Saturday - 23 November 2019 - 7:46 AM

क्या स्मार्ट लखनऊ एक मिथक है ?

कैसे हो बेहतर शहर-1

रतन मणि लाल

आज से चार साल पहले, वर्ष 2015 में केंद्र सरकार ने स्मार्ट सिटी मिशन नाम से एक महत्वकांक्षी योजना की घोषणा की थी, जिसके अंतर्गत ऐसे शहरों को बढ़ावा देने का प्रस्ताव है जो मूल बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराएँ, अपने नागरिकों को एक सभ्य गुणवत्तापूर्ण जीवन प्रदान करे और एक स्वच्छ और टिकाऊ पर्यावरण एवं ‘स्मार्ट’ तरीके से संसाधनों का प्रयोग करें। इसमें स्थानीय विकास को सक्षम करने और प्रौद्योगिकी की मदद से नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार लाने पर जोर दिया गया है। इसके अंतर्गत देश के 99 शहरों को स्मार्ट बनाने की योजना है, जिसमे उत्तर प्रदेश के 11 शहर शामिल हैं।

इस अवधारणा में शहरों के सभी निवासियों को एक डिजिटल प्लेटफार्म से ऐसे जोड़ने की परिकल्पना की जाती है जिससे अधिकतर सुविधाएं ऑनलाइन उपलब्ध हों, तमाम तरह की सुविधाओं का सिस्टम एक दुसरे से जुड़ा हो, निर्धारित तरीके से काम हो और मानवीय लापरवाही की गुंजाईश कम हो।

इसमें वर्तमान शहरों को सुधारने, नए शहर बसाने और शहरों के पुनर्निर्माण के प्रावधान हैं। देश की पहली स्मार्ट सिटी को नए सिरे से बनाने के लिए रांची को चुना गया और सितम्बर 2017 में उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने इस परियोजना का शिलान्यास किया। यह नई स्मार्ट सिटी 653 एकड़ के भू-खंड पर बसायी जायेगी जिसमे अत्याधुनिक सुविधाएं प्रस्तावित हैं।

अपना लखनऊ भी स्मार्ट सिटी की सूची में शामिल है, लेकिन चयनित होने के लगभग तीन साल बाद स्मार्ट सिटी प्रॉजेक्ट के तहत मिले बजट का 70% खर्च करने के बाद भी नगर निगम कूड़ों के ढेर नहीं हटवा सका है। योजना के तहत शहर में 52 काम होने थे, लेकिन चार साल में नगर निगम महज 11 काम भी पूरा कर पाया है।

निर्धारित कार्यों में सीवर व पेयजल लाइन डलवाना, स्मार्ट सिटी कमांड सेंटर कार्यालय, आईटीएमएस कमांड कंट्रोल सेंटर, मास्टर सिस्टम इंटिग्रेटर, अवंतीबाई व बलरामपुर अस्पताल में वेस्ट वाटर पुनर्प्रयोग परियोजना, कैसरबाग बस स्टैंड परिसर में नाइट शेल्टर निर्माण व 311 ऐप का काम शामिल है। कई सालों में कई प्रयासों के बाद भी शहर के घरों से कूड़ा उठाने की व्यवस्था पटरी पर नहीं आ पी है, शहर की सफाई का कोई विश्वसनीय सिस्टम नहीं बन पाया है, शहरी शिकायतों का निस्तारण समय से नहीं हो पा रहा और सडकों पर ट्रैफिक जाम अब लोगों ने अपनी नियति मान लिया है। वर्तमान में अधिकारिक सूत्रों के अनुसार, आईटी सलूशन की मदद से सिंगल विंडो पोर्टल, सिटी ट्रांसपोर्ट का मोबाइल एप, जीपीएसनेविगेशन सिस्टम और क्राइम सर्विलेंस के प्रयास शुरू किये जा चुके हैं।

लखनऊ में पुनर्विकास योजना के अंतर्गत केवल 50 एकड़ भूमि निर्धारित की गई है, इसमें पुराने निर्माण तोड़ कर नए निर्माण करने का प्रावधान है। यानी, पूरे 2500 वर्ग किमी के वर्तमान लखनऊ का केवल 0।20 वर्ग किमी ही हितेक बन सकता है। इसमें कैसरबाग से केजीएमयू तक के इलाके का विकास किया जाना है, जिसमे कई ऐतिहासिक और पुराने लखनऊ के निर्माण शामिल हैं।

ऐसे शहर अपेक्षा के अनुरूप स्मार्ट बने रहें इसके लिए जरूरी है कि उनके इंफ्रास्ट्रक्चर पर एक सीमा के बाद दबाव न बने। इसके लिए जरूरी होगा कि शहरों की ओर गावों से अनवरत होने वाला प्रवास कम हो। लखनऊ में आसपास और दूरदराज के जिलों से लोगों का आना रोज जारी है। लखनऊ की वास्तविक जनसँख्या यहाँ की अधिकारिक जनसँख्या से कहीं ज्यादा है।

प्रवासी आबादी के कारण शहर के सिस्टम के ऊपर अतिरिक्त दबाव लगातार बढ़ रही है। रोजगार की तलाश में रोज सैकड़ों लोग किसी बड़े शहर में आते हैं और यहाँ बसने के उपाए में लग जाते हैं। खाली जमीन, खाली प्लाट, पार्क, सड़क के किनारे के फूटपाथ, सार्वजनिक स्थान अदि ऐसे लोगों से भरे पड़ें हैं। कोई भी स्मार्ट सिटी योजना इन लोगों को संज्ञान में लेकर नहीं बनाई जाती, जबकि ये लोग शहरी जीवन के यथार्थ हैं।

वर्तमान परिस्थितियों और गतिविधियों के चलते शहर का निकट भविष्य में स्मार्ट बन पाना तो मुश्किल है। बेहतर होगा कि प्रदेश के गावों से लखनऊ में रोजगार की तलाश में आने वाले लोगों का सर्वेक्षण कर उन्ही गावों को स्मार्ट बनाने पर ज्यादा धन खर्च हो। इससे कम से कम वे गाँव कुछ सुधर जायेंगे। अन्यथा, करोड़ों खर्च होने के बाद भी लखनऊ तो स्मार्ट होने से रहा।

(जारी है)

(आगे पढ़िए: क्या हम अपने शहर को वाकई में अच्छा बनाना चाहते हैं?)

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )

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