी एक खटक पर बेबस पिता फिर उठ खड़ा होता है, समाज में रहने के लिए। अब उसे सामाजिक इज्जत की दो अग्निपरीक्षाएं उत्तीर्ण करनी है। प्रकट में उसे कहना है कि कोई बात नहीं, लड़की बालिग है। फिर उसे दिखाना है कि वह वैसा लिजलिजा पिता नहीं है जो इज्जत को ताक पर रख दे। उसकी परवरिश में कोई कमी नहीं है, वह अपनी पुत्री जैसा नहीं है। वह पहले की तरह ही अपनी इज्जत का सेनापति बना रहेगा। पहली परीक्षा वह देता है ताकि उसे कोई पिछड़ा न कहे, दूसरी परीक्षा वह देता है ताकि कोई उसे असामाजिक न कहे। विडंबना यह कि इन दोनों परीक्षाओं का परिणाम समाज उसे कभी भी स्पष्ट नहीं देता, बस खीं-खीं करता है।

काश कि पिता स्वाध्यायी होता, वेद-पुराण, उपनिषद को पढऩे का अवसर उसे उसके पिता ने दिया होता। पिता के पिता ने और पिता के किसी भी कक्षा के किसी अध्यापक ने काश कि यह भी सिखाया होता कि शिक्षा केवल रोजगार पाने तक सीमित नहीं है तो वह दुनिया भर की संस्कृति, इतिहास, समाज और राजनीति से परिचित होता, बोध तब केवल शाब्दिक न होता, फिर ऐसी घटना उसे घटना नहीं लगतीं, उसे समझ आता कि इज्जत लोककल्याणकारी कार्यों को करने से बनती है और जरा से कपड़े के अपनी जगह से हिल जाने भर से वह समाप्त नहीं हो जाती।

वह खलील जिब्रान की इस उक्ति से परिचित होता कि संतानें उससे हैं पर उसकी नहीं हैं। वह इतना स्वाभाविक व्यवहार करता कि वही टीआरपी की रौरव भूखी मीडिया फिर अपना दूसरा नैरेरिव सेट करती और इस खबर को चरने लगती।

कैसा है आजकल का प्रेम?

बचपन से ही अनगिनत फब्तियां लड़के-लड़कियां सुनते हैं विवाह के बारे में अपने माता-पिता और रिश्तेदारों से हंसी मजाक और फटकारों के रूप में, फिर वे देखते-सुनते हैं कि पड़ोस में कल क्या हो गया और परसो क्या हो गया, कि कैसे एक ससुर ने बहु को हाथ लगाया, कि कैसे एक कुंवारी पड़ोसन का बलात्कार पड़ोसी विधुर ने कर दिया और फिर उबकाई करती उस स्त्री से महान समाज चाहता है कि वह विधुर विवाह कर ले, आदि-आदि।

साभार

अपने-अपने घरों और आंगनों में घटने वाले हर अश्लील अपवादों को बच्चे देखते हैं कि हम उन्हें कैसे ढंकते हैं अथवा मौन रह जाते हैं, वे हमारा दोहरापन लगभग रोज ही देखते हैं , वे बड़ों का पारिवारिक मूल्यों एवं मर्यादाओं से होते नित्य स्खलन को भी देखते हैं और हम उन बच्चों को कहते हैं कि अब थोड़ा मैच्योर बनो, समझो कि क्या कहना है क्या छिपाना है।

अनगिनत परंपराओं एवं मूल्यों के बीच बच्चे इतना जरूर देख लेते हैं कि समरथ को नहीं दोष गुसाईं और यह भी कि अंतत: क्या करना जरूरी है। अपनी इज्जत के लिए जुटाते बड़े घर, बड़ी गाड़ी की हवस में अपने बड़े होते बच्चे के पास बैठने भर का समय नहीं होता, मां से पूछिए तो बताएंगी कि पिता ने बाहर गपशप को अधिक समय देना ज्यादा मुफीद समझा है कि नहीं।

