Saturday - 30 May 2020 - 12:55 AM

कुंठाओं से भरा भारत कैसे हो ‘आत्म निर्भर’

केपी सिंह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो नये स्लोगन देश के नाम हालिया संबोधन के दौरान सामने आये हैं- आत्म निर्भर भारत और लोकल-वोकल। उनमें भीड़ को तरंगित कर देने का कौशल है। इसलिए यह स्लोगन भी उनके पिछले नारों की तरह लोगों के दिल-दिमाग और जुबान पर चढ़ रहे हैं लेकिन जब नारे किसी गहरे चितंन की उपज हों तो वे कालातीत सूक्त वाक्य बन जाते हैं जैसे लोहिया जी का नारा जिंदा कौमें पांच साल का इतंजार नही करतीं अन्यथा नारा मनोरंजन करके लोगों की स्मृति से विदा हो जाते हैं। जैसे चुनाव के वक्त नशे की तरह लोगों पर सवार किया गया मैं चौकीदार का नारा। ऐसे खोखले नारों के लिए जुमलेबाजी का टर्म बनाया गया है।

ये भी पढ़े: कोरोना : योगी सरकार खत्म कर सकती है कई पद

ये भी पढ़े: जय बजरंगबली, तोड़ कोरोना और नफरत की नली

ऐसा नही है कि आत्म निर्भर भारत और लोकल-वोकल में कोई दम न हो। लेकिन कोई आवाहन हो तो उसे साकार रूप देने के लिए उदघोष कर्ता के मन में सुचिंतित रूपरेखा होनी चाहिए। इसके अभाव के कारण ही मेक इंडिया का आवाहन अपनी सार्थकता नही ढूढ़ पाया। प्रधानमंत्री के नये नारे भी ऐसे ही खिलवाड़ का शिकार न हो जायें।

आत्म निर्भर भारत के मामले में सबसे बड़ी रुकावट क्या है- सदियों की गुलामी के कारण हमारे अंदर रची बसी हीन भावना। आज स्थिति बदल गई है। दुनियां के सारे बड़े देशों में भारतीय नंबर एक हैं क्योंकि हर व्यवस्था में उनका प्रभुत्व है। चाहे बड़ी कंपनियों के सीईओ के मामले में हो या विकसित देशों की सरकारों के मामले में। फिर भी भारतीयों में अभी वह आत्म विश्वास नही आ पाया है जिसकी जरूरत है।

ये भी पढ़े: जानें कैसे शुरू होगा दोबारा खेल

वह कोई पहल नही कर पा रहे जिसके पीछे सारी दुनियां चलने में गौरव महसूस करे। इससे तो गुलामी के दौर की स्थितियां बेहतर थीं। जब महात्मा गांधी जैसी शख्सियत ने जन्म लिया। अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए दुनियां के किसी हिस्से में आज के समय कोई आंदोलन खड़ा होता है तो लोगों को महात्मा गांधी और उनका अहिंसक सत्याग्रह याद आता है। विज्ञान, उद्योग, कृषि, व्यापार किसी भी क्षेत्र मे मौलिक सृजन में भारतीय अपना नाम सामने नही ला पा रहे। अनुकरणवाद भारतीयों की पहचान बन गया है। पर निर्भरता इसकी अनिवार्य परिणति है। इससे उभरने के लिए कोई शुरूआत सोची जाये तो वह शिक्षा से होनी चाहिए। क्या इस पर ध्यान दिया जा रहा।

ये भी पढ़े: ICMR ने बदली टेस्टिंग रणनीति, अब इनकी होगी कोरोना जांच

आजादी की लड़ाई ने राष्ट्र नायकों में आत्म गौरव की भावना पैदा की थी क्योंकि अनुकरणवाद को झटके बिना अपने लक्ष्य के लिए उनमें मजबूत इच्छा शक्ति बन ही नही सकती थी।

इसलिए अंग्रेजी में इंगलैंड के विद्वानों तक के कान काटने वाले राष्ट्र नायकों ने अपने कार्य व्यवहार के लिए राष्ट्र भाषा को अपनाया। जबकि इनमें से महात्मा गांधी सहित कई राष्ट्र नायक तो ऐसे थे जो राष्ट्र भाषा में अटकते रहते थे। आजादी की लड़ाई के बाद भी स्वप्न दृष्टा राजनीतिज्ञ देसी भाषाओं को पढ़ाई का माध्यम बनाने के लिए जोर देते रहे।

अंग्रेजी के प्रोफेसर होकर राजेंद्र माथुर ने पत्रकारिता के लिए इसी के तहत हिंदी को चुना। आज जब यह सिलसिला मंजिल तक पहुंचना चाहिए था, शिक्षा नीति में विदेशी भाषा के सामने पूर्ण समर्पण किया जा चुका है। विज्ञान, प्राद्यौगिकी, व्यापार, विधि आदि में तरक्की के लिए अंतर्राष्ट्रीय संपर्क भाषा की मजबूरी जताकर यह किया गया लेकिन यह सारे तर्क कपटपूर्ण हैं। गुलामी में हीनता के साथ-साथ कई और कुंठाऐं पनपती हैं जो मानसिकता को बीमार बना देती हैं।

भारतीय समाज ऐसी तमाम कुंठाओं का शिकार है। एक कुंठा है जलन की ग्रन्थि में अटके रहने की। जैसे कि उसे विदेशी विद्वता से जलन है। एक क्षण में वह बिना किसी तर्क संगत मैरिट के उस दर्शन को खारिज कर देता है जिसको किसी विदेशी विद्वान ने प्रतिपादित किया हो इसके बावजूद कि भारतीय संस्कृति मूल रूप से वसुधैव कुटुंबकम की हिमायती है।

ये भी पढ़े: मदिरालय और देवालय के जरिए योगी को घेर रहे हैं शिवपाल

ये भी पढ़े: कभी शहर से गावं में आता था पैसा , अब उलट गए हैं हालात

वह चाहता है कि दुनियां के बड़े देश उसे मान-सम्मान से बसने का अवसर दें लेकिन अपने यहां वह इस नौबत पर विदेशी मूल के प्रति घृणा की इंतहा से नही चूकता। चुनाव में उसे सिर्फ इस आधार पर किसी दल का मुरीद बन जाता है कि वह वंचितों को दिये गये विशेष अवसर को खत्म करने का चकमा देने और धर्म द्रोहियों को सबक सिखाने का भरोसा दिलाने मे सफल है। वह अपने से निचले पायदान पर खड़े लोगों पर अपना दबदबा खत्म नही करना चाहता। इस जलन को पूरा करने के लिए उसे अपने ऊपर दोबारा विदेशी प्रभुत्व तक स्वीकार है। विदेशी भाषा की प्रभुता का समर्थन करने के पीछे यही कारक लागू है। यहां का मुटठी भद्र लोक प्रभुता की अपनी विरासत कायम रखने के लिए विदेशी भाषा की शरण में हैं। इसीलिए संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा को पैटर्न अब ऐसा बनाया गया है जिससे देसी भाषा का कोई अभ्यर्थी देश के सर्वोच्च प्रशासनिक सत्ता लोक में प्रवेश न कर पाये।

अब केवल भाषा की बात नही रह गई। भाजपा के सत्ता में आने से जो लोग कान्वेंट स्कूलों के दिन लदने के सपने देख रहे थे वे हतप्रभ हैं। इन कान्वेंट स्कूलों में शिक्षा नही दी जाती बल्कि कल्चर सिखाया जाता है। यह कल्चर यहां की जमीनी जरूरतों से जुड़ा कल्चर नही है। यह साहबी का आयातित कल्चर है। भाजपा वाले उद्धरण तो पौराणिक कहानियों के देते हैं जिनमें बताया जाता है कि चक्रवर्ती सम्राट तक अपने बच्चों को महल में गुरुओं को बुलाने की बजाय उनके गुरुकुलों में अपनी संतानों को पढ़ने भेजते थे। जहां कोई सांसारिक सुख की सुविधा नही होती थीं और राजा और रंक यानि कृष्ण और सुदामा एक साथ पढ़ते थे। क्या आयातित संस्कृति का गुलामा बनकर नई पीढ़ी आत्म निर्भरता के लिए मुखातिब हो सकेगी।

ये भी पढ़े: पहली बार विधायक बने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री

अनुकरणवाद की शिकार नस्लें हर कहीं अपनी जड़े उखाड़ कर चलती हैं। उन परंपराओं को इन मनी प्लांटों ने अपने जीवन का हिस्सा बना लिया है जो इन पर ब्रेनवॉश के तहत लादी गईं हैं। सर्दियों में आइस्क्रीम के काउंटर की डिमांड इस देश में अटपटी लगती है। जंक फूड तमाम नुकसान के बावजूद बच्चों के लिए अनिवार्य हो गये हैं। बुंदेलखंड जैसे इलाके में लोग सत्तू का स्वाद भूल चुके हैं। लोग विज्ञापनों और टीवी चैनलों से गाइड होते हैं। ऐसे शौकीन नकलचियों में चाइनीज सामान यहां खूब खपता है तो आश्चर्य क्या है। स्वास्थ्य का जोखिम उठाकर भी फैशन की आदतें पोसी जा रही हैं।

आत्म निर्भर भारत तब बन सकता है जब हीन भावना से सभी कुंठाओं से भारतीय समाज को मुक्त किया जा सके। आत्म सम्मान को आत्माभिमान के स्तर तक ऊंचा उठाने की जरूरत है। स्वदेशी की कटटरता भरने का समय है। कभी-कभी जब समाज में मानसिकता के स्तर पर ऐनीमिया हो जाता है तब अतिवाद रचनात्मक गुण बन जाता है। अपनी आदतें, अपना पहिरावा, अपना खानपान सबसे श्रेष्ठ बताकर दूसरे पर थोपने तक की जिद, सनक और पागलपन की आवश्यकता है।

ये भी पढ़े: शाहिद अफरीदी को इंडियन क्रिकेटर्स ने क्यों लताड़ा?

हाल के दशकों में गांवों से जो पलायन हुआ वह लोगों के लिए वरदान बन गया था। परंपरागत जीविका से लोग गांव में परिवार का पेट तक नही भर पा रहे थे। लड़के-लड़कियों की अच्छी पढ़ाई और शादी ब्याह की बात तो दूर है। महानगरों में पहुंचे तो वे दरिद्रता से मुक्त हुए और उनका जीवन स्तर ऊंचा उठा। इसलिए मजदूरों की घर वापसी को लेकर भाव प्रधान होकर सोचना अर्थ का अनर्थ करना है। यह सुनहरे संसार की वापसी की रूमानी कल्पना न होकर आने वाली जटिल चुनौतियों की दस्तक है। जिनका भान करके यथार्थ परक मानसिकता का परिचय दिय जाना चाहिए। आत्म निर्भर भारत की प्रासंगिकता इस दौर में ज्यादा महत्वपूर्ण इसलिए है क्योकि इसकी कवायद को पैर लगने से इन चुनौतियों से निपटने में आसानी होगी।

घर लौटे प्रवासियों की महिलाएं परंपरागत खानपान की सामग्री तैयार करने में माहिर हैं। अगर खानपान के संबंध में स्वदेशी का महत्व स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से लोगों की समझ में आ गया तो इनका व्यापार चल पड़ेगा। यही बात पहरावे, फर्नीचर, सजावट आदि जीवन की विभिन्न गतिविधियों के संबंध में है।

ये भी पढ़े: कभी शहर से गावं में आता था पैसा , अब उलट गए हैं हालात

व्यापार भी एक कला है लेकिन अंग्रेजों के समय जब भारतीय शिल्पकला को सुनियोजित ढंग से बर्बाद किया गया था हम इस मंत्र को भूल गये। गांवों के लोग अपने उत्पाद और अपनी सेवा में प्रचुर गुणवत्ता के बावजूद इसलिए कच्चे पड़ जाते हैं कि उन्हें पैकेजिंग, फिनिशिंग आदि का ज्ञान नही है। वे महानगरों में रहकर आये हैं वहां उन्होंने व्यापार की कलाओं (सेंस) को आत्मसात किया होगा। अब जब परीक्षा का दौर है तो देखना है कि वे कितना खरा उतरते हैं।

कुल मिलाकर आत्म निर्भरता और लोकल-वोकल को लेकर सुगठित समग्र दृष्टि होनी चाहिए। बेहतर होगा कि संघ के अनुसांगिक संगठनों से भी सरकार द्वारा इस मामले में विचार विमर्श करें। जिनकी छवि अभी तक लोगों के बीच सफेद हाथी से ज्यादा नही है संघ के लिए ये दौर एक ऐसा अवसर है जिसमें वह प्रमाणित कर सकता है कि शाखाएं लगाने और बौद्धिक आयोजित करने के अलावा भी उसमें कुछ करने का बूता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, लेख में उनके निजी विचार हैं)

ये भी पढ़े: रियायतों की खुशी के साथ जिम्मेदारी का अहसास भी जरूरी

डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Jubilee Post उत्तरदायी नहीं है।)
English

Powered by themekiller.com anime4online.com animextoon.com apk4phone.com tengag.com moviekillers.com