Thursday - 29 October 2020 - 6:31 PM

असम : डिटेंशन सेंटर के बाद मदरसों पर वार

जुबिली न्यूज़ डेस्क

नई दिल्ली. असम में सरकारी मदद से चलने वाले मदरसे और संस्कृत केन्द्र बंद करने का फैसला किया गया है. इन शिक्षण संस्थानों को बंद करने के पीछे सरकार की स्पष्ट मंशा है कि सरकारी खर्च पर धार्मिक शिक्षा क्यों दिलाई जाए. सरकार अपना फैसला कर चुकी है और इस फैसले पर सियासत गर्माने लगी है.

असम ही वह राज्य है जहां से नागरिकता संशोधन क़ानून के आन्दोलन की चिंगारी भड़की थी. इसी राज्य में पहली बार डिटेंशन सेंटर बने थे. यही वह राज्य है जहां के हज़ारों लोग अपनी नागरिकता न साबित कर पाने की वजह से डिटेंशन सेंटर में ठूंस दिए गए थे. नागरिकता साबित न कर पाने वालों में हिन्दुओं की संख्या ज्यादा होने की वजह से असम की बीजेपी सरकार बैकफुट पर आ गई थी. यही वजह थी कि केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार सीएए लेकर आयी थी ताकि डिटेंशन सेंटर में बंद हिन्दुओं को नागरिकता देकर रिहा करवाया जा सके.

असम सरकार ने धार्मिक शिक्षा की आड़ लेकर सरकारी मदद से चलने वाले मदरसों और संस्कृत केन्द्रों को बंद करने का फरमान सुनाया है. मदरसों के साथ संस्कृत केन्द्र जोड़कर सरकार ने यह सन्देश देने की कोशिश की है कि वह किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं हैं लेकिन सरकारी खर्च पर धार्मिक शिक्षा को किसी भी सूरत में जारी नहीं रखेंगे.

असम सरकार ने मदरसों और संस्कृत केन्द्रों पर जो हंटर चलाया है उसके पीछे अगले पांच महीनों में राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव हैं. चुनाव से पहले वोटों के ध्रुवीकरण का रास्ता सरकार ने तलाश किया है.

असम में सरकारी सहायता से 614 मदरसे संचालित होते हैं जबकि 100 संस्कृत केन्द्र सरकार की सहायता से चलते हैं. 614 मदरसों पर अचानक से गाज गिरेगी तो वोटों का ध्रुवीकरण निश्चित रूप से होगा. डिटेंशन सेंटर अभी भी लोगों के ज़ेहन से निकला नहीं है.

राज्य सरकार संस्कृत केन्द्रों पर सालाना एक करोड़ रुपये खर्च करती है तो मदरसों पर तीन से चार करोड़ रुपये खर्च करती है. प्राइवेट तौर पर चलने वाले मदरसे और संस्कृत केन्द्र पहले की तरह से चलते रहेंगे. उल्लेखनीय है कि असम में 900 प्राइवेट मदरसे हैं तो 500 संस्कृत केन्द्र हैं.

प्राइवेट तौर पर चलने वाले 900 मदरसों के बारे में असम सरकार ने हालांकि कहा यही है कि प्राइवेट मदरसे चलते रहेंगे और हमें कोई दिक्कत नहीं है लेकिन सच्चाई यह है कि बगैर सरकारी मदद के चलने वाले मदरसों के लिए भी सरकार अपनी गाइडलाइन लाने वाली है. असम के शिक्षामंत्री हिमंत बिस्वा ने बताया कि प्राइवेट मदरसों को भी एक नियामक ढाँचे में चलना होगा और इसके लिए सरकार जल्द ही एक क़ानून ला रही है.

सरकारी मदद वाले मदरसे बंद होंगे और अपने संसाधनों से चलने वाले मदरसों के लिए नियम क़ानून होंगे. अपने मदरसों के लिए धन की व्यवस्था के लिए दौड़धूप करने वाले जब सरकारी शिकंजा भी झेलेंगे तो नाराज़ होंगे. यहीं से वोटों का ध्रुवीकरण शुरू होगा जो सरकार को चुनाव में फायदा पहुंचाएगा.

असम के शिक्षामंत्री ने बताया कि धार्मिक शिक्षा पर हम सरकारी फंड नहीं खर्च कर सकते. धर्मनिरपेक्ष सरकार का काम धार्मिक शिक्षा प्रदान करना नहीं है. उन्होंने बताया कि इस सम्बन्ध में नवम्बर में अधिसूचना जारी कर दी जायेगी. अगले पांच दिन के भीतर सरकारी अनुदान से चलने वाले मदरसों को नियमित स्कूलों में बदल दिया जायेगा.

असम में सरकारी अनुदान से चलने वाले मदरसों को ठीक चुनाव से पहले बंद करने के फैसले पर यह आरोप भी लगने लगे हैं कि अगर मदरसों को लेकर मुसलमान एकजुट हुए और सरकार के खिलाफ मुखर हुए तो वोटों का ध्रुवीकरण होते देर नहीं लगेगी और हिन्दू वोट सरकार के पक्ष में इकट्ठा हो जायेगा. सरकार की मंशा भी यही है.

आल असम मदरसा स्टूडेंट एसोसियेशन के अध्यक्ष वहीदुज्ज़माँ ने बताया कि असम में सरकारी अनुदान से चलने वाले 614 मदरसों में करीब डेढ़ लाख स्टूडेंट पढ़ाई कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि यहाँ पढ़ने वाले बहुत से लोग डाक्टर भी बने हैं और वकील भी. मदरसे बंद हुए तो इनमें पढ़ने वालों के साथ नाइंसाफी होगी.

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वहीदुज्ज़माँ का कहना है कि हिन्दी-उर्दू की बहस में किसी भी स्टूडेंट का भविष्य खराब नहीं किया जाना चाहिए. मदरसों को लेकर दुष्प्रचार एक अरसे से चलाया जा रहा है. सरकार इन्हें बंद करेगी तो हम लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करेंगे और अदालत का दरवाज़ा खटखटाएंगे.

उधर संस्कृत केन्द्र बंद किये जाने के सरकार के फैसले का विरोध भी शुरू हो गया है. माजुली के दखिनपाट मैथ के मठाधीश जनार्दन देव ने सरकार को चेतावनी दे दी है कि संस्कृत हमारी संस्कृति का हिस्सा है. सरकार के इस फैसले को स्वीकार नहीं किया जा सकता.

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