Saturday - 5 December 2020 - 1:33 PM

पार्टी टाइम ओवर, अब कुछ काम हो जाये !

राजीव ओझा

कोई उत्सव हो त्योहार हो या पार्टी, कितनी बेसब्री से हम उसका इंतज़ार करते हैं। लेकिन कोई पार्टी या उत्सव निरंतर नहीं चला करते। त्योहार भी आते जाते रहते हैं। अगर लगातार हम उत्सव मनाएंगे तो उससे भी ऊबने लगेंगे। लेकिन जश्न के बाद के दिन का सन्नाटा किसी को अच्छा नहीं लगता। जैसे वीकली ऑफ या सन्डे के बाद मंडे को ऑफिस जाना आम तौर पर लोगों को थोडा खराब लगता है। इसे ही “मंडे ब्लूज” या छुट्टी के बाद का अवसाद कहते हैं। इसके अपवाद भी हैं लेकिन आमतौर पर ऐसा होता है क्योंकि यह मानव स्वभाव।

आपने कभी ध्यान दिया है कि दीपावली के अगले दिन अन्नकूट या परेवा के बाद का सन्नाटा कितना अखरता है। शारदीय नवरात्र के साथ शुरू हुई दुर्गापूजा, दशहरा, दीपावली, ईद या बकरीद और क्रिसमस और 31 दिसम्बर को नए वर्ष का जश्न, लगातार कई महीने चलने वाला उत्सब जब थमता है तो कई लोगों के लिए यह डिप्रेशन कि वजह बन जाता है। इसे न्यू ईयर ब्लू कह सकते हैं जो मंडे ब्लू की तरह ही होता है।

इसमें युवा, छात्र और बुजुर्ग, सब शामिल हैं। खासकर जब आगे परीक्षा का समय हो, कम्पटीशन हो और नए लक्ष्य हासिल करने कि चुनौती हो। सब परेशानी और चुनौतियों को भूल कर पार्टी करने वाले जश्न के बाद जब वास्तविकता से रूबरू होते हैं कि नए साल का टारगेट और उसको हासिल करने का दबाव पहाड़ कि तरह सामने खड़ा है तो यह अवसाद को और बढ़ा देता है।

अचानक परिस्थितियाँ बदलने के कारण पैदा होने वाला तनाव ही अवसाद पैदा करता है। हालांकि यह बदलाव अप्रत्याशित नहीं होता है लेकिन जो लोग इसके लिए तैयार नहीं होते उनको अवसाद पहले घेरता है। अक्सर अवसाद स्थाई नहीं होता। मंडे ब्लू से हम सब लगातार रूबरू होते रहते हैं इस लिए इसकी अवधि भी छोटी होती है लेकिन न्यू ईयर चूंकि कई माह तक चले उत्सव को विराम देता है इस लिए इसकि अवधि कुछ लम्बी होती है।

वैसे इसका असर हर व्यक्ति पर अलग अलग होता है। ‘न्यू ईयर ब्लू’ अधिक घातक है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार जनवरी के पहले पखवारे में ‘न्यू ईयर ब्लू’ का शिकार करीब 30 फीसदी लोग हो जाते हैं। लोगों को लगता है कि अर्से से चला आ रहा मौज-मस्ती का टाइम खत्म हो गया और आगे का टाइम कठिन है। लेकिन ज्यादातर लोगों को जल्द ही वास्तविकता का अहसास हो जाता और वो सामान्य हो जाते हैं। जो लोग सकारात्मक सोच वाले होते हैं उन्हें अक्सर अवसाद नहीं घेरता।

पीजीआइ के मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. एस के कार बताते हैं कि 25-30 एवं 50-60 आयु वर्ग के लोग सर्वाधिक इसके शिकार होते हैं। ये लोग न्यू ईयर सेलिब्रेशन कि चकाचौंध को संभाल नहीं पाते और डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं।

जश्न के दौरान ही 25-30 और 50-60 वर्ष आयु वर्ग के 30 फीसद जो लोग अवसाद के शिकार होते हैं उनमें ज्यादातर पहले से ही किसी न किसी कुंठा या काम्प्लेक्स का शिकार होते हैं और जश्न अक्सर उनमें इस अवसाद को बढ़ा देता है। इसमें एक बड़ा कारण आभासी दुनिया में अधिक सक्रिय होना भी है। सोशल मीडिया पर सैकड़ों दोस्तों से चैट करने वाला वास्तविक दुनिया में जश्न के दौरान अपने को अकेला पाता है।

इस अवसाद से बचने का सबसे कारगर उपाय है परिवार के साथ निरंतर पारस्परिक संवाद और अपनों के साथ अपनी समस्या शेयर करना। तो मित्रों पार्टी टाइम ओवर, अब मेहनत से काम करने का समय है। क्योंकि तभी आप वर्क हार्ड पार्टी हार्डर के असली मायने समझ सकेंगे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, लेख में उनके निजी विचार हैं)

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