रूस में गहराया पेट्रोल-डीज़ल संकट, तेल भरवाने के लिए घंटों लाइन में खड़े लोग

यूक्रेन के साथ जारी युद्ध के बीच अब रूस को अपने ही देश में ईंधन संकट का सामना करना पड़ रहा है। राजधानी मॉस्को सहित कई शहरों में पेट्रोल और डीज़ल की कमी के कारण लोग घंटों तक पेट्रोल पंपों के बाहर कतारों में खड़े रहने को मजबूर हैं।
कई पेट्रोल पंपों पर वाहनों की लंबी लाइनें देखने को मिल रही हैं, जबकि कुछ पंप ऐसे भी हैं जहां ईंधन पूरी तरह खत्म होने के कारण बिक्री बंद कर दी गई है। यह स्थिति ऐसे देश में सामने आई है, जिसे दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में गिना जाता है।
लोगों में बढ़ी चिंता, महंगा हो रहा ईंधन
ईंधन संकट का असर आम लोगों की दिनचर्या पर साफ दिखाई देने लगा है। मॉस्को में पेट्रोल भरवाने पहुंचे लोगों का कहना है कि घंटों इंतजार के बावजूद ईंधन मिलने की कोई गारंटी नहीं है।
एक स्थानीय महिला ने बताया कि लोग इस डर में हैं कि कहीं पेट्रोल पूरी तरह खत्म न हो जाए। वहीं एक अन्य नागरिक ने कहा कि जैसे-जैसे पेट्रोल की उपलब्धता घट रही है, उसकी कीमत भी बढ़ती जा रही है। लंबी दूरी की यात्रा करने वाले लोगों के सामने सबसे बड़ी समस्या रास्ते में ईंधन मिलने की है।
कई लोगों ने यह भी स्वीकार किया कि मौजूदा हालात पर खुलकर सरकार की आलोचना करना आसान नहीं है।
आखिर रूस में क्यों पैदा हुआ पेट्रोल-डीज़ल संकट?
विशेषज्ञों के अनुसार, इस संकट की सबसे बड़ी वजह यूक्रेन की ओर से रूस के ऊर्जा ढांचे पर लगातार किए जा रहे ड्रोन और मिसाइल हमले हैं। हाल के महीनों में रूस की कई तेल रिफाइनरियों और ईंधन भंडारण केंद्रों को निशाना बनाया गया है, जिससे उत्पादन और सप्लाई चेन प्रभावित हुई है।
इसके अलावा युद्ध के कारण परिवहन व्यवस्था, लॉजिस्टिक्स और रिफाइनिंग क्षमता पर भी दबाव बढ़ा है। कई विश्लेषकों का मानना है कि केवल हमले ही नहीं, बल्कि सप्लाई मैनेजमेंट की चुनौतियां भी इस संकट को गहरा कर रही हैं।
कई इलाकों में राशनिंग जैसी स्थिति
रूस के विभिन्न हिस्सों में प्रशासन ने ईंधन की सीमित बिक्री शुरू कर दी है। कई पेट्रोल पंपों पर तय मात्रा से अधिक पेट्रोल या डीज़ल नहीं दिया जा रहा है। कुछ जगहों पर जैरी कैन में ईंधन भरने पर भी रोक लगा दी गई है ताकि जमाखोरी रोकी जा सके।
स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कुछ शहरों में सार्वजनिक बस सेवाओं में कटौती करनी पड़ी है। कचरा संग्रहण जैसी नगर सेवाएं भी प्रभावित हुई हैं, जबकि किसान आने वाले समय में खेती पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंतित हैं।
सरकार ने उठाए कई कदम
ईंधन संकट को नियंत्रित करने के लिए रूस सरकार ने कई कदम उठाए हैं। सरकार ने दूसरे देशों से अतिरिक्त ईंधन मंगाने की प्रक्रिया तेज की है। पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों पर सब्सिडी दी जा रही है और कम गुणवत्ता वाले ईंधन की बिक्री की भी अनुमति दी गई है।
हालांकि वाहन मालिकों को चिंता है कि कम गुणवत्ता वाला ईंधन उनके वाहनों के इंजन को नुकसान पहुंचा सकता है।
पुतिन ने क्या कहा?
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सरकारी टीवी पर इस संकट को स्वीकार करते हुए कहा कि यूक्रेन के हमलों से निश्चित रूप से कठिनाइयां पैदा हुई हैं, लेकिन उनके मुताबिक स्थिति अभी नियंत्रण से बाहर नहीं है।
इसके बावजूद सरकार इस संकट पर लगातार नजर बनाए हुए है और सप्लाई सामान्य करने की कोशिश कर रही है।
क्या पुतिन पर बढ़ रहा है दबाव?
ईंधन संकट के बीच रूस में सरकार के प्रति लोगों का भरोसा भी प्रभावित होता दिख रहा है। हालिया सर्वेक्षणों के अनुसार राष्ट्रपति पुतिन की लोकप्रियता में कुछ गिरावट दर्ज की गई है और बड़ी संख्या में लोग देश की आर्थिक स्थिति को लेकर चिंता जता रहे हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि अगर ईंधन संकट लंबे समय तक जारी रहता है तो इसका असर रूस की आर्थिक विकास दर पर भी पड़ सकता है। हालांकि कई राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आर्थिक मुश्किलों के कारण पुतिन अपनी युद्ध नीति में तत्काल बदलाव करेंगे, इसकी संभावना फिलहाल कम दिखाई देती है।
क्या युद्ध और लंबा खिंच सकता है?
हाल के दिनों में राष्ट्रपति पुतिन ने संकेत दिए हैं कि रूस अपनी सैन्य रणनीति में पीछे हटने के बजाय और अधिक आक्रामक रुख अपना सकता है। उन्होंने सैन्य अधिकारियों के साथ बैठक में दावा किया कि रूसी सेना मोर्चे पर रणनीतिक बढ़त बनाए हुए है और आगे की सैन्य कार्रवाई को लेकर लगातार समीक्षा की जा रही है।
ऐसे में पश्चिमी देशों और अंतरराष्ट्रीय रणनीतिकारों की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या रूस युद्ध को और तेज करेगा या भविष्य में किसी शांति वार्ता की संभावना बनेगी।
निष्कर्ष
रूस में पैदा हुआ पेट्रोल-डीज़ल संकट अब केवल आर्थिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह यूक्रेन युद्ध के आम नागरिकों पर पड़ रहे प्रत्यक्ष असर की भी तस्वीर पेश कर रहा है। यदि ईंधन आपूर्ति जल्द सामान्य नहीं हुई तो इसका असर परिवहन, कृषि, उद्योग और रूस की अर्थव्यवस्था पर और गहरा पड़ सकता है। वहीं यह संकट आने वाले समय में पुतिन सरकार के लिए भी एक बड़ी राजनीतिक और आर्थिक चुनौती बन सकता है।



