ईरान डील के बाद नेतन्याहू ‘अकेले’ पड़े, ट्रंप ने कहा- ‘मेरे बिना इजराइल बर्बाद हो जाता’, 48 घंटे में लगे 4 बड़े झटके

तेल अवीव/वाशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच हुए ऐतिहासिक शांति समझौते ने मिडिल ईस्ट की पूरी सियासत को पलट कर रख दिया है। इस पूरी कूटनीतिक बिसात पर ईरान के साथ हाथ मिलाने के बाद अब अमेरिका ने अपने सबसे पुराने और भरोसेमंद सहयोगी इजराइल को पूरी तरह अलग-थलग छोड़ दिया है। पिछले 48 घंटों के भीतर इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Benjamin Netanyahu) की सरकार को अमेरिका की तरफ से 4 बड़े और करारे झटके लगे हैं।

सबसे बड़ा झटका खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दिया है। मंगलवार (16 जून) को ट्रंप ने खुलेआम बयान देते हुए कहा:

ट्रंप का यह बयान नेतन्याहू के लिए किसी बड़े राजनीतिक सदमे से कम नहीं है, क्योंकि अक्टूबर 2026 में इजराइल में प्रधानमंत्री पद के चुनाव होने हैं और नेतन्याहू अब तक अमेरिकी समर्थन के भरोसे ही मैदान में थे।

ईरान के साथ डील फाइनल होते ही अमेरिका ने इजराइल की चिंताओं और मांगों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है। टीम नेतन्याहू को लगे ये 4 झटके इस बात का सबूत हैं:

इजराइल चाहता था कि इस शांति समझौते में ईरान की लंबी दूरी की मिसाइलों के निर्माण पर रोक लगाने का मुद्दा शामिल हो। साथ ही वह खाड़ी देशों को ‘अब्राहम समझौते’ (Abraham Accords) में लाने की पैरवी कर रहा था, लेकिन अमेरिका ने इजराइल की एक न सुनी।

19 जून को स्विट्जरलैंड में होने वाली बैठक में जिस एमओयू (MoU) पर अमेरिका और ईरान साइन करने वाले हैं, इजराइल ने उसकी एक कॉपी मांगी थी। अमेरिका ने साफ मना कर दिया। यही नहीं, पेरिस में ट्रंप ने दोटूक कह दिया कि इजराइल में हिजबुल्लाह से लड़ने की क्षमता नहीं है।

अमेरिकी मीडिया नेटवर्क ‘सीएनएन’ (CNN) के मुताबिक, इजराइली पीएम नेतन्याहू इस वक्त राष्ट्रपति ट्रंप से मिलकर अपनी बात रखना चाहते हैं, लेकिन व्हाइट हाउस ने उन्हें मुलाकात का वक्त देने से साफ इंकार कर दिया है। संकेत हैं कि ईरान डील पूरी होने के बाद ही कोई मुलाकात होगी।

इजराइल के कट्टरपंथी रक्षा मंत्री इतामार बेन ग्वीर (Itamar Ben-Gvir) को अमेरिका ने मियामी जाने के लिए स्पेशल वीजा देने से इंकार कर दिया है। किसी देश के रक्षा मंत्री के साथ अमेरिका का ऐसा व्यवहार बेहद दुर्लभ और बड़ा कूटनीतिक झटका माना जा रहा है।

इस पूरे विवाद के पीछे का सबसे बड़ा इनसाइड एंगल यह है कि नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को गुमराह किया था। जंग की शुरुआत में नेतन्याहू ने ट्रंप को भरोसा दिलाया था कि जैसे ही इजराइल और अमेरिका ईरान पर दबाव बनाएंगे, वहां की जनता विद्रोह कर देगी और ईरान में ‘तख्तापलट’ (Regime Change) हो जाएगा। लेकिन हुआ इसका ठीक उलटा; ईरान और ज्यादा मजबूत होकर उभरा।

  • खाड़ी देशों का दबाव: सऊदी अरब, यूएई (UAE), कतर और कुवैत जैसे महत्वपूर्ण खाड़ी देश इजराइल के रवैये से अलग ईरान के साथ समझौता चाहते थे। नाटो सहयोगी तुर्की भी इसी पक्ष में था।
  • जेडी वेंस का वीटो: अमेरिका के शीर्ष वार्ताकार और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) भी इजराइल की युद्ध नीति के सख्त खिलाफ हैं। इन सभी वजहों से ट्रंप ने नेतन्याहू की रणनीतियों पर भरोसा करना पूरी तरह बंद कर दिया और वाशिंगटन ने तेल अवीव को किनारे लगा दिया।

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