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डंके की चोट पर : क्या खालिस्तान के सपने को फिर मिल रहा है खाद-पानी

शबाहत हुसैन विजेता

खालिस्तान का सपना तो 1984 में ही मर गया था. इस सपने ने कितना खून बहाया उसका हिसाब जोड़ पाना भी बहुत मुश्किल बात है. यह सपना तोड़ने के लिए हमें प्रधानमंत्री की कुर्बानी देनी पड़ी थी. यह सपना टूटने के बाद पंजाब में फिर से खुशहाली लौटी थी. फिर से अखंड भारत की खुशियों ने जीना सीखा था.

37 साल सुकून से गुज़र जाने के बाद किसान आन्दोलन के दौर में वो कौन लोग हैं जो खालिस्तान के सपने को खाद-पानी देने का काम कर रहे हैं इसकी जांच अगर फ़ौरन नहीं हुई तो एक बार फिर देश के सुकून में आग लगने वाली है.

ब्रिटिशर्स से आज़ादी मिलने की कीमत भारत ने देश विभाजन के रूप में चुकाई थी. हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की शक्ल में भारत टूट गया था. पाकिस्तान बनने के कुछ ही दिन बाद सिक्खों के मन में भी अलग देश का सपना जन्मा था. खालिस्तान की मांग 60 के दशक में जोर पकड़ी थी.

खालिस्तान बनाने का पूरा आन्दोलन लन्दन की ज़मीन से चला था. इस ख़्वाब को देखने वाला जगजीत सिंह चौहान लन्दन में ही रहता था. पंजाब में चल रहे आन्दोलन को लन्दन से ही फंडिंग होती थी. बात साफ़ है कि भारत को छोड़ कर चले जाने वाले ब्रिटिशर्स भारत को खंड-खंड कर डालने पर आमादा थे.

70 के दशक में इस मांग ने तूल पकड़ा था. 80 आते-आते कई आतंकी संगठन तैयार हो चुके थे. संत जरनैल सिंह भिंडरावाले ने हथियार उठा लिए थे. स्वर्ण मंदिर जैसी पाक-साफ़ जगह पर हथियार जमा होने लगे थे. बब्बर खालसा, खालिस्तान लिबरेशन फ़ोर्स, खालिस्तान लिबरेशन आर्मी जैसे आतंकी संगठनों ने न सिर्फ सरकार बल्कि आम लोगों का जीना भी दूभर कर दिया था.

जिस पंजाब को कुदरत ने पांच नदियों का तोहफा दिया था. जिन पंजाब के निवासियों पर पंच प्यारों का आशीर्वाद था. जो पंजाब पूरे देश का पेट भरता था, उस पंजाब में खून की नदियाँ बहने लगी थीं. लोग पंजाब जाने में डरने लगे थे. शायद ही कोई दिन बीतता हो जब पंजाब में कोई आतंकी वारदात न होती हो.

खून में नहाए पंजाब को आतंक से मुक्त कराने के लिए केन्द्र सरकार ने सख्त फैसले लिए थे. प्रधानमंत्री के निर्देश पर स्वर्ण मन्दिर में सेना ने प्रवेश किया था. स्वर्ण मन्दिर में छुपे आतंकियों को सेना ने मार गिराया था और बड़ी संख्या में हथियारों का ज़खीरा बरामद किया था. सेना के आपरेशन ब्ल्यू स्टार में संत जरनैल सिंह भिंडरावाले की मौत हो गई थी.

जून 1984 में हुए आपरेशन ब्ल्यू स्टार ने खालिस्तान के सपने को तोड़ दिया था. लेकिन 31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी को उनके सिक्ख सुरक्षाकर्मियों सतवंत सिंह और बेअंत सिंह ने प्रधानमंत्री आवास में ही गोलियों से बींधकर आपरेशन ब्ल्यू स्टार का बदला ले लिया था.

इन्दिरा गांधी की शहादत के बाद हिन्दुस्तान में जिस तरह से कत्लेआम हुआ था उसे याद करने से ही लोगों की रूह काँप जाती है. दिल्ली और उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में जिस तरह से खून बहा है उसकी कोई दूसरी मिसाल सामने नहीं है.

दर्द भरी इस दास्तान को याद दिलाने का मकसद बस इतना सा है कि जिस खालिस्तान के सपने को तोड़ने के लिए लाखों की संख्या में लोगों की जानें गई हैं उसे सिर्फ इसलिए जिन्दा करने की कोशिशें की जा रही हैं कि किसान आन्दोलन खत्म कराया जा सके.

किसान आन्दोलन के पीछे क्या वजहे हैं उन पर चर्चा होनी चाहिए थी मगर चर्चा हो रही है रेहाना, मिया खलीफा और मीरा हैरिस के ट्वीट की. देश का आंतरिक मामला और विदेशी हस्तक्षेप की बातें की जा रही हैं.

