Monday - 17 May 2021 - 9:58 PM

डंके की चोट पर : आज अगर खामोश रहे तो कल सन्नाटा छाएगा

शबाहत हुसैन विजेता

वो मेरे बचपन का दौर था. सड़क पर नारे लग रहे थे नसबंदी के तीन दलाल इन्दिरा-संजय-बंसीलाल. तब न नसबंदी का मतलब मालूम था, न दलाल की परिभाषा पता थी, न बंसीलाल और संजय के बारे में ही कुछ मालूम था. हाँ यह पता था कि इन्दिरा गांधी प्रधानमंत्री हैं.

गलियों में नारे लगाते हुए लोग गुज़रते थे और दरवाज़े से झांकते बच्चो को टीन से बने बिल्ले बांटते थे. इनमें सेफ्टीपिन लगी होती थी. कभी उस बिल्ले पर कंधे पर हल धरे किसान बना होता था और कभी गाय और बछड़े की तस्वीर होती थी. बिल्लों पर बनी तस्वीरों से हमारा कोई लेना-देना नहीं होता था. हम बच्चे अपनी शर्ट पर दोनों बिल्ले एक साथ लगाते थे.

दिल्ली में पेड़ पर हेलीकाप्टर गिर गया था. उसमें संजय गांधी की मौत हो गई थी. संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी छोटे से बच्चे वरुण को लेकर राजनीति में आ गई थीं. उन्होंने संजय विचार मंच बनाया था. संजय गांधी के दोस्त अकबर अहमद डम्पी और मेनका गांधी ने देश भर में घूमकर इन्दिरा गांधी की हुकूमत को हिलाकर रख दिया था.

इलेक्शन होता उसके पहले ही इन्दिरा गांधी की हत्या हो गई. हत्या करने वाले सिक्ख थे. राजीव गांधी प्रधानमंत्री बन गए थे. वह इन्दिरा गांधी के अस्थि कलश जिधर लेकर गुज़र जाते जनसमुद्र उमड़ पड़ता. वह एकतरफा चुनाव था. सड़कों पर फिर नारे लिखे थे, बेटी है सरदार की देश के गद्दार की.

मेनका चुनाव हार गई थीं. राजीव चुनाव जीत गए थे. एक चुनाव ने दलाल शब्द दिया था तो दूसरे चुनाव ने गद्दार शब्द दे दिया था. राजीव गांधी की सरकार आराम से चल रही थी. मेनका गांधी भी दिल्ली में शान्ति से बैठ गई थीं मगर ज़ेहन में दलाल और गद्दार के बीच आये दिन गुत्थम-गुत्था हुआ करती थी.

राजीव गांधी की सरकार बहुत स्मूथली चल रही थी. राजीव गांधी की सरकार में ईमानदार मंत्री थे विश्वनाथ प्रताप सिंह. विश्वनाथ प्रताप सिंह और राजीव गांधी के बीच क्या हुआ था यह तो नहीं पता लेकिन वह इस्तीफ़ा देकर सरकार से अलग हो गए थे. उनका इल्जाम था कि बोफोर्स तोप की खरीद में दलाली खाई गई है.

विश्वनाथ प्रताप सिंह ने वादा किया था कि प्रधानमंत्री बनते ही दलालों के नाम बेनकाब कर दूंगा. चुनाव के दौर में ही उन्होंने अमिताभ बच्चन, राजीव गांधी और हिंदुजा पर दलाली खाने का इल्जाम लगा दिया था. सरकार बनते ही दलालों को जेल भेजने का नारा दिया था.

सड़कों पर लिखा था राजा नहीं फ़क़ीर है, देश की तकदीर है. इलाहाबाद की सड़कों पर बुलेट मोटर साइकिल पर सवार राजा मांडा प्रधानमंत्री की कुर्सी की तरफ बढ़ते जा रहे थे. प्रधानमंत्री बनने के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह ने किसी दलाल को बेनकाब नहीं किया था. सरकार बनने के बाद कोई जेल नहीं गया था. सब कुछ आराम से चलता रहा. कहा जाता था कि चुनाव हारकर राजीव इटली भाग जायेंगे. राजीव गांधी भी कहीं गए नहीं थे.

सियासत की गाड़ी दलाल, गद्दार और रक्षा सौदों में घूस खाने वाले रास्तों से गुज़रती हुई अयोध्या पहुँच गई थी. अयोध्या में बाबरी मस्जिद को सरकार द्वारा जमा की गई भीड़ ने गिरा दिया. जिस गंगा जमुनी तहजीब की मिसालें दी जाती थीं उस पर कालिख पोत दी गई. जिस लोकतंत्र और संविधान की कसमें खाई जाती थीं उसे कत्ल कर दिया गया.

