E20 पेट्रोल पर बढ़ा विवाद: जनता की शिकायतें, सरकार की सफाई और विशेषज्ञों की राय

देशभर में पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल (E20) मिलाने की केंद्र सरकार की नीति को लेकर बहस तेज हो गई है। सरकार इसे ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, जबकि दूसरी ओर वाहन चालक माइलेज कम होने, इंजन की परफॉर्मेंस प्रभावित होने और मेंटेनेंस खर्च बढ़ने की शिकायतें कर रहे हैं। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इस मुद्दे पर चर्चा तेज है और विपक्ष भी सरकार से जवाब मांग रहा है।

E20 पेट्रोल वह ईंधन है जिसमें 20 प्रतिशत इथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल मिलाया जाता है। इथेनॉल एक बायोफ्यूल है, जिसे मुख्य रूप से गन्ने, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। सरकार का कहना है कि इससे पेट्रोल की खपत कम होगी, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटेगