Monday - 27 January 2020 - 3:29 AM

RSS के प्रति पूर्वाग्रही रुख अपनाने से नहीं चमकेगी राहुल की राजनीति

कृष्णमोहन झा

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी को जब भी केंद्र की मोदी सरकार के किसी बड़े फैसले की आलोचना करनी होती है तो वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम अवश्य लेते हैं। फिर भले ही मोदी सरकार के उस फैसले में आरएसएस की कोई भूमिका न रही हो और ना ही उस फैसले से संघ का कोई लेना-देना हो।

आखिर राहुल गांधी यह कैसे भूल जाते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी को लगातार दूसरी बार केंद्र सरकार के मुखिया के रूप में चुनने का फैसला देश के मतदाताओं ने प्रचंड बहुमत से किया है और आरएसएस ने कभी देश के मतदाताओं से यह अपील नहीं की थी कि वह मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनाने के लिए लोकसभा चुनाव में भाजपा को प्रचंड बहुमत से विजयी बनाए।

देश की जनता ने मोदी सरकार के प्रथम कार्यकाल की उपलब्धियों के आधार पर उन्हें दोबारा प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में प्रचंड बहुमत से जो फैसला किया, उसमें आरएसएस की कोई निर्णायक भूमिका नहीं थी, मगर राहुल गांधी है कि उन्हें हर जगह आरएसएस ही नजर आता है।

उनकी नजर में प्रधानमंत्री मोदी के सारे फैसले आरएसएस की विचारधारा से प्रेरित होते हैं अथवा उनकी सलाह पर ही लिए जाते हैं। राहुल गांधी यह कैसे भूल जाते हैं कि आरएसएस एक स्वयंसेवी संगठन है, जो समय-समय पर अपनी स्वतंत्र राय व्यक्त करने से भी नहीं चूकता है।

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ऐसे भी अनेक अवसर आए हैं जब किसी मसले पर आरएसएस के विचार मोदी सरकार से इतर रहे हो, परंतु संघ ने अपने विचारों से सरकार को अवगत कराने में कभी झिझक महसूस नहीं की। दरअसल राहुल गांधी जब आरएसएस की आलोचना कर रहे होते तो वे इन सब बातों को मात्र दिखावा मानते हैं।

राहुल गांधी को भाजपा और आरएसएस की आलोचना करने का पूरा अधिकार है, परंतु आरएसएस के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर बयान देने को उन्होंंने अपना जो शगल बना लिया है, उससे ना तो वह मोदी सरकार के प्रति जनता के भरोसे को कम कर सकते है और न ही संघ को अपनी राय देेने से विचलित कर सकते हैं।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में आस्था रखने वाले स्वयंसेवी संगठन आरएसएस को उसकी राह से विचलित करने की अतीत में जितने प्रयास किए गए, वे कभी सफल नहीं हुए। हर आलोचना की अग्नि से आरएसएस हमेशा कुंदन की तरह तप कर बाहर निकला और हर आलोचना ने उसे पहले से और मजबूत बनाया। अपनी आलोचना करने वालों से आरएसएस ने कभी गुरेज नहीं किया। गौरतलब है कि आरएसएस में विगत वर्ष दिल्ली में ऐसा कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें अपने आलोचकों और विरोधियों को भी अपने विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता प्रदान की। उस कार्यक्रम के लिए संघ ने काफी सराहना बटोरी थी।

संघ ने पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को नागपुर में अपने नव प्रशिक्षुओं को संबोधित करने आमंत्रित किया था और उस कार्यक्रम में भाग लेने से उन्हें रोकने के लिए कांग्रेस के अनेक नेताओं ने अपील भी की, परंतु प्रणव मुखर्जी ने सभी आपत्तियों एवं अपीलों को दरकिनार कर उक्त कार्यक्रम में अपना सारगर्भित संबोधन देकर सबको प्रभावित किया था।

