Tuesday - 26 January 2021 - 2:07 AM

भीड़ के उत्साह में खुद की नसीहत भूल रहे हैं नेता

प्रीति सिंह

पिछले दिनों बिहार में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनावी रैली करने के लिए गए थे तब भी उन्होंने जनता से मास्क लगाने व सोशल डिस्टेसिंग पालन करने के लिए कहा था। देश में जब से कोरोना के मामले आए हैं तब से लेकर अब तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कई बार देशवासियों से कह चुके हैं कि कोरोना को हल्के में न लें। जब तक दवा नहीं है तब तक मास्क पहने और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें।

लेकिन जनता को नसीहत देने वाले प्रधानमंत्री खुद बिहार में चुनावी रैली के दौरान यह नियम पालन करने से चूक गए। बिहार में रैलियों के दौरान बोलते समय वह बिना मास्क के ही नजर आए। बिहार से चुनावी सभाओं की जो तस्वीरें सामने आ रही है उसे देखकर तो यही लग रहा है कि बिहार में कोरोना खत्म हो गया है।

रैलियों की वीडियो फुटेज बता रही है कि नेताओं की एक झलक पाने के लिए भगदड़ जैसे हालात बन रहे हैं। इन रैलियों में शामिल हो रही भीड़ में शायद ही कोई मास्क पहनता दिख रहा है। जनसभा चाहे तेजस्वी यादव की हो या नीतीश कुमार की, जनसभा राहुल गांधी की हो या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की, हर सभा कोरोना महामारी का मजाक उड़ा रही है।


सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए दो महीने की तालाबंदी करने वाली बीजेपी सरकार भी इसको लेकर गंभीर नहीं है। बिहार में खुद प्रधानमंत्री मोदी की सभाओं में पीछे लोग एक दूसरे पर चढ़े नजर आए। कहीं से भी सोशल डिस्टेंसिंग का पालन होता नहीं दिखा।

मुजफ्फरपुर में तो प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि ‘एक तरफ कोरोना वायरस की महामारी है और दूसरी तरफ जंगलराज है। अगर उनकी सरकार आई तो लोगों पर दोहरी मार पड़ेगी। वे कोरोना का फंड भी खा जाएंगे। पिछले ट्रैक रेकॉर्ड के आधार पर लोग जंगलराज के युवराज से और क्या उम्मीद कर सकते हैं। प्रधानमंत्री ने कोरोना महामारी को जंगलराज के आगे कमतर करार दिया।

प्रधानमंत्री के इस रवैये को क्या कहा जायेगा। एक तरफ वह खुद लोगों से मास्क लगाने और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की अपील करते हैं और दूसरी ओर अपनी जनसभा में उमड़ती भीड़ देखकर आह्लादित होते हैं। उन्हें कुछ गलत नजर नहीं आता। वह जनता से बताते हैं कि जंगलराज कोरोना से बड़ी समस्या है।

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दरअसल कोरोना काल में भी ज्यादा भीड़ इकट्ठा होना ही विशाल जन समर्थन माना जा रहा है। चुनाव आयोग भी इस मामले में विशेष सख्ती नहीं दिखा रहा है, इसीलिए नेताओं के हौसले बुलंद हैें।

कुछ दिनों पहले चुनाव आयोग ने कोविड-19 के लिए बताए गए नियमों का उल्लंघन करने वाले नेताओं को चेतावनी दी थी, लेकिन, ऐसा लग रहा है कि इसका शायद ही कोई असर हुआ हो क्योंकि रैलियों में भीड़ लगातार इकट्ठी  हो रही है।

वहीं वायरोलॉजिस्ट और डॉक्टरों ने चुनावी रैलियों में जुट रही इस भारी भीड़ को “संवेदनहीन” करार दिया है और कहा है कि इस तरह की लापरवाही के भयानक दुष्परिणाम हो सकते हैं, लेकिन इनकी बातें सुनेगा कौन? जब देश और प्रदेश के मुखिया ही नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं तो बाकी लोगों से क्या उम्मीद की जा सकती है।

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दरअसल सत्ता की लालसा में नेता भूल चुके हैं कि कोरोना महामारी की वजह से हुए तालाबंदी की जनता और देश ने कितनी बड़ी कीमत चुकायी हैै। कोरोना संक्रमण रोकने के लिए सरकार ने दो महीने की कठोर तालाबंदी की, जिसकी वजह से लाखों लोगों की नौकरी चली गई। रोजी छिन जाने की वजह से प्रवासी मजदूर पैदल ही अपने गांव लौटने को मजबूर हुए। कितनों ने अपनी जान गवां दी। इतना कुछ होने के बाद भी लोगों ने उफ तक नहीं किया और सरकार के इस फैसले के साथ खड़े रहे।

लेकिन आज वहीं सरकार उन दिनों को भूल चुकी है और सत्ता की लालसा में लोगों के जान के साथ खिलवाड़ कर रही है। उसे न तो अपने नेताओं की चिंता है और न ही जनता की। अब तक देश में कोरोना के 70 लाख से ज्यादा मामले दर्ज किए जा चुके हैं और 1 लाख से ज्यादा लोग अपनी जान गवां चुके हैं, फिर भी इस कदर लापरवाही बरती जा रही है। यूरोप के कई देशों में तो दोबारा तालाबंदी की ओर लौट गए हैं। वहां की सरकारें कोरोना को लेकर चिंतित हैं और हमारे यहां जश्न का माहौल हैं।

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