Monday - 6 April 2020 - 11:35 AM

लकीर का फ़कीर नहीं, फ्रैंक कैप्रियो बनना होगा

  • देश की अदालतों में में लगातार बढ़ रही है मुकदमों की संख्या
  • इनमें बड़ी संख्या छोटे मुकदमों और याचिकाओं की
  • जस्टिस डिलेड जस्टिस डिनाइड की स्थिति से बाहर निकलना होगा

राजीव ओझा

भारतीय अदालतों की काबिलियत और निष्पक्षता संदेह से परे है। इसके बावजूद भारत की सर्वोच्च अदालत में करीब 54,000 से अधिक मुकदमे लंबित हैं। देश की निचली अदालतों और उच्च न्यायालयों में 3.32 करोड़ मामले लंबित हैं। दुनिया के किसी दूसरे देश में इतनी तादाद में मुकदमे लंबित नहीं हैं। अदालत की बड़ी शक्ति और समय छोटे-छोटे मामले निपटाने में खर्च हो रहा है। भारत में बड़ी संख्या ऐसे मुकदमों की है जिसमें सजा एक साल से कम या नाममात्र धनराशि को लेकर होते हैं।

उदाहण के लिए दिल्ली की साकेत में निचली अदालत में अपशब्द का एक मुकदमा 19 साल तक चला। पुलिस आरोप साबित नहीं कर पाई और तीनों आरोपियों को अदालत ने 19 साल बाद बरी कर दिया। महिला कर्मी ने आपत्तिजनक भाषा के लिए तीन कर्मचारियों पर हौजखास थाने में 30 नवंबर 2000 को प्राथमिकी दर्ज कराई थी।

लेकिन ऐसे जजों की कमी नहीं जो लीक से हट कर और विवेक से फैसला देने के लिए जाने जाते हैं। इसमें अमेरिका के रोडे प्रान्त के जज फ्रैंक कैप्रियो अजीबोगरीब या कहिये जरा हट के दिए फैसले के लिये जाने जाते हैं।

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मामला कुछ इस तरह था। एक बार एक 15 वर्षीय मैक्सिकन लड़का दुकान से चोरी करते पकड़ा गया। पकड़े जाने पर उसने गार्ड की पकड़ से भागने की कोशिश की और धक्का मुक्की के दौरान दुकान का एक कीमती शेल्फ भी टूट गया। बच्चे को पुलिस के हवाले कर दिया गया। जज ने अपराध सुना और लड़के से पूछा- क्या तुमने वास्तव में कुछ चुराया था ? बच्चे ने कहा- रोटी और पनीर पैकेट। जज- क्यों? लड़के ने छोटा जवाब दिया- मुझे चाहिए। जज-ख़रीद लेते। लड़का-पैसा नहीं था। जज- परिवार से ले लेते।

लड़का- घर पर केवल माँ है, बीमार और बेरोज़गार। रोटी और पनीर उसके लिए चुराई थी।

जज- कुछ करते नहीं क्या? लड़का- एक कार वाश करता था माँ की देखभाल के लिए। एक दिन छुट्टी की तो मालिक ने निकाल दिया।

जज- आपने किसी से मदद मांगी ? लड़का- सुबह से मांग रहा था। किसी ने मदद नहीं की।

सुनवाई ख़त्म हुई और जज ने फैसला सुनाया

चोरी और विशेष रूप से रोटी की चोरी बहुत भयानक अपराध है और इस अपराध के लिए हम सभी जिम्मेदार हैं। अदालत में हर कोई, मेरे सहित इस चोरी का दोषी है। मैं यहाँ मौजूद हर शख्स पर और अपने आप पर भी 10 डॉलर का जुर्माना चार्ज करता हूँ। दस डॉलर का भुगतान किए बिना कोई भी कोर्ट से बाहर नहीं जा सकता”..जज ने अपनी जेब से $10 निकाल कर टेबल पर रख दिया।जज ने कहा, इसके अलावा मैं स्टोर और प्रशासन पर $1000 का जुर्माना लगाता हूँ कि इन्होने एक भूखे बच्चे से गैर-मानवी व्यवहार किया और इसे पुलिस के हवाले कर दिया। अगर 24 घंटे में जुर्माना नहीं जमा हुआ तो कोर्ट को वो दुकान सील करने का आदेश देना होगा। फैसले के आख़िरी रिमार्क थे “स्टोर प्रशासन और दर्शकों से ली गई जुर्माने की रकम इस लडके को अदा करते हुए अदालत इससे माफी मांगती है”। फैसला सुनकर दर्शको की आंखों से आँसू बह निकले, लड़का जज को बार-बार फ़रिश्ता फ़रिश्ता कहकर बुला रहा था।

अब भारत की अदालत का एक मामला देखिये। यह एक मित्र ने शेयर किया आप भी पढ़ें-

मित्र के पिता 1961 में PWD में चतुर्थ श्रेणी के तकनीकी पद पर नोहर (राजस्थान) में पोस्टेड थे। एक दिन उनके अधिशासी अभियंता ने उनको टूर पर सालासर चलने को कहा। सो वो सुबह सुबह आफिस पंहुचे और वंहा से जीप में बैठकर चालक सहित नौ व्यक्ति रवाना हो गए और सालासर पंहुच कर कोई सरकारी काम तो न हो सका लेकिन दर्शन करने और खाने पीने के बाद चालक की खातिरदारी में कोई कमी रह गयी और उसने वापस आकर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो में जीप के दुरुपयोग की शिकायत कर दी। इस पर अदालत में चालक के अलावा शेष सभी आठ लोगों के विरुद्ध मुकदमा हो गया। बाद में इस केस को बीकानेर सिफ्ट कर दिया गया।

मित्र के पिताजी 1995 में रिटायर हो गये। 2004 में पिताजी ने मित्र से कहा कहा कि कोर्ट में तारीख है और तबीयत खराब है सो कोर्ट में साथ चलना है। कोर्ट में पता चला कि सरकारी वकिल साहब व्यस्त हैं और हाज़िर नहीं हो सकते।

जज साहब नयी तारीख देने लगे तो मित्र के पिताजी ने कहा, साहब इजाजत हो तो कुछ अर्ज करता हूँ। जज साहब के इजाजत देने के बाद मित्र के पिताजी बोले –

“मान्यवर 42 साल पहले जिस जीप के दुरुपयोग का ये मुकदमा है मैं उस जीप में सवार नौ लोगों में से पद व आयु में सबसे छोटा कर्मचारी था, और 1995 में वो अंतिम व्यक्ति था जो रिटायर हुआ और आज के दिन उन नौ लोगों में इकलौता जीवित व्यक्ति भी हूँ, इस मुकदमे की पेशियों में हाज़िर होने के लिए विभाग आज तक मुझे एक लाख तीस हजार रूपये के लगभग का TA/DA के रूप में भुगतान कर चुका है और चूंकि मैं सबसे छोटा कर्मचारी था अत: मुझे ही सबसे कम मिला है लेकिन बराबर भी मान लेते है तो एक लाख तीस हजार गुणे 9 यानी 11लाख सत्तर हजार के करीब का भुगतान राजकोष से हो चुका है और हर पेशी पर सरकारी वकील की फीस व हमारे वकील की फीस व न्यायालय के वक्त की बर्बादी अलग से।

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“मान्यवर, सभी सह अभियुक्तों कि मृत्यु हो चुकी है और मै भी 70 वर्ष का हूँ और अब और अदालत में उपस्थित होने में असमर्थ हूँ, मेरी आपसे प्रार्थना है कि चूंकि जीप दुरूपयोग का ही मामला है और आर्थिक दंड से शायद न्याय हो जाये। अतः मैं अपने गुनाह को स्वीकार करता हूँ और अगर जेल भी जरूरी है तो जेल भेजें, मेरा क्या भरोसा कभी भी टपक सकता हूँ, फिर आपकी अदालत किसको जेल भेजेगी?”

जज साहब ने तुरंत सरकारी वकील साहब को बुलाया और उनकों कहा कि अगर अभियुक्त गुनाह कबूल कर रहा है तो आप इसमें क्या साबित करना चाहते हैं? जीप के दुरुपयोग का अनुमान 36/- रूपये किया गया। यद्यपि मित्र के पिताजी अपने अफसर के निर्देशों का ही पालन कर रहे थे लेकिन चूंकि उन्होंने अघिकारी के गलत आदेशों का विरोध नहीं किया, इसलिए 160/- का अर्थ दंड लगाया गया।

इस प्रकार कुल लगभग 20 लाख रुपये स्वाहा होने के बाद 196/- रूपये की वसूली से हमारी न्याय व्यवस्था ने अपने न्याय के फर्ज को पूरा किया। क्या पुरानी न्याय व्यवस्था में सुधार की जरूरत नहीं? यह सब को सोचना होगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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