पिछले दो दशक के पिता महज एटीएम बने हैं और माता महज घरेलू संचार विभाग। यह जान लें समझ लें कि बच्चे यदि अपने बड़ों से कुछ भी छिपा रहे हैं तो इसका अर्थ सीधा है कि बड़ों ने उन्हें स्पेस नहीं दिया है, उनकी भाषा में रुचि नहीं ली है, उनकी परेशानियों को अपनी परेशानियों के सामने बहुत बौना करार दिया है। यहां बड़े अपने बड़प्पन से चूके हैं। ध्यान रहे, उम्र का गुजरना बड़ा होना नहीं है, क्रमश: बड़प्पन बटोरना बड़ा होना है। जहां ऐसा नहीं है, वहां अपवाद भी नहीं हुए हैं।

धार्मिक प्रसंगों को छोड़ दें तो विवाह से जुड़ी हर चर्चा व उससे जुड़े हर गीत में सेक्स और शरीर आपको मिलेगा, लेकिन विवाह को परम पवित्र कहते हैं और जो युवा सचमुच किसी प्रेम में आ पड़ते हैं तो उसका मूल्यांकन समाज केवल भोग को आधार बनाकर करता है। समाज को अपना यह दोहरापन दिखता ही नहीं।

आप किसी बुजुर्ग से बात कर लीजिए प्रेम पर। चर्चा धार्मिक होगी तो वे प्रेम पर आपको परम उदात्त दिखाई पड़ेंगे और जैसे ही चर्चा सामाजिक होगी उन्हें प्रेम और सेक्स में रत्ती भर भी अंतर न सूझेगा। पूछिये किशोरी बच्चियों से कि उन्हें अकेले में किसी बुजुर्ग से अधिक डर लगता है जब वे अजीब ढंग से बेटी-बेटी करते हैं या किसी हम उम्र किशोर से लगता है, चीजों की जड़ समझ आएंगी। सरेआम शादियों में नाचती नर्तिका के ब्लाउज में रुपये ठोकने वाली पीढ़ जब अपने जमाने को बेहतरीन कहती है और आज की पारदर्शी पीढ़ी को बुरा कहती है तो मुझे वितृष्णा होती है। बच्चे, फिर भी बच्चे हैं, जिम्मेदारी बुजुर्गों की अधिक है। बड़े बनकर आप अपनी कमजोरियां और दोहरापन स्वीकार करिये, देखिए बच्चे आपका दोनों हाथ पकड़ते हैं कि नहीं।

किसकी ओर है समाज?

ध्यान से देखिए, इस प्रकरण में समाज किसकी ओर रहेगा! जो समाज झील सा ऊपर-ऊपर से सुंदर होगा और अंदर से रुके हुए पानी की सड़ांध लिये होगा तो यकीनन ज्यादातर लोगों को केवल पिता का दर्द दिखेगा। समाज यदि प्रगतिशील बहते धाराओं की नदी सा हुआ तो हौले से पिता-पुत्री दोनों को अपने अंक में भर निर्मल कर देगा।

साभार : बीबीसी

कभी सोचियेगा कि हम जैसे समाज में रहते हैं उसमें उस पुत्री के पास क्या शेष होगा। हर एक पितृवादी सत्ता का शख्श उसके असफल होने की आशा कर रहा होगा। उस कम उम्र की बच्ची से बेहद जिम्मेदार होने की अपेक्षा यह परम गैर-जिम्मेदार समाज कर रहा होगा। ऐसा नहीं कि यह समाज पिता को कोई सहारा दे देगा। यह पिता को भी जब तब नश्तर मारेगा, पिता आह भी न कर

सकेगा, सबसे निकृष्ट रिश्तेदार भी पिता के समक्ष अब बार-बार मर्यादा का टॉपिक छेड़ेगा। विचारिये, समाज की आवश्यकता हम मनुष्यों को क्यों है और देखिये कि जिस समाज में हम रह स्वयं को सभ्य सामाजिक कह रहे वह किसी ऐसे ही चुनौतीपूर्ण अवसर पर न ही पिता का अंधेरा बांट सकता है और न ही पुत्री का। पुत्री का विवाह असफल भी हो तो भी उसे समाज की धारा में निर्बाध बहने का अधिकार देने भर की क्षमता समाज में क्यों नहीं शेष है? पिता की प्रसन्नता का ख्याल हर हाल में समाज क्यों नहीं रख पाता ?

सामाजिक परिवर्तन जितना स्थगित रखेंगे उतना ही अवसादयुक्त असुरक्षित होते जाएंगे हम। एक ही उपाय है जिसमें तीन महत्वपूर्ण घटक हैं-शिक्षा, सतत स्वाध्याय और संवाद।

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