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कार्यक्रम में प्रणव मुखर्जी ने जो संदेश दिया, उसमे कही ऐसी बात नहीं थी, जिसमें आरएसएस के प्रति उनके वैचारिक विरोध की झलक मिलती हो। यहां तक कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने आरएसएस के स्वयंसेवको की अनुशासनप्रियता की सराहना की थी। ऐसे में आरएसएस के प्रति राहुल गांधी का पूर्वाग्रह समझ से परे है। अतः राहुल गांधी संघ की आलोचना करने में जितनी शक्ति और समय जाया करते हैं, इतनी शक्ति और समय अगर वे अपनी पार्टी को मजबूत करने में खर्च करें तो शायद कुछ अधिक अर्जित कर सकते हैं।

आरएसएस की आलोचना को अपने भाषणों की एकमात्र विषय वस्तु बनाने वाले राहुल गांधी ने एक बार संघ की इस बात की भी आलोचना की थी कि उसमें महिलाओं के लिए कोई स्थान नहीं है। राहुल गांधी उस समय सारी मर्यादा लांघ गए थे, जब उन्होंने कहा था कि क्या कभी महिलाओं को आरएसएस में शॉर्ट्स में देखा जा सकता है। राहुल गांधी को भले ही अपनी जुबान फिसलने का कोई अफसोस ना हो, परंतु उनके इस बयान से वह खुद ही आलोचनाओं के घेरे में आ गए थे।

पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष ने असम में एनआरसी और नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में असम में उपजे असंतोष को लेकर भी आरएसएस पर बिना वजह निशाना साधा था। उनका यह आरोप समझ के परे है कि भाजपा और आरएसएस के लोग नागपुर में बैठकर असम को संचालित कर रहे हैं।

राहुल गांधी को दरअसल यह स्वीकार करने का साहस दिखाना चाहिए कि उनकी पार्टी अपने राजनीतिक हित साधने के लिए असम की जनता के असंतोष को हवा दे रही है। राहुल गांधी यह कैसे भूल गए कि असम में एनआरसी तैयार करने का काम सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हुआ था। संघ की इसमें कोई भूमिका नहीं थी। नागरिकता संशोधन कानून का उद्देश्य भी तीन पड़ोसी देशों में उत्पीड़न का शिकार होकर भारत आने वाले अल्पसंख्यक शरणार्थियों को नागरिकता प्रदान करना है, जो पांच वर्ष पूर्व भारत आ चुके थे। इस कानून का उद्देश्य यह नहीं है कि कभी भी भारत प्रवेश करने वाले अल्पसंख्यक शरणार्थियों को नागरिकता प्रदान कर दी जाएगी।

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दरअसल कांग्रेस इस कानून को लेकर यह भ्रम पैदा करने की कोशिश कर रही है कि इस कानून के लागू हो जाने से मुसलमानों को भारत की नागरिकता से वंचित कर दिया जाएगा और उन्हें भारत छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। हकीकत तो यह है कि जिन शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देने का विरोध कांग्रेस कर रही है, उन्हें मानवता के आधार पर भारत में शरण देने की मांग पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ही अटल सरकार से की थी। इसी तरह देश के कुछ राज्यों में डिटेंशन सेंटर खोले जाने का काम भी कांग्रेस के शासनकाल में ही शुरू किया गया था, जिस पर आज कांग्रेस सवाल उठा रही है।

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राहुल गांधी और उनकी पार्टी ने एनआरसी और नागरिकता संशोधन कानून को लेकर जितने भी आरोप लगाए हैं, वे सभी एक-एक करके गलत साबित हो रहे हैं। ऐसे में उन्होंने कांग्रेस का बचाव करने के लिए संघ पर निशाना साधने की नीति का सहारा लिया है, परंतु इससे भी वे अपने राजनीतिक हितों को साधने में सफल नहीं होंगे।

उनके लिए यही बेहतर होगा कि वे आरएसएस को निशाना बनाने की बजाए अपनी और अपनी पार्टी की खामियों को दूर करने का प्रयास करें।

(लेखक WDS के राष्ट्रीय अध्यक्ष और IFWJ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है, लेख में उनके निजी विचार हैं)

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