अमेरिका की ‘डेटा डिप्लोमेसी’ को झटका: घाना और जिम्बाब्वे ने ठुकराई करोड़ों की मदद, नागरिकों की निजता पर नहीं किया समझौता

अकरा/हरारे। ट्रंप प्रशासन की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति और अफ्रीकी देशों के बीच अब ‘डेटा वॉर’ छिड़ गया है। अमेरिका की ओर से आर्थिक मदद के बदले नागरिकों का बेहद संवेदनशील हेल्थ डेटा मांगने की शर्त ने विवाद खड़ा कर दिया है। जिम्बाब्वे के बाद अब घाना ने भी अमेरिका के साथ होने वाली करोड़ों डॉलर की ‘हेल्थ डील’ को सिरे से खारिज कर दिया है।

ट्रंप प्रशासन ने लगभग दो दर्जन अफ्रीकी देशों को उनके पब्लिक हेल्थ सिस्टम को सुधारने और बीमारियों से लड़ने के लिए करोड़ों डॉलर की फंडिंग का प्रस्ताव दिया है। लेकिन इस डील के पीछे एक ऐसी शर्त छिपी है जिसने अफ्रीकी देशों को चौकन्ना कर दिया है।

घाना का बड़ा फैसला: घाना को 5 सालों में अमेरिका से करीब 109 मिलियन डॉलर (कुल एग्रीमेंट 300 मिलियन डॉलर) मिलने थे। लेकिन घाना ने इसे रिजेक्ट कर दिया क्योंकि:

  • अमेरिका बिना किसी ठोस सुरक्षा मानकों के घाना के नागरिकों के सेंसिटिव हेल्थ डेटा तक पहुंच चाहता था।
  • घाना के अधिकारियों का कहना है कि मांगा गया डेटा उस मकसद से कहीं ज्यादा था, जिसके लिए फंडिंग दी जा रही थी।
  • डेटा प्रोटेक्शन कमीशन के मुताबिक, इस डेटा के जरिए लोगों की व्यक्तिगत पहचान उजागर होने का बड़ा खतरा था।

यह पहली बार नहीं है जब किसी अफ्रीकी देश ने अमेरिका के इस प्रस्ताव पर ‘नो’ कहा हो।

  1. जिम्बाब्वे: इसी साल फरवरी में जिम्बाब्वे ने डेटा संप्रभुता (Data Sovereignty) और फेयरनेस का हवाला देते हुए इस डील को ठुकरा दिया था।
  2. जाम्बिया: खबरों के मुताबिक, जाम्बिया ने भी फिलहाल इस डील के कुछ हिस्सों पर रोक लगा दी है और वह इस पर गंभीरता से विचार कर रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप शासन के दौरान अमेरिका की विदेश नीति पूरी तरह ‘लेन-देन’ (Transactional) पर आधारित हो गई है। जहाँ एक तरफ अमेरिका मदद का हाथ बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी तरफ वह विकासशील देशों के डेटा रिसोर्सेज पर कब्जा करने की कोशिश में है।

“डेटा एक्सेस का स्कोप सामान्य जरूरतों से कहीं अधिक था। हम अपने नागरिकों की गोपनीयता और देश की सुरक्षा के साथ समझौता नहीं कर सकते।”

घाना और जिम्बाब्वे का यह कदम दिखाता है कि अब छोटे और विकासशील देश सिर्फ फंडिंग के लालच में अपनी ‘डिजिटल संप्रभुता’ खोने को तैयार नहीं हैं। अमेरिका की इस ‘हेल्थ डील’ पर फिलहाल व्हाइट हाउस की ओर से कोई आधिकारिक सफाई नहीं आई है, लेकिन इस घटना ने ग्लोबल हेल्थ फंडिंग के भविष्य पर बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं।

Related Articles

Back to top button