किसान आन्दोलन में विदेशी हस्तक्षेप है या नहीं यह मुद्दा तो सरकान क़ानून पर रोक लगाकर खत्म कर सकती थी मगर यह सही है कि खालिस्तान का जो आन्दोलन आतंकवाद में बदल गया था उसके पीछे ब्रिटेन का हाथ था. खालिस्तान बनवाने की पुरजोर पैरवी कर रहे ब्रिटेन ने खालिस्तान पर डाक टिकट भी निकाला था. खालिस्तान का सपना देखने वाले डॉ. जगजीत सिंह चौहान को शरण भी दी थी.

शर्म की बात है कि अब तक की किसी भी भारत सरकार ने खालिस्तान के मुद्दे पर ब्रिटेन को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश नहीं की. कोई भी सरकार इस मुद्दे को लेकर इंटरनेशनल कोर्ट में नहीं गई. किसी भी सरकार ने इस मामले को देश का आंतरिक मामला बताकर विदेशी हस्तक्षेप रोकने की कोशिश नहीं की.

आन्दोलन कर रहे किसानों को खालिस्तानी बताकर आखिर क्या साबित किये जाने की कोशिश की जा रही है. लालकिले पर फहराए गए सिक्ख पंथ के झंडे को खालिस्तान का झंडा बताया गया. किसान आन्दोलन में खालिस्तान समर्थक नारे लगाए गए. नारे लगाने वाले पहचान भी लिए गए.

देश इस बात को याद रखेगा कि जिस तरह से किसान आन्दोलन में खालिस्तान समर्थक नारे लगे ठीक वैसे ही एनआरसी को लेकर चल रहे आन्दोलन में पाकिस्तान समर्थक नारे लगे थे. जेएनयू में हुए छात्र आन्दोलन में भी पाकिस्तान के नारे लगे थे. नारे लगाने वाले सभी लोग चिन्हित हो गए थे मगर उनके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई उसकी जानकारी देश को नहीं दी गई.

सरकार का दावा है कि नए कृषि क़ानून किसानों के फायदे के लिए हैं मगर किसान उसे समझ नहीं पा रहे हैं. सरकार का दावा है कि एनआरसी और सीएए हिन्दुस्तानियों के फायदे के क़ानून हैं मगर उसे हिन्दुस्तानी समझ नहीं पा रहे हैं.

जब सारी बातें अकेले सरकार समझ रही है तो उसे जनता को बताती क्यों नहीं. जो क़ानून किसान नहीं चाहते उसे किसानों पर क्यों थोपना चाहती है.

किसान आन्दोलन में खालिस्तान समर्थक नारे लगे तो यह देशद्रोह का मामला है. सरकार को इस पर फ़ौरन कार्रवाई करनी चाहिए थी. नारे लगाने वाले की तस्वीरें जिन हस्तियों के साथ वायरल हुईं, उन्हें सफाई देनी चाहिए थी. नारा लगाने वाले को पकड़कर जेल में ठूंसना चाहिए था. उस पर देशद्रोह का मुकदमा चलाना चाहिए था.

खालिस्तान समर्थक नारा लगाने वालों को छूट और नेशनल न्यूज़ चैनलों पर रोजाना खालिस्तान की चर्चा आखिर क्या दर्शाती है? क्या खालिस्तान के सपने को फिर से ताज़ा किया जा रहा है? क्या अपनी ज़िद को पूरा करने के लिए बनाए गए कानूनों को सरकार अपनी प्रेस्टीज इश्यू से जोड़ रही है? क्या सरकार की प्रेस्टीज इश्यू इतनी बड़ी है कि देश में आतंकवाद की चहलकदमी शुरू हो जाए?

देश ने खालिस्तान के नाम पर जो खूनखराबा झेला है उसे दोबारा झेलने को तैयार नहीं है. खालिस्तान के नाम पर हमने जिस तरह के शानदार नेताओं को खोया है उसके लिए देश अब बिलकुल भी तैयार नहीं है.

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किसान आन्दोलन इतना बड़ा मुद्दा नहीं है जितना बड़ा मुद्दा खालिस्तान बनेगा. सरकार पुराना इतिहास पढ़ ले. फिर ब्रिटेन से फंडिंग शुरू हो सकती है. यह शानदार देश फिर से खून के आंसू रोने को मजबूर हो सकता है. पीएम मोदी ने कहा था कि किसान आन्दोलन का हल एक फोन काल की दूरी पर है. अपने नागरिकों से बात करने से सम्मान बढ़ता है. पीएम खुद किसानों के बीच चले जाएँ तो मसला एक दिन में हल हो सकता है. यह मसला हल होने के बाद खालिस्तान को लेकर सुगबुगाहट को अभी से मसलना होगा वर्ना बाद में देर हो जायेगी.

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