Saturday - 8 May 2021 - 1:15 AM

उपभोक्तावादी दैत्य की नकेल कसने के लिए सामने आ रहा है सनातनी धर्म

के पी सिंह

इस्लामी उसूलों की आधुनिक आतंकवादी परिणितियां अमेरिका की देन हैं। सोवियत कम्युनिष्ट प्रभाव को छिन्न भिन्न करने के लिए सीआइए ने इस्लामी सिद्धांतों की व्याख्याओं को तोड़ा मरोड़ा और यह शैतानी साजिश जब विकराल हो गई तो इसका कहर अमेरिका और उसके हमदम तमाम देशों पर ही टूट पड़ा।

बहर हाल इस्लामी सिद्धांत दुधारी तलवार की तरह है जिससे उनको गलत दिशा में मोड़ने की गुंजाइश हर काल खंड में रही है। बर्बर जातियों के हाथ में जब इस्लाम लगा तो उच्चतम मानवीय मूल्यों के लिए चरम प्रतिबद्धता को समेटे यह मजहब विनाशलीला का सबब बन गया।

यह एक अलग पहलू है लेकिन सांसारिक जीवन और व्यवस्थाओं को व्यवहारिक स्तर पर अनुशासित करने के जो बीज इसमें निहित हैं वे नायाब हैं। इनका इस्तेमाल करके इस्लामिक विश्व सारे संसार की राजनैतिक-सामाजिक व्यवस्थाओ को नई प्रेरणा दे सकता है।

भारत में इस्लाम की ऐसी पहल कई बार सामने आयी है। फिर चाहे मुगलों का दौर रहा हो जब अकबर ने दीन ए इलाही में सारे धर्म के उत्कृष्ट तत्वों को इकजाई करने की कोशिश की हो या वर्तमान दौर जिसमें आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड की ओर से शादियों के संबंध में बेहतरीन फैसला सामने लाया गया है।

आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सभी मौलानाओ को सलाह भेजी है कि वे लोगों को विवाह घरों की बजाय मस्जिदों में ही अपने लड़के लड़कियों की शादियां कराने के लिए प्रेरित करें। शादियों में पूरी तरह से फिजूलखर्ची से बचा जाये। डीजे, बैंड और आतिशबाजी से परहेज किया जाये। लड़की वाला शादी की दावत आयोजित न करे। बहुत हो तो लड़का वाला वलीमा आयोजित कर सकता है।

दहेज के लेने और देने के बारे में पर्सनल ला बोर्ड ने मोमिनों को याद दिलाया है कि ऐसा करना शरीयत के खिलाफ है। इसलिए दहेज का आदान प्रदान बिल्कुल नहीं होना चाहिए। इसके पहले शामली और मुजफ्फरनगर आदि में काजी उस शादी में निकाह पढ़ने से इंकार का ऐलान कर चुके हैं जिसमें डीजे और उसकी धुन पर डांस की व्यवस्था रखी गई हो।

उल्लासप्रियता और उत्सवधर्मिता मनुष्य के स्वभाव का एक पहलू है जिसकी अभिव्यक्ति जश्न के मौकों पर लाजमी हो जाती है। लेकिन आज विवाह आदि अवसरों का जश्न कुरीति का रूप ले चुका है। जो कई आयामों में हमारे नैतिक जीवन को प्रभावित कर रहा है।

इस्लाम में सादगी पर बहुत जोर है। वैसे तो सनातन धर्म और अन्य दूसरे धर्मो में भी सादगी संयम व इन्द्रिय निग्रह की आवश्यकता जीवन के शुद्धिकरण के लिए बताई गई है। लेकिन इस्लाम अपने सिद्धांतों को किताबों तक सीमित नहीं रखता। उसने सिद्धांतों के अमल के लिए कठोर प्रावधान कर रखे हैं इसकी झलक इस्लामी समाज में अलग ही दिखायी देती है।

स्व0 रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा है कि इस्लाम के चौथे खलीफा के समय जब मुसलमानों का प्रभुत्व दुनिया के बड़े हिस्से पर हो चुका था उस समय खलीफा का व्यक्तिगत जीवन कितना सादा था यह उल्लेख योग्य है। उनकी सारी गृहस्थी एक ऊंट ढ़ो लेता था।

सोने, चांदी और हीरे पन्ने आदि के जेवरात पहनने की वैसे भी इस्लाम में मुमानियत है। खलीफा इतनी सादगी से रहते थे फिर भी सम्रांटों और बादशाहों के दबदबे से उनका दबदबा अधिक होता था।

इसलिए यह धारणा भी मान्य नहीं है कि जब तक तड़क भड़क से नहीं रहा जायेगा तब तक राजा की हनक नहीं बनेगी। खासतौर से आज की अफसर शाही के लिए यह पहलू गौर करने लायक है जो कई बार अपने भ्रष्टाचार को सकारात्मक दबदबे की खातिर जायज ठहराना चाहती है।

वैसे तो राजनीति का ही आदिम स्वरूप धर्म है। आधुनिक राजनीति विधायी उपायों से समाज को अनुशासित और नियंत्रित रखती है जबकि पहले सामान्य नैतिक नियम धर्म के माध्यम से समाज के नियमन के लिए प्रतिपादित किये जाते थे क्योंकि उस समय जीवन में इतनी अधिक जटिलतायें नहीं थी।

ऋषि स्थिति के उलझने पर अपनी सहज बुद्धि से यह निर्णय सुनाते थे कि अमुक कदम धर्मसम्मत है या नहीं और उनका निर्णय राजा पर भी बाध्यकारी होता था। पर जब भौतिक जीवन बहुआयामी और जटिल होने लगा तो व्यवस्थाओ में भी जटिलता बढ़ने लगी।

दूसरी ओर कई विरोधाभाषी स्थितियां भी उत्पन्न होने लगी। धर्म की निग्रह, अपरिग्रह और संयम की अवधारणायें वैश्विक प्रगति के लिए अवरोधक नजर आने लगी।

इसलिए उपभोक्तावाद जैसी अवधारणाओं को बल दिया जाने लगा ताकि दुनिया अधिक गतिमान हो और प्रगति के नये सोपान तय किये जा सकें। लेकिन कोई भी धर्म हो वह मानवीय समाज की आदिम व्यवस्था का बोध कराता है इसलिए उसके कई तत्व सनातन होते हैं।

इनकी अवहेलना या उल्लंघन एक सीमा के बाद अनुमन्य नहीं है। उपभोक्तावाद को भी आज इस सीमा का एहसास कराने की आवश्यकता महसूस होने लगी है। खर्चीली शादियां एक उदाहरण हैं।

घरेलू आयोजनों में बेलगाम होती तड़क भड़क ने धन लोलुपता को चरम सीमा पर पहुंचा दिया है जिससे नैतिक और सांसारिक दोनो ही व्यवस्थायें लड़खड़ा रहीं हैं। भारतीय अध्यात्म में अर्थ को भी पुरूषार्थ माना गया है। लेकिन यह सूत्र उनके लिए सत्य है जो प्रवृत्ति से उद्यमी और व्यवसायी हैं। वे धन लोलुप होंगे तो व्यापार का विस्तार करेंगे जिससे लोगों को आवश्यक उत्पादों की उपलब्धता, उत्पादों में गुणात्मक सुधार और रोजगार व बेहतर सेवा जैसे लाभ मिलेंगे।

पहले जब उपभोक्तावाद संकुचित था तब धन लोलुपता का प्रभाव व्यापारियों और उद्यमियों पर ही देखा जाता था। आम लोग अपनी जरूरतें सीमित रखने के मंत्र का पालन करते थे इसलिए उन्हें एक सीमा से ज्यादा धन की तृष्णा नहीं सता पाती थी।

आज पूरी व्यवस्था हर व्यक्ति के धन लोलुप होने पर टिक गई है क्योंकि किसी के खर्च की कोई सीमा नहीं रह गई है। लोगों को न केवल शादियों बल्कि त्रयोदशी जैसे आयोजन भी विशालता के साथ करने के लिए बाध्य किया जा रहा है।

हालत यह हो गई है कि कितना भी कमा लो लेकिन बढ़ती जरूरतों के सापेक्ष सब कुछ कम पड़ता दिखता है। लोग इस आपाधापी में फंसकर बैचेनी और असुरक्षा के शिकार हो रहे हैं। नैतिक व्यवस्था का तानाबाना अब बिखर चुका है और सिर उठाती दानवी प्रवृत्तियों ने मानवता को भीषण संकट में घेर दिया है।

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इसलिए धर्म को अब प्रभावी तरीके से हस्तक्षेप करने की आवश्यकता है। शुरूआत में उपभोक्तावादी आंधी में धर्म अप्रासंगिक होकर रह गया था। लेकिन अब दुनिया को बचाने के लिए धर्म को फिर आगे लाने की जरूरत महसूस होने लगी है। हम फिर स्मरण कराना चाहते हैं कि धर्म कोई भी हो सब के सनातन तत्व एक जैसे हैं।

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मुस्लिम समाज में शादियों में फिजूलखर्ची रोकने की मुहिम के जरिये इन तत्वों की ही अभिव्यक्ति हो रही है। संयोग से देश में इस समय अघोषित धार्मिक शासन का मंजर छाया हुआ है तो मुस्लिम के साथ-साथ अन्य समाजों के धर्माचार्यों की ओर से भी ऐसी पहल क्यों नहीं हो रही जो उपभोक्तावाद के भष्मासुरी दैत्य को नकेल में जकड़कर आम लोगों में नैतिक युग की वापसी करा सके।

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