Tuesday - 11 August 2020 - 9:45 PM

डंके की चोट पर : इन्साफ का दम घोंटते खादी और खाकी वाले जज

शबाहत हुसैन विजेता

पड़ोसी मुल्क ने हमारी ज़मीन हड़प ली तो हमने उसके तैयार किये हुए 59 एप डिलीट कर उससे बदला ले लिया. गैंगस्टर ने दस पुलिसकर्मियों को शहीद कर दिया तो उसी के बुल्डोज़र से उसका घर ढहा कर उससे बदला ले लिया. उसकी गाड़ियों को बुल्डोजर से कुचलवा दिया गया. रिक्शे वाले पर 21 लाख 76 हज़ार रुपये का मुआवजा तय कर दिया. वह नहीं दे पाया तो उसे जेल भेजने की तैयारी है.

न मुकदमा, न सुनवाई, न जज न अदालत. मौका-ए-वारदात पर फ़ौरन फैसला. इस फैसले के खिलाफ कहीं अपील नहीं. किसी ने अपील करने की जुर्रत भी की तो एक और क़ानून तैयार.

हम विश्वगुरु बनने निकले थे, किधर चल पड़े. जनता के वोटों से चुने जाने वाले जज बनने की राह पर चल पड़े हैं. उन्हें लगता है कि चुनाव जीतकर वह जनता के मालिक बन गए हैं. वह जो कह देंगे वह पत्थर की लकीर हो जाएगा. वह जो कर देंगे वह इतिहास बन जाएगा. उनके पास क़ानून की ताकत है. उनके पास मजिस्ट्रेटी पॉवर है.

दंगे तो पहले भी होते थे. तोड़फोड़ तो पहले भी होती थी. आगजनी तो पहले भी होती थी लेकिन तब इस पर काबू करने का काम पुलिस और मजिस्ट्रेट का होता था. दंगाई पर अदालत में मुकदमा चलता था. जज सबूतों की रौशनी में सजा देता था. तब वोटों से चुने हुए जनप्रतिनिधि की औकात नहीं होती थी कि दंगाग्रस्त इलाके में सियासत की रोटियां सेंकने पहुँच जाये. जहाँ दंगा होता था वहां मजिस्ट्रेट ही सबसे बड़ा होता था.

बहुत दिन पुरानी बात नहीं है जब मजिस्ट्रेट ने जनप्रतिनिधि को दंगाग्रस्त इलाके मंं घुसने से रोका था. मजिस्ट्रेट ने चेतावनी दी थी कि अगर उसने सीमा पार की तो जेल जाना होगा. मजिस्ट्रेट ने यह करके दिखाया था. जेल से छूटने के बाद यह जनप्रतिनिधि संसद में जाकर फूट-फूटकर रोया था. अपनी जान का खतरा बता रहा था.

सियासत एक तिलस्म की तरह होती है. इसे जैसे चाहो इस्तेमाल कर लो. क़ानून की मददगार बन जाए तो क़ानून का राज स्थापित हो जाए और गुनहगार की मददगार बन जाए तो क़ानून गुंडों के पाँव तले मसलता हुआ नज़र आये.

गुज़रे हुए दौर में सियासत और जुर्म दो अलग रास्ते हुआ करते थे. सियासी लोगों ने अपने फायदों के लिए क्रिमनल्स की मदद लेनी शुरू कर दी. सियासी लोगों की मदद करते-करते क्रिमनल्स ने जब यह बात अच्छी तरह से समझ ली कि उनके बगैर सियासी लोग कुछ भी नहीं हैं तब उन्होंने अपना एक पैर जुर्म में और दूसरा सियासत में रख दिया. अब गुंडे संसद और विधानसभाओं में जाने लगे. खादी पहनकर गुंडे गंगा नहाने लगे. सियासी गंगा कब जुर्म को धोने का साधन बन गई यह पता ही नहीं चला.

कानपुर में जो हुआ वह भी सियासत और जुर्म के नेक्सस का नतीजा था. जो गुंडा गुनाह के बल पर अपनी रोजी-रोटी कमाता था और पुलिस से बचता घूमता था वह खादी पहनने के बाद भी जुर्म से गलबहियां करता रहा. सियासत में आने के बाद उसे तलाश करने वाली खाकी उसकी मुखबिर बन गई.

दस पुलिसकर्मियों की शहादत पुलिस की मुखबिरी का ही नतीजा थी. गुनाहों के ज़रिये अरबों कमाने वाले इस सियासी गुंडे पर 60 मुकदमे थे. यह थाने में घुसकर मंत्री का कत्ल कर चुका था. यह अच्छी तरह से जानता था कि जुर्म 60 हों या फिर 61 क्या फर्क पड़ता है. उसने इकसठवां जुर्म कर दिया और फरार हो गया.

दस शहादतों के बाद गुज़र गए सांप की लकीर पीटने पुलिस पहुँच गई. उसने एक दिन पहले ही सियासत से बदले का ककहरा पढ़ा था. उसे मालूम था कि जब कुछ एप डिलीट कर किसी मुल्क से बदला लिया जा सकता है तो फिर अगर कातिल का मकान गिरा दिया जाए. उसकी गाड़ियाँ कूच दी जाएँ तो शहादतों का बदला तो पूरा हो ही जाएगा. इस तरह पुलिस ने बदला ले लिया.

लखनऊ में सियासी आदमी जज बन सकता है तो कानपुर में खाकी वर्दी वाला भी जज क्यों नहीं बन सकता. इस सबके साथ-साथ जब आपके सुर में सुर मिलाकर चीखने वाला टेलिविज़न भी तो फिर डर किस बात का है. हम उसी दौर में पहुँच गए हैं जब राजा बोला रात है, मंत्री बोला रात है, अफसर बोला रात है यह सुबह-सुबह की बात है.

हम विश्वगुरु बनने निकले थे. कौन से रास्ते पर चल निकले हैं कोई आज बताने वाला भी नहीं है. संसद में अपने साथ हुई नाइंसाफी पर दहाड़ें मारकर रोने वाला आज रिक्शे वाले से लाखों का मुआवजा वसूलने पर तुला है.

यहाँ सवाल रिक्शे वाले को बचाने का नहीं है. रिक्शे वाला अगर दोषी है. अगर उसके खिलाफ सबूत हैं तो उसे पकड़कर अदालत के सामने पेश करना चाहिए. जज उसके बारे में फैसला करे. जब आपको आज जज की ज़रूरत ही महसूस नहीं होती तो क्या आप लोकतंत्र को भी मार डालेंगे. क्या आप आगे चुनाव नहीं होने देंगे. चुनाव होंगे तो आपके फिर से जीत जानने की गारंटी आप कहाँ से खरीदेंगे.

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रास्ते तो आप ही बना रहे हैं. कल आप हार जायेंगे तो आपकी कुर्सी पर कोई दूसरा बैठ जाएगा वो भी आपकी तरह से फैसले करने लगेगा. जब सियासत ऐसे फैसलों को सही मानने लगेगी तो विश्वगुरु का सपना तो छोड़ ही दीजिये आपको घर से निकलने में भी शर्म आने लगेगी. आपको समझना होगा और यह बात माननी भी होगी कि अपने चेहरे के किसे दाग नजर आते हैं. आइना वक्त को तस्वीर दिखा देता है.

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