Wednesday - 5 August 2020 - 4:30 PM

उत्तर कोरोना काल में क्या होगा वैश्वीकरण का भविष्य ?

डा. मनीष पांडेय

वैश्वीकरण की प्रक्रिया के विस्तार में मूल आर्थिक पक्ष के सापेक्ष ही स्थानीयता और राजनीतिक समीकरण का भी महत्व है। कोरोना संकट के उत्तर काल में वैश्वीकरण से सम्बंधित परिदृश्य व्यापक रूप से बदलेगा।

वैश्वीकरण ने विश्व स्तर पर सामाजिक-आर्थिक बदलाव करते हुए व्यक्ति के जीवन स्तर में वृद्धि की है और संभावनाओं के द्वार भी खोले हैं, लेकिन बौद्ध धर्म में एक मुहावरा है कि स्वर्ग पहुंचने की जो चाभी है, वह नर्क के दरवाज़े भी खोलती है।

बात यहाँ भी कुछ अलग नहीं है। वैश्वीकरण ने व्यापक समृद्धि के साथ ही असमानता एवं वंचना को भी बढ़ाया है। हक़ीक़त में हमने वैश्वीकरण को तो अपनाया, लेकिन उससे जुड़े जोखिमों के बारे में कभी विचार नहीं किया।

यही कारण है कि एक निश्चित समयकाल के पश्चात अर्थव्यवस्था के उदारीकरण और निजीकरण का दौर भी बार-बार मंदी से जूझता है और प्रायः विभिन्न देश पूंजी और श्रम के मुक्त प्रवाह पर नियंत्रण करने लगते हैं।

ग्लोबल विलेज का सपना देखने वाली दुनिया के अधिकांश हिस्सों में मंदी, राष्ट्रवाद एवं सजातीयता के उभार, ब्रेक्जिट, डब्ल्यूटीओ एवं डब्ल्यूएचओ जैसी वैश्विक संस्थाओं की निरपेक्षता पर उठते सवाल और कई देशों की बदलती आर्थिक नीति के कारण पूर्व से ही वि-वैश्वीकरण (डी-ग्लोबलाइजेशन) की प्रवृत्ति उभरने के संकेत मिल रहे थे, जिसे कोरोना के खतरे ने और भी बेनक़ाब कर दिया है।

कोरोना वायरस के फैलाव होने के बाद इसी अप्रैल में जापान ने चीन से कारोबार समेटने वाली कंपनियों के लिए आर्थिक पैकेज का एलान कर दिया। हालाँकि 2017 में भी ऐसी खबरें आईं थी कि जापान चीन से अपना निवेश हटाकर दक्षिण पूर्व एशिया या भारत में लाना चाहता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति लगातार अमेरिकी हितों को लेकर नौकरियां बाहर जाने से रोकने और चीन के ख़िलाफ़ कोरोना वायरस फैलाने को आरोप लगाकर उसे अलग-थलग करने का प्रयास कर रहे हैं।

कोरोना संकट काल में विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे बहुराष्ट्रीय संगठनों पर लोग सवाल खड़े कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ भी समन्वय की कमीं को लेकर विभिन्न देशों के निशाने पर है। व्यापार प्रणाली में विवाद उत्पन्न होने की घोर आशंकाएं हैं। जेनेवा स्थित डब्ल्यूटीओ को किनारे लगाया जा सकता है।

मंदी की चपेट में है दुनिया 

इंटरनेशनल मोनेटरी फंड (आईएमएफ) की मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टलीना जॉर्जिवा ने हाल में कहा, कि ‘कोरोना वायरस की वजह से 90 प्रतिशत वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ चुकी है’। आईएमएफ चीफ ने साफ कहा कि ‘दुनिया के 170 देशों के लोगों की प्रति व्यक्ति आय में भी बड़ी कटौती होगी’। मंदी के कारण तमाम बहुराष्ट्रीय कम्पनियां बड़े पैमाने पर छटनी करेंगी।

भारत की रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड जैसी मजबूत आर्थिक स्थिति वाली कंपनी ने कर्मचारियों के वेतन कटौती का एलान कर दिया हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का भी कहना है कि ‘कोरोनावायरस की महामारी का असर देश के भविष्य पर काली छाया की तरह मंडराता रहेगा और लॉकडाउन का असर सीधे तौर पर देश की आर्थिक गतिविधियों पर पड़ेगा’। गरीब वर्ग को सरकारें काफ़ी हद अनुवृत्ति (सब्सिडी) देकर संभाल सकती हैं किंतु मिडिल और लोअर मिडल क्लास को गंभीर आर्थिक संकट और तनाव का सामना करना पड़ेगा।

एक अनुमान के अनुसार, कोविड-19 की महामारी के कारण वैश्विक उत्पाादन, सप्ला ई, व्याापार और पर्यटन पर विपरीत असर पड़ना तय है। इसके अलावा गावों में वापसी करने वाले लोगों की संख्या लॉकडाउन खुलते ही तेजी से बढ़ेगी, जो स्थानीय स्तर पर रोजगार या उद्यम शुरू करने का प्रयास करेंगे।

अब उनके लिए रोज़गार पैदा करना मुश्किल भरा काम होगा। देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर होने वाला निर्बाध आवागमन अब अधिक कठिन होने जा रहा है। मुट्ठी में दुनिया रखने की जिजीविषा को इस अदृश्य वायरस ने कमज़ोर कर दिया है।

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विश्व के तमाम चिंतक आशंकाओं से घिरे हुए हैं कि यह महामारी वैश्वीकरण को पूरी तरह कमजोर कर देगी; इसकी व्याख्याओं का आधार बदल जाएगा। यद्यपि कई आर्थिक असमंजस के कारण पहले से ही बदलते परिप्रेक्ष्य के अनुरूप वैश्वीकरण को समझने की ज़रूरत महसूस हो रही थी, किंतु कोरोना संकट के उत्तर काल में यह अधिक आवश्यक हो गया है।

वैश्वीकरण की नीति पर फिर शुरू हुई बहस 

आज वैश्वीकरण को फ़िर से समझने की जरूरत आ पड़ी है। इसे हम कैसे परिभाषित करते हैं, यह इस पर तय होगा कि इसके किस संदर्भ पर बात की जानी हैं। यदि एशिया के संदर्भ में बात कर रहे हैं, तो ऐसा लगता है कि भारत, चीन और इंडोनेशिया जैसी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में तेज वृद्धि दिखेगी, जहाँ पर दक्ष मानव संसाधन की अधिकता है, क्योंकि कोरोना वायरस के कारण आधारभूत संरचना पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नही पड़ा है जैसा कि प्राकृतिक आपदाओं की वजह से होता है।

महामारी खत्म होने के बाद ऐसी प्रबल आबादी वाली अर्थव्यवस्थाएं उभर जाएंगी। हम अन्य स्थानों में भी वृद्धि देखेंगे, लेकिन यह वृद्धि धीमी होगी। आर्थिक विकास की क्षतिपूर्ति में मजबूत अर्थव्यवस्था सहायक होगी। आर्थिक रूप से डाँवाडोल देश परिस्थितियों को अपने पक्ष में भुना पाने में असफल रहेंगे।

भारत की अर्थव्यवस्था का परीक्षण भी इसी आधार पर होगा। ढंग से प्रबंधन होने पर भारत जैसे देश मैन्युफैक्चरिंग का हब बन सकते हैं। विकसित देश चीन की जगह भारत को अपने बाजार में विकल्प दे सकते हैं। अमीर देश संकट के समय कामगारों और उद्यमियों को क्षतिपूर्ति देकर और आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित कर अर्थव्यवस्था को पटरी पर बनाए रख सकते हैं, लेकिन जिन गरीब देश के लोगों के पास ऐसी सुरक्षा नहीं है, वहाँ वंचित लोगों के सड़कों पर उतरने का खतरा है। हालाँकि यह आशंकाएँ महामारी नियंत्रित होने की समयसीमा पर भी बहुत कुछ निर्भर होंगी।

लंबे समय से यह विमर्श हो रहा है कि वैश्वीकरण पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। एक धारा इसे पूँजीवाद के विस्तार के परिणाम के रूप में देखती है, जिसमें एक समय पश्चात मंदी का आना स्वाभाविक है। दूसरी धारा समाज और संस्कृति के व्यापक परिप्रेक्ष्य पर बल देती है। इन दोनों ही कारणों से बढ़े मानव आवागमन ने कोविड-19 को रिकॉर्ड तेजी से फैलाने का आधार दे दिया।
दरअसल, हम सोचते हैं कि वैश्वीकरण बहुत अच्छा है क्योंकि यह लोगों को गरीबी से बाहर निकालता है, जीवन को विलासी और सुविधाजनक बनाता है, नौकरियों के अवसर पैदा करता है, टीके, दवाइयां, सामान और पैसे देता है। निःसंदेह इसकी वजह से ही भारत ने भी कई अन्य विकासशील देशों की तरह तेजी से प्रगति की है।

वैश्वीकरण से ही विचारों, प्रौद्योगिकियों, कौशल, वस्तुओं एवं सेवाओं और अन्य देशों के साथ वित्तीय आदान-प्रदान होता है। लेकिन, यह तभी तक सकारात्मक है, जबतक हम इसे अनुशासित और व्यवस्थित कर सकें अन्यथा यह बहुत खतरनाक भी है। इसका डरावना पक्ष भी है।

वैश्वीकरण अच्छा और बुरा दोनों है। इसका फायदा लिया जा चुका है, और अधिक दोहन के लिए इसमें सन्निहित जोखिमों के उचित प्रबंधन की तैयारी करनी चाहिए थी। किन्तु वास्तविकता यह है कि वैश्वीकरण के कारण उत्पन्न खतरों का प्रबंधन नहीं हो पाया हैं। प्रबंधन की कमीं से ही वैश्वीकरण खतरनाक परिणाम दे रहा है। वर्तमान महामारी भी इसी का नतीजा है।

डच-अमेरिकी समाजशास्त्री ससकिया ससेन का मानना है कि वैश्वीकरण यद्यपि राज्यों (स्टेट) के बीच होने वाली प्रक्रिया है, परन्तु वास्तव में यह बड़े-बड़े नगरों के बीच होता है। उनकी पुस्तक ‘द ग्लोबल सिटी’ (1991) के मुताबिक़ ये नगर ही पूंजीवाद के विकास के केंद्र हैं। इन्ही ‘विश्व नगरों’ के आस-पास अब क्षेत्रीय केंद्र (रीजनल सेंटर्स) भी बनने लगे हैं।

उदाहरण के लिए भारत में मुंबई और चीन के वुहान जैसे शहरों ने तेजी से विकास किया है। ऐसे ही विश्व नगरों में व्यापारिक केंद्र, पर्यटन और हवाई अड्डे हैं, जहाँ दुनियाभर के यात्रियों का आना-जाना है। यही लोग अच्छी चीजों के साथ बुरी चीज़ भी फैला रहे हैं। विभिन्न देशों की पारस्परिक आर्थिक निर्भरता वित्तीय संकट का भी प्रसार करती है।

सन 2008 का वित्तीय संकट इसका उदाहरण है। वैश्विक जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण पर भी इस विकास का व्यापक असर है। यानी एक विश्व नगर में कुछ भी होने वाली अच्छी या बुरी घटना बहुत तेजी से पूरी दुनिया में फैल जाती है। वुहान शहर से कोविड-19 वायरस का तेजी से पूरी दुनिया में फैल जाना इस तथ्य को प्रमाणित करता है।

मुक्त व्यापार और निर्बाध आवागमन में इस वायरस के कारण आई बाधाओं और बदली आर्थिक-राजनीतिक परिस्थितियों में वही देश अपने विकास दर को बनाए रख सकता है, जिसकी घरेलू अर्थव्यवस्था और आधारभूत आर्थिक संरचना मजबूत है। तो क्या वैश्वीकरण का समय ख़त्म हो गया? बिल्कुल नहीं! बस हम एक अलग प्रकृति के वैश्वीकरण की ओर बढ़ रहे हैं।

(लेखक दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के अध्यापक हैं)

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