अयोध्या में मस्जिद गिरने के बावजूद मोहब्बत का जो ताना बाना था वह बना रह गया. मोहब्बत को डोर को सियासत तोड़ नहीं पाई. इसी डोर को तोड़ने के लिए सियासत ने गोधरा में ट्रेन जलवाई. इसी डोर को तोड़ने के लिए गुजरात में इशरत का इनकाउंटर कराया गया. इसी डोर को तोड़ने के लिए सियासत ने क्या-क्या नहीं किया.

फिर चुनाव आ गया था. इस बार नारा था अबकी बार मोदी सरकार. इस नारे के साथ-साथ काला धन वापस लाने का वादा था. सबके खातों में 15-15 लाख रुपये भेजने का वादा था. इस नारे के साथ-साथ सबका साथ-सबका विश्वास का भी नारा था. इस नारे के साथ यह भी कहा गया था कि अच्छे दिन आयेंगे. महंगाई खत्म होगी. पेट्रोल 30 रुपये लीटर बिकेगा.

चुनाव का रिज़ल्ट फिर आ गया. न काला धन वापस आया. न 15-15 लाख रुपये आये. न सबके विकास और विश्वास के बारे में सोचा गया. न पेट्रोल का दाम घटा और न महंगाई ही खत्म हुई.

सबका विश्वास टूटता नज़र आने लगा जब मुल्क को मज़हब के नाम पर बाँटने का खेल शुरू किया गया. नागरिकों से नागरिकता साबित करने को कहा जाने लगा. मौलवी खरीदे जाने लगे, पुजारी बिकते हुए दिखने लगे. धर्म बाज़ार की चीज़ बन गया.

पहली बार देखा कि सरकार अपने मतदाताओं के सामने धमकी देने वाले मोड में दिखाई दी. पहली बार देखा कि चुनाव जीतने वाला खुद को तानाशाह समझने लगा. पहली बार देखा कि सत्ता के शिखर पर बैठे लोगों को जनता के धरनों से कोई सरोकार नहीं. पहली बार देखा कि सरकार खुद को मालिक समझने लगी. पहली बार देखा कि पेंशन बंद हुई. तनख्वाहें घटीं. रोज़गार के अवसर कम हुए. स्कूलों की पढ़ाई महंगी हुई. अस्पताल में इलाज मुश्किल हुआ.

पहली बार यह भी देखा कि माफियाओं की भी पार्टियाँ होती हैं. माफिया को जिन्दा रहना है तो सरकार के साथ खड़ा होना होगा. पहली बार देखा कि इन्साफ लोगों से कोसों दूर हो गया.

यह सब एक दिन में नहीं हुआ. जिस दिन पब्लिक ने नारा सुना था नसबंदी के तीन दलाल, इन्दिरा संजय बंसीलाल. उसी दिन यह तय होना चाहिए था कि नई सरकार अगर इन दलालों को जेल नहीं भेजेगी तो सरकार बदली जायेगी.

बोफोर्स के नाम पर सरकार बनाने वाले वी.पी.सिंह सरकार बनाकर खामोश बैठते तो जनता ने उनका कालर तभी पकड़ लिया होता तो बाद का कोई नेता कालाधन वापस लाने का झूठा वादा नहीं कर पाता. 15 लाख का वादा करने वाला पेट्रोल के नाम पर शुद्ध लूट की हिम्मत नहीं कर पाता. जनता हिसाब माँगना भूल गई है क्योंकि आटा महंगा और डाटा सस्ता है. सस्ते डाटा से माहौल बिगाड़ने की साजिशें चल रही हैं.

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दिल्ली बार्डर पर किसान बैठे हैं. इन्साफ उनसे कोसों दूर है. शाहीनबाग़ और घंटाघर सूने पड़े हैं. लोगों के दिलों में डर की हिलोरें उठ रही हैं. बंगाल में रामराज्य लाने के वादे चल रहे हैं. जिन राज्यों में लूट हो रही है वहां सन्नाटा है. प्रधानमंत्री और गृहमंत्री बंगाल में डबल इंजन सरकार से विकास की बातें कर रहे हैं. बात साफ़ है जहाँ विपक्ष की सरकार है उसे केन्द्र से फायदे नहीं मिलेंगे.

बातें धीरे-धीरे समझ आने लगी हैं. सत्तर सालों में इतनी बार लुटने के बाद साहिर लुधियानवी फिर चीखने लगे हैं :- आज अगर खामोश रहे तो कल सन्नाटा छाएगा, हर बस्ती में आग लगेगी हर बस्ती जल जायेगी, सन्नाटे के पीछे से तब एक सदा ये आयेगी. कोई नहीं है कोई नहीं है कोई नहीं है कोई नहीं.

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