Thursday - 29 October 2020 - 7:38 PM

डंके की चोट पर : इज्जत टीआरपी में नहीं खबर की सच्चाई में है

शबाहत हुसैन विजेता

लाईट, कैमरा, एक्शन. ग्लैमर से भरे हैं यह तीन लफ्ज़. इन तीन लफ़्ज़ों में इतना खिंचाव है कि नयी उम्र के लोग अपना घर छोड़कर मुम्बई भाग जाते थे. फिल्मों का ग्लैमर घर में मिलने वाली मोहब्बत से भी बड़ा होता था.

फिल्मों जैसा ग्लैमर ही पत्रकारिता में भी होता था. पत्रकार का मतलब उस शख्स से होता था जो अखबार में काम करता था. टीवी चैनलों का दौर नहीं आया था. टेलीविज़न के नाम पर सिर्फ दूरदर्शन था. अखबार भी गिने-चुने होते थे.

पत्रकारों के पास पैसा नहीं होता था लेकिन इज्जत इतनी थी कि मिनिस्टर और बड़े अफसर भी इंतज़ार किया करते थे. मैं भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़कर पत्रकार बनने आया था. जिस दिन से कलम से रिश्तेदारी हुई उस दिन से कलम से अज़ीज़ कुछ भी न रहा.

जिस दौर में पत्रकारिता शुरू की थी उस दौर में मोबाइल फोन का नामोनिशान नहीं था. पेजर भी बहुत दिन के बाद आया था लेकिन नेटवर्क इतने गज़ब का तैयार हुआ था कि इधर कुछ हुआ उधर खबर पास आ गई.

खबर के लिए सीधे चीफ सेक्रेटरी और मिनिस्टर को फोन किया जा सकता था. कितना भी बड़ा अफसर हो या कितना भी ताकतवर मिनिस्टर हो लेकिन मुलाक़ात का वक्त तय हो जाता था तो वह अपने दफ्तर में बैठकर इंतज़ार करता था.

फिल्मों के बड़े-बड़े सितारे फोन पर बात होते ही वक्त दे देते थे. कलाकारों के साथ दोस्तों जैसा रिश्ता बन जाता था. चीफ मिनिस्टर पत्रकारों को नाम से पहचानते थे. उनकी लिखी खबरों को याद रखते थे. बड़े-बड़े माफिया भी पत्रकारों से नहीं उलझते थे. माफिया भी पत्रकारों पर भरोसा कर लेते थे और पत्रकार भी उनसे सिर्फ खबर तक ही रिश्ता रखते थे.

वह भरोसे का दौर था. कोई किसी का भरोसा नहीं तोड़ता था. एक्सक्लूसिव खबरों की होड़ रहा करती थी. खबर अखबार में छपती थी तो पुख्ता होती थी लेकिन पत्रकार अपने सूत्र कभी किसी को नहीं बताता था. यही वजह थी कि अफसर और मिनिस्टर भी कुछ छुपाते नहीं थे.

वक्त के साथ बदलाव की बयार आयी. अखबारों के साथ ही न्यूज़ चैनलों की मंडी सजने लगी. चौबीसों घंटे टीवी स्क्रीन पर खबरें चलने लगीं. वीडियो कैमरा लेकर प्रोग्राम में पहुँचने वालों को पत्रकार समझा जाने लगा.

अखबार के पत्रकार दूसरे दर्जे का हिस्सा बनने लगे. सबसे आगे टीवी कैमरे होते थे. उनके पीछे टीवी के पत्रकार होते थे और सबसे पीछे अखबारों के पत्रकार होते थे. इसके बावजूद अखबार में काम करने वालों की इज्जत बची हुई थी क्योंकि चैनलों में काम करने वाले पत्रकार अखबार में एक लम्बा वक्त बिताने के बाद चैनलों में जाते थे और उन्हें अखबारों की अहमियत भी पता होती थी और खबरों की बारीकियां भी. उस दौर तक मॉस कम्युनिकेशन का कोर्स नहीं होता था. जितने भी पत्रकार फील्ड में थे सबने लिखते-लिखते सीखा था. अपने सीनियर से खबर लिखना सीखकर लोग काबिल बने थे.

मॉस कम्युनिकेशन का दौर आया तो हर साल सैकड़ों की तादाद में पत्रकारिता करने वाले मैदान में उतरने लगे. वह यूनीवर्सिटी से डिग्री हासिल करते ही यह समझ लेते कि उन्हें सब आ गया है. सीनियर की इज्जत और जूनियर को स्नेह वाला चैप्टर पत्रकारिता की किताब से कब फट गया यह पता ही नहीं चला.

अखबार और टीवी के बाद एक तीसरा दौर शुरू हुआ वेब पत्रकारिता का. इस तीसरे दौर ने पत्रकारिता का सबसे ज्यादा नुक्सान किया. जिन लोगों को पत्रकारिता की एबीसीडी नहीं आती वह वेब चैनल पर इन्टरव्यू लेते नज़र आने लगे.

वेब चैनल क्योंकि हिट्स की गिनती के बल पर मार्केट में ठहरते हैं. इसलिए हिट्स बढ़ाने के लिए वह किसी भी स्तर पर उतरने को तैयार हो गए. सही और गलत के बीच की लाइन मिटने लगी. हर हाथ में मोबाइल और हर मोबाइल वाला पत्रकार वाली पोजीशन आ गई. लोग मोबाइल से सड़कों से ही लाइव करने लगे.

इधर वेब पत्रकारिता चैलेन्ज खड़े कर रही है तो उधर टीवी चैनल टीआरपी के लिए गला काट कम्पटीशन का हिस्सा बन गए. चैनलों पर डिबेट के नाम पर जिस तरह से मुर्गा लड़ाने का खेल शुरू हुआ है वह किसी से छुपा नहीं है. जिसकी डिबेट में जितनी ज्यादा गाली-गलौज हो वह उतना कामयाब माना जाता है. डिबेट में मारपीट हो जाए तो डिबेट का उतना हिस्सा मोबाइल पर वायरल हो जाता है. वह क्लिप हर मोबाइल तक पहुँच जाती है.

टीआरपी की जंग तेज़ होने के साथ ही एक चैनल दूसरे चैनल को चैलेन्ज करने लगा. टीआरपी बढ़ाने के लिए पैसे बांटे जाने लगे. चैनल सरकार के साथी और विपक्ष के साथी बनने लगे. कहना चाहिए कि पत्रकार सच के साथ नहीं सत्ता और विपक्ष में बंट गया. एंकर और रिपोर्टर का फर्क मिट गया.

सवाल तो एंकर पूछता है तो ज़माने की नज़र में एंकर रिपोर्टर से बड़ा हो गया. एंकर के बातचीत का तरीका बदल गया. यह माना जाने लगा कि जो एंकर अपने मेहमानों की जितनी ज्यादा बेइज़्ज़ती कर ले वह उतना बड़ा और काबिल पत्रकार है.

आज हालात उस दोराहे पर हैं जिसमें एंकर अपनी टीवी स्क्रीन से सीधे चीफ मिनिस्टर को चुनौती दे रहा है. अपने स्टूडियो में बैठकर वह एलान कर रहा है कि वह खुद पार्टी बन चुका है. वह सरकार को यह बता रहा है कि वह सबसे आगे निकल चुका है और अब किसी से डरता नहीं है. चीफ मिनिस्टर भी अपने अफसरों के ज़रिये उस चैनल की बखिया उधेड़ने पर तुल गया है. वह भी यह बताने पर आमादा है कि सरकार से बड़ा कुछ नहीं है. वह भी यह एलान करने लगा है कि जल में रहकर मगर से बैर नहीं किया जाता.

मतलब सरकार ने मान लिया कि वह मगरमच्छ है. सरकार ने यह मान लिया कि उसके खिलाफ जाने का नतीजा बेहतर नहीं होगा. बारी अब पत्रकार की है. वह भी यह मान ले कि वह सिर्फ जल है. ऐसा जल जो समाज को ज़िन्दगी देने के लिए है. वह ऐसा जल है जो हमेशा विपक्ष के कष्ट सहता है मगर जनता के साथ अत्याचार नहीं होने देता. वह ऐसा जल है जिसे चाहे बर्फ बनाकर जमा दिया जाए या फिर भाप बनाकर उड़ा दिया जाए लेकिन अपने फर्ज़ से वह डिगने वाला नहीं है.

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पत्रकार के लिए समझने का सबसे बेहतर वक्त यही है जिसमें उसके हिट्स उसके भरोसे में छिपे हैं. उसकी टीआरपी उसकी खबर की सच्चाई में है. सरकार के खिलाफ वह खड़ा हो तो उसकी भूमिका उस विपक्ष की हो जो जनता के लिए उसकी आँख खोलती है. उसकी चीख जब खुद को बड़ा साबित करने के लिए गूंजेगी तो वह आसमान में कितनी भी ऊंची उड़ान भर ले मगर उसके पंख नोचने वाली ताकतें उससे ज्यादा ऊंचाई पर उड़ती नजर आयेंगी.

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