Sunday - 23 February 2020 - 1:47 AM

अर्थ व्यवस्था सुस्त लेकिन बढ़ रही अरबपतियों की संपत्ति

अब्दुल हई

हम सभी लोग बचपन से सुनते आ रहे हैं कि भारत कभी सोने की चिड़िया हुआ करता था इसी के कारण विदेशी आक्रान्ताओं और अंग्रेजों ने इस देश को अपना गुलाम बनाया था और अपार संपत्ति इस देश से लूटकर ले गए थे। कोहिनूर हीरे का जिक्र आप लोगों ने कई बार सुना होगा। आपको पता ही होगा कि ये हीरा भारत के पास हुआ करता था, जिसके बाद ये हीरा कई लोगों के हाथों से गुजरते हुए, आज इंग्लैंड की रानी के ताज की शान बढ़ा रहा है। उस समय पूरे विश्व में इस हीरे का आकार सबसे बड़ा हुआ करता था।

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हैदराबाद के शासक उस्मान अली खान को टाइम मैगजीन द्वारा साल 1937 में दुनिया का सबसे अमीर आदमी घोषित किया गया था। इतना ही नहीं टाइम मैगजीन ने उनकी फोटो अपनी पत्रिका के कवर पेज पर भी लगाई थी और मैगजीन के मुताबिक उस वक्त उनके पास दुनिया में सबसे ज्यादा संपत्ति हुआ करती थी, जो कि उस समय अमेरिका की अर्थव्यवस्था के दो प्रतिशत के बराबर मानी जाती थी। कहा जाता है कि एक बार एक ब्रिटिश अधिकारी ने उनका मजाक बनाया था और कहा था कि उनकी रोल्स रॉयस गाड़ी खरीदने की क्षमता नहीं है। इस मजाक का जवाब निजाम ने 50 रोल्स रॉयस खरीद कर दिया था। इतना ही नहीं इन गाड़ियों का प्रयोग वो कूड़ा उठाने के लिए किया करते थे।

आज आजादी के 70 साल बाद भारतीयों की स्थिति बहुत खराब हुई और इसकों बिगाड़ने वाले हमारे हुक्मरान हैं। गरीबों की बात कर-कर के हमारे नेताओं ने तो अपने बैंक भर लिए लेकिन भारत की आम जनता अभी भी गरीबी में जीने और सिसक-सिसक कर जिंदगी बिताने को मजबूर है।

‘अमीर दिन प्रति दिन अमीर होता जा रहा है’, इस बात को हमने अक्सर सुना है लेकिन एक रिपोर्ट की मानें तो ये सच साबित होती दिख रही है। भारत के 1 फीसद अमीरों के पास देश की कुल जनसंख्या का 70 फीसदी धन है। मतलब 95.3 करोड़ लोगों के पास देश में मौजूद कुल धन का चार गुना ज्यादा धन है। इतना ही नहीं, इन भारतीय अरबपतियों के पास केन्द्र सरकार के एक साल के कुल बजट से भी ज्यादा की संपत्ति है। ये मैं नहीं बल्कि ऑक्सफैम इंटरनेशनल की ताजा रिपोर्ट कह रही है।

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ऑक्सफैम की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में दुनिया में अरबपतियों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है और इनकी संख्या दोगुनी हो गई है। ऑक्सफैम इंडिया के सीईओ अमिताभ बेहर ने कहा, ‘जब तक सरकारें असमानता दूर करने वाली नीतियों पर फोकस नहीं करेंगी, अमीरों और गरीबों के बीच की खाई को दूर नहीं किया जा सकता।’ वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम की 50वीं सालाना बैठक से पहले ऑक्सफैम द्वारा जारी एक स्टडी ‘टाइम टु केयर’ में बताया गया है कि दुनिया के सिर्फ 2153 अरबपतियों के पास दुनिया की 60 फीसदी जनसंख्या यानी करीब 4.6 अरब लोगों से ज्यादा संपदा है।

घरेलू नौकर जितना साल भर में कमाते हैं उतना टेक सीईओ 10 मिनट में

भारत में असमानता के बारे में और बात करते हुए ऑक्सफैम की रिपोर्ट में कहा गया है कि 61 भारतीय बिलिनयरीज के पास जितनी संपदा है, वह भारत सरकार के वित्त वर्ष 2018-19 के कुल बजट (24.42 लाख करोड़ रुपए) से भी ज्यादा है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में किसी टेक्नोलॉजी कंपनी का टॉप सीईओ साल में जितना कमाता है, उतना कमाने में किसी घरेलू महिला को 22,277 साल लग सकते हैं। इसी तरह एक घरेलू नौकर जितना साल भर में कमाता है उतना कमाने में किसी टेक सीईओ को महज 10 मिनट लगते हैं। वह हर सेकंड करीब 106 रुपए कमाता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि जीडीपी के 2 फीसदी तक इकोनॉमी में सीधे सार्वजनिक निवेश किया जाए तो हर साल 1.1 करोड़ नौकरियों का सृजन हो सकता है।

गरीबों को लूट कर बनाया सम्राज्य

नीरव मोदी, मेहुल चोकसी, विक्रम कोठारी, सुब्रत राय, यूनिटैक, किंगफिशर, आईपीएल, 2जी स्कैम, कौमनवैल्थ स्कैम, कोल स्कैम, व्यापमं स्कैम सभी घर-घर की पहचान बने हुए हैं। 22 हजार करोड़ का घपला करके नीरव मोदी विदेश में बैठा है, विजय माल्या 9 हजार करोड़ रुपए लेकर भाग गया, ललित मोदी हजारो करोड़ रुपए का पैसा लेकर भाग गया। ये सबकुछ देखकर अब तो लोग बैंक में पैसा जमा कराने से भी डर रहे हैं। ब्याज की तो बात ही छोड़ो लोगों का मूल भी बैंक में सुरक्षित नहीं है।

अगर देश की सरकार अब भी नहीं जागी तो चंद उद्योगपति बैंक में जमा देश की जनता का सारा पैसा लेकर विदेश भाग जाएंगे और विदेश की नागरिकता ले लेंगे और यहां देश की जनता बर्बाद हो जाएगी। तकरीबन साढ़े 8 लाख करोड़ रुपए का कर्जा बड़े-बडे उद्योगतपतियों ने बैंकों से ले रखा है जो अब इस देश को छोड़कर भागने की तैयारी में हैं। ये सारा पैसा इस देश की जनता का है।

दरअसल, सत्ता और श्रद्धा दोनों का पूरा उपयोग कर के गैरकानूनी तरीके से पैसा बनाया जा रहा है, जनता को कुछ देकर नहीं। देश में जो भी अमीरी दिख रही है, वह साफ-साफ गरीबों, मेहनतकश किसानों, छोटे-मझोले व्यापारियों व उद्योगपतियों से लूटपाट कर जमा किए गए पैसों की है।

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10-15 करोड़ के फ्लैट, 100 करोड़ के मकान, पर्सनल जैट, फाइवस्टार कल्चर, करोड़ों के जेवर पहने बीवियां अमीरों की सूझबूझ की देन कम, उनके संपर्कों की देन ज्यादा हैं। इस देश में सत्ताधारियों की आय जनता को कुछ नया, अनूठा, विलक्षण देने की नीयत नहीं है, बल्कि उसे लूटने के नए, अभिनव, उलझे हुए तरीके ढूंढ़ने की है। किसी भी सांसद या मंत्री का घोषणा पत्र देख लीजिए सभी के आय पहले की तुलना में ज्यादा होगी। इनकी मोटी आमदनी खास तिकड़मबाजों के माध्यम से होती है जो सिस्टम को अपने हिसाब से चला कर जनता की कमाई लूट लेते हैं। अगर 4-5 वर्षों में 100-200 में से एक-दो पकड़े भी जाएं तो इसे आवश्यक रिस्क फैक्टर मान कर भुला दिया जाता है।

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मिलिट्री की भाषा में इसे कोलैट्रल डैमेज कहा जाता है। यह सिस्टम के उपयोग की खराबी नहीं, यह किसी के गड्ढे में भूल से गिर जाने का मामला है, लेकिन आम आदमी, आम उत्पादक या व्यापारी सीमित पैसा ही कमा पाता है इस देश में। उस पर सरकार, बैंकों, इंस्पेक्टरों की इस बुरी तरह जकड़न रहती है कि वह न कुछ नया कर पाता है न संभल पाता है। उसके पास न नेताओं पर उड़ाने के लिए कुछ होता है, न किसी और पर।

अमीर गरीब के बीच बढ़ता फासला नैतिक रूप से क्रूर

ऑक्सफैम इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमिताभ बेहर ने कहा कि आर्थिक असमानता से सबसे ज्यादा महिलाएं प्रभावित हो रही हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल देश में 18 नए अरबपति बने। इसी के साथ अरबपतियों की संख्या बढ़कर 119 हो गई है। उनकी संपत्ति पहली बार बढ़कर 400 अरब डॉलर (28 लाख करोड़) के स्तर को पार कर गई है। इनकी संपत्ति 2017 में 325.5 अरब डॉलर से बढ़कर 2018 में 440.1 अरब डॉलर हो गई है।

महिलाओं और लड़कियों ने 3.26 बिलियन घंटे बिना रुके काम में लगाए हैं और हर दिन- भारतीय अर्थव्यवस्था में कम से कम 19 लाख करोड़ रुपए का योगदान है, जो 2019 में भारत के पूरे शिक्षा बजट का 20 गुना है ( 93,000 करोड़ रुपए)। ऑक्सफैम ने कहा कि चिकित्सा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता और जल आपूर्ति के मद में केंद्र और राज्य सरकारों का संयुक्त राजस्व और पूंजीगत खर्च 2,08,166 करोड़ रुपए है, जो कि देश के सबसे अमीर शख्स मुकेश अंबानी की कुल संपत्ति 2.8 लाख करोड़ रुपए से कम है। ऑक्सफैम इंटरनेशनल की कार्यकारी निदेशक विनी ब्यानिमा ने कहा कि यह ‘नैतिक रूप से क्रूर’ है। उन्होंने कहा, ‘‘यदि एक प्रतिशत अमीरों और देश के अन्य लोगों की संपत्ति में यह अंतर बढ़ता गया तो इससे देश की सामाजिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी।’’

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