AI एवं टेक्नोलॉजी-चीन ने बनाया वैश्विक AI गठबंधन “WAICO”, अमेरिका को सीधी चुनौती

ओम दत्त

16 जुलाई 2026 को शंघाई में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 29 देशों के साथ मिलकर “वर्ल्ड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन” (WAICO) की स्थापना की। यह अमेरिका के नेतृत्व वाली “Pax Silica” पहल के सीधे मुकाबले में खड़ा एक नया वैश्विक AI-शासन ढांचा है।
शंघाई में आयोजित वर्ल्ड AI कॉन्फ्रेंस (WAIC) में शी जिनपिंग ने घोषणा की कि चीन के नेतृत्व में एक नई अंतर-सरकारी संस्था, WAICO, औपचारिक रूप से गठित हो चुकी है।
इसका मुख्यालय शंघाई में होगा। इसके 29 संस्थापक सदस्य देशों में इंडोनेशिया, ब्राजील, मलेशिया, दक्षिण अफ्रीका, सेनेगल, रूस, पाकिस्तान, कजाकिस्तान, बेलारूस, सर्बिया, क्यूबा और वेनेजुएला जैसे देश शामिल हैं। खास बात यह है कि इसमें कोई भी G7 देश, यूरोपीय संघ का कोई प्रमुख सदस्य, या “फाइव आइज़” गठबंधन का कोई देश शामिल नहीं है-यानी यह पूरी तरह ग्लोबल साउथ पर केंद्रित पहल है।
शी जिनपिंग ने अपने संबोधन में कहा कि किसी एक देश का कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तकनीक पर वर्चस्व नहीं होना चाहिए।
यह टिप्पणी सीधे तौर पर अमेरिका की ओर इशारा मानी जा रही है। उन्होंने ओपन-सोर्स AI को “ऐतिहासिक अवसर” बताते हुए आगाह किया कि अगर तकनीक तक पहुंच असमान रही तो यह “नए ऐतिहासिक अन्याय” को जन्म देगी। साथ ही चीन ने अगले पांच वर्षों में विकासशील देशों को 5,000 AI प्रशिक्षण अवसर देने और 30 देशों को अपने मौसम-पूर्वानुमान संबंधी AI टूल तक पहुंच देने का वादा किया है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय पर हुआ है जब अमेरिका पहले ही अपनी “Pax Silica” पहल के तहत 35 देशों को एकजुट कर चुका है। यानी अब दुनिया के सामने दो समानांतर और प्रतिस्पर्धी AI-गठबंधन खड़े हो गए हैं — एक वाशिंगटन के नेतृत्व में, दूसरा बीजिंग के नेतृत्व में।
यह घटना केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं है- यह इस बात का संकेत है कि दुनिया अब AI तकनीक के मामले में भी शीत-युद्ध जैसी दो-ध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है; ठीक वैसे ही, जैसे पहले व्यापार और सैन्य गठबंधनों में हुआ।
जिस तरह इंटरनेट के शुरुआती दौर में तकनीकी मानक तय करने वाले देशों को दशकों तक फायदा मिला, उसी तरह अब जो गुट AI के नियम, मानक और बुनियादी ढांचा तय करेगा, वह आने वाले दशकों में आर्थिक और सामरिक बढ़त हासिल करेगा। दुनिया के लगभग 60-65 देश अब या तो अमेरिकी खेमे में हैं या चीनी खेमे में। बाकी बचे देशों, खासकर भारत जैसे बड़े लेकिन गुटनिरपेक्ष रुख वाले देशों के लिए यह फैसला करना कठिन होता जा रहा है कि किस मॉडल को अपनाया जाए।
इसके अलावा, यह घटनाक्रम AI सुरक्षा और नियमन को लेकर वैश्विक सहमति बनने की संभावना को भी कमजोर करता है। जब दो अलग-अलग गुट अपने-अपनें मानक, अपनी-अपनी निगरानी व्यवस्था और अपने-अपने डेटा नियम बनाएंगे, तो वैश्विक स्तर पर एकीकृत AI सुरक्षा ढांचा बनाना और मुश्किल हो जाएगा।
आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि भारत, यूरोपीय संघ और आसियान जैसे बड़े गुटनिरपेक्ष खिलाड़ी किस तरफ झुकते हैं, या क्या वे अपना अलग “तीसरा रास्ता” अपनाते हैं।
संयुक्त राष्ट्र और G20 जैसे मंचों पर भी अब दबाव बढ़ेगा कि वे एक साझा, गुट-निरपेक्ष AI नियमन ढांचा तैयार करें, ताकि तकनीकी विभाजन और गहरा न हो।
यह भी संभव है कि आने वाले वर्षों में और देश दोनों में से किसी एक गुट में शामिल होने का दबाव महसूस करें, खासकर वे जो चीन या अमेरिका पर व्यापार और निवेश के लिए निर्भर हैं।
दीर्घकाल में यह प्रतिस्पर्धा या तो AI सुरक्षा अनुसंधान में तेज़ी ला सकती है, या फिर वैश्विक असमानता और तकनीकी विखंडन (fragmentation) को और बढ़ा सकती है।



