Wednesday - 15 July 2020 - 5:20 AM

रास्तों पर कांटें हैं, इन्हें गुलाब कहने भर से सफर नहीं कट सकता

डॉ. श्रीश पाठक

वजहें अधिकतर नाजायज हैं और कुछ जायज हैं लेकिन यह सच है कि देश कोरोना से वैसे जूझ नहीं सका, जैसी उम्मीद थी। केंद्र सरकार मानो यह मानकर चल रही थी कि भारत में यह बीमारी अपने रौद्र रूप में नहीं आने पाएगी। जिस देश की सरकारें भ्रष्ट हों और कराधान का झोला बस बड़ा करने की फिराक में रहती हों, उद्योगपतियों के इशारे पर स्वास्थ्य, शिक्षा के बुनियादी क्षेत्रों के बाद रेलवे तक को निजीकरण की आग में झोंकने को बेताब हों, वहाँ कोरोना जैसी महामारी जानमाल के खतरनाक नुकसान के साथ व्यवस्था के अश्लील परतों को उघाड़ तो देगी ही।

जरा सोचिए आज के दिन रेलवे निजी हाथों में होता तो क्या होता। सभी छोटे-बड़े डॉक्टर अगर निजी अस्पतालों में होते तो क्या होता। यह तो सभी जानते थे कि महज बड़बोलेपन से समुचित आर्थिक नीतियाँ नहीं बनतीं। अर्थव्यवस्था के सुर, भाजपा के पिछले कार्यकाल के आखिरी वर्ष में ही बिगड़ चुके थे, फिर देश ने एक बेहद खर्चीला चुनाव देखा। नोटबंदी ने मझोले व्यावसायियों की कमर तोड़ी थी, जिनसे अर्थव्यवस्था को जरूरी पुश मिलता है।

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भारत से आर्थिक रूप से कमजोर भी कुछ देश हैं जिन्होंने स्वयं को कोरोना से महज इसलिए सुरक्षित बनाए रखा है क्योंकि उन्होंने समय रहते अपनी सीमाओं को प्रबंधित कर लिया। निश्चित ही यहाँ हमसे भयंकर भूल हुई है। भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था जर्जर है, डॉक्टरों की कमी है, अवसंरचना नदारद है, सभी को मालूम है; लगभग रोज ही कितनी ही दूसरी बीमारियों से प्रत्येक वय के लोग मर रहे थे, इसमें कोरोना से लड़ने की ताकत हममें नहीं ही थी। शुरुआत में जिन्होंने चीन, इटली के बारे में ख़बरें पढ़ीं थीं, वे हैरान थे दीया-थाली प्रकरण पर, तब भी हम खासे असावधान थे।

दुनिया का कोई एक देश बता दें जहाँ पिछले 24 घंटों में 8000 से अधिक कोरोना के मामले आए हों और उसकी सरकार अनलॉक-1 की बात कर रही हो। जाहिर है आर्थिक हालात इतने खराब हैं कि यकीनन वह सबके लिए कोरोना से अधिक खतरनाक और भयावह हालात ला सकता है।

कोरोनाकाल से ठीक पहले अपने देश में तीन बड़े जमीनी मुद्दे थे – बिगड़ते आर्थिक हालात, खतरनाक बेरोजगारी दर और आत्महत्या करते किसान और बेरोजगार। ऐसे में कोरोना जैसी महामारी अगर आती है तो लॉकडाउन के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचता था ।

कोरोना जैसी महामारी जिस व्यवस्था के परिवर्तन की माँग करती है वह लॉकडाउन के दूसरे, तीसरे, चौथे चरणों में भी नहीं दिखी। मजदूर जैसा अपरिहार्य तबका तो जैसे सरकार के नीति-नियंताओं के नजर से ही ओझल था, सबको यह दिखा भी। सड़कों पर अपने मासूम बच्चों, बीवी के साथ घिसटते पिटते मरते मजदूरों के कारुणिक दृश्य अब जेहन में ताउम्र चस्पा रहेंगे।

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देश अब एक बेहद ही विपरीत अर्थ में लोकतन्त्र में तब्दील हो चुका है। ‘आत्मनिर्भर भारत’ की सरकार ने स्पष्ट इशारा कर दिया है। अब कोरोना से लड़ने की जिम्मेदारी पूरी तरह से जनतंत्र की जनता पर है। आप स्वयं ही बचने की कोशिश करें, मास्क पहनें, हाथ धुलते रहें, अपना-अपना काम करते हुए पूरी सजगता से बचते-बचाते रहें।

अपने खाने-पीने, रहने, दवाई, पढ़ाई, रोजगार सब अपने भरोसे देख लें, सभी सरकारें हाफ रही हैं। यह मान लीजिए कि भारत का प्रशासनिक अमला कभी भी ऐसी किसी परिस्थिति के लिए तैयार नहीं था।

गाँव, अपने-अपने प्रधानों के भरोसे चल रहा। व्यक्तिगत स्तर पर एकदम सावधान रहने की जरूरत है क्योंकि देश की लचर अर्थव्यवस्था अब और लॉकडाउन बर्दाश्त नहीं कर सकती और कोरोना अपने चरम पर मानव बलि लेने को आतुर है। देश अनलॉक होने को आतुर है लेकिन मत भूलें कि कोरोना के सार्वजानिक भारतीय आकड़े बाकी सरकारी आँकड़ों की तरह ही हैं, जाहिर है जितने बताए जा रहे, वास्तविकता उनसे कहीं अधिक भयावह होगी।

अब अपना देश जनता का हो न हो, सरकार जनता के लिए हो न हो पर चलेगा बस जनता के द्वारा ही। डगर कठिन है, रास्तों पर कांटें हैं, इन्हें गुलाब कहने भर से सफर नहीं कट सकता, काँटों को काँटा कहते हुए ही उनसे बचने की जुगत लगायी जा सकती है। हम जीतेंगे यह भी तय है लेकिन हमने अपनी यात्रा को सरकारों की अकर्मण्यता से बहुत ही कठिन और कष्टमय बना लिया है।

 

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