शिवसेना UBT में बड़ी टूट, बागी सांसदों ने बताई अलग होने की वजह

मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। शिवसेना (UBT) के छह सांसदों के बागी तेवरों ने पार्टी नेतृत्व की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इस राजनीतिक घटनाक्रम के बीच अब उन कारणों को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है जिनकी वजह से सांसदों ने उद्धव ठाकरे का साथ छोड़ने का फैसला किया।

सूत्रों के अनुसार लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष प्रस्तुत किए गए प्रस्ताव में बागी सांसदों ने पार्टी नेतृत्व पर गंभीर राजनीतिक आशंकाएं जताई हैं। प्रस्ताव में दावा किया गया है कि उन्हें भविष्य में शिवसेना (UBT) के कांग्रेस में विलय की संभावना नजर आ रही थी, जिसके कारण उनका पार्टी नेतृत्व पर भरोसा कमजोर पड़ गया।

हालांकि इन दावों पर शिवसेना (UBT) की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है।

जानकारी के मुताबिक बागी सांसदों द्वारा पारित प्रस्ताव में कहा गया है कि शिवसेना की स्थापना हिंदुत्व और मराठी अस्मिता की राजनीति के आधार पर हुई थी। प्रस्ताव में दावा किया गया है कि पार्टी संस्थापक बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना का निर्माण कांग्रेस में विलय के उद्देश्य से नहीं किया था।

सांसदों ने कथित रूप से अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि पार्टी की राजनीतिक दिशा बदल रही है और भविष्य में कांग्रेस के साथ अत्यधिक नजदीकी या विलय जैसी स्थिति बन सकती है। इसी आशंका ने उनके भीतर असंतोष पैदा किया।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह प्रस्ताव वास्तव में सांसदों द्वारा पारित किया गया है तो यह केवल संगठनात्मक विवाद नहीं बल्कि वैचारिक मतभेद का मामला भी बन सकता है।

बागी सांसदों की ओर से पेश किए गए प्रस्ताव में राज्यसभा सांसद संजय राउत का भी उल्लेख किए जाने की चर्चा है।

दावा किया गया है कि संजय राउत द्वारा पहले तृणमूल कांग्रेस को कांग्रेस के साथ एकजुट होने या व्यापक विपक्षी एकता की सलाह दिए जाने वाले बयानों ने सांसदों के मन में शंका पैदा की। सांसदों को आशंका थी कि भविष्य में शिवसेना (UBT) भी कांग्रेस के साथ अपनी अलग पहचान खो सकती है।

हालांकि संजय राउत पहले भी कई बार स्पष्ट कर चुके हैं कि विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक सहयोग और पार्टी विलय दो अलग-अलग बातें हैं। फिर भी यह मुद्दा अब बगावत के पीछे प्रमुख कारणों में गिना जा रहा है।

प्रस्ताव में कथित तौर पर कहा गया है कि सांसदों का पार्टी नेतृत्व पर विश्वास कम हो गया था। उनका मानना था कि पार्टी की मूल विचारधारा और वर्तमान राजनीतिक रणनीति के बीच अंतर बढ़ता जा रहा है।

इसी टूटे हुए भरोसे को आधार बनाते हुए सांसदों ने पार्टी से अलग होने का फैसला लिया। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि किसी भी दल में वैचारिक असहमति यदि लंबे समय तक बनी रहे तो वह अंततः संगठनात्मक संकट का रूप ले लेती है।

इस पूरे घटनाक्रम की सबसे महत्वपूर्ण बात यह बताई जा रही है कि बागी सांसदों ने खुद को अलग संसदीय समूह घोषित नहीं किया है।

सूत्रों के अनुसार सांसदों ने अपने प्रस्ताव में यह स्पष्ट किया है कि वे किसी नए गुट का गठन नहीं करना चाहते। इसके बजाय उन्होंने सीधे मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने का निर्णय लिया है।

यदि यह दावा सही साबित होता है तो इसका मतलब होगा कि यह केवल बगावत नहीं बल्कि राजनीतिक पुनर्संरेखण (Political Realignment) है, जिसमें सांसदों ने अपनी राजनीतिक पहचान शिंदे गुट के साथ जोड़ने का फैसला किया है।

2022 में एकनाथ शिंदे की बगावत के बाद शिवसेना पहले ही बड़े विभाजन का सामना कर चुकी है। उस समय पार्टी के अधिकांश विधायक शिंदे गुट के साथ चले गए थे।

अब यदि सांसदों का एक बड़ा वर्ग भी उद्धव ठाकरे का साथ छोड़ता है तो यह पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति में स्थिति को प्रभावित कर सकता है। लोकसभा में प्रतिनिधित्व कम होने से पार्टी की राजनीतिक ताकत और संगठनात्मक प्रभाव दोनों पर असर पड़ सकता है।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाक्रम आने वाले स्थानीय निकाय चुनावों, विधानसभा चुनावों और विपक्षी गठबंधन की रणनीति पर भी प्रभाव डाल सकता है।

शिवसेना (UBT), कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) महाविकास अघाड़ी (MVA) का हिस्सा हैं। ऐसे में यदि बागी सांसदों द्वारा लगाए गए आरोपों को राजनीतिक मुद्दा बनाया जाता है तो इसका असर गठबंधन की आंतरिक राजनीति पर भी पड़ सकता है।

हालांकि कांग्रेस और शिवसेना (UBT) दोनों ही दल अब तक भाजपा और NDA के खिलाफ संयुक्त राजनीतिक रणनीति पर काम करते रहे हैं। इसलिए आने वाले दिनों में इन आरोपों पर गठबंधन सहयोगियों की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

महाराष्ट्र पिछले कुछ वर्षों से लगातार राजनीतिक उथल-पुथल का केंद्र बना हुआ है। पहले शिवसेना का विभाजन, फिर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में टूट और अब सांसदों के स्तर पर नया विवाद राज्य की राजनीति को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ले आया है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल छह सांसदों की बगावत तक सीमित नहीं रह सकता। यदि असंतोष की भावना संगठन के अन्य स्तरों तक पहुंचती है तो भविष्य में और बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

अब सभी की नजर लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष प्रस्तुत दस्तावेजों, संबंधित सांसदों के आधिकारिक रुख और शिवसेना (UBT) नेतृत्व की प्रतिक्रिया पर टिकी है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह केवल अस्थायी राजनीतिक संकट है या महाराष्ट्र की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत।

फिलहाल इतना तय है कि छह सांसदों की बगावत ने उद्धव ठाकरे के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है और महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर तेज राजनीतिक घटनाक्रमों के दौर में प्रवेश कर चुकी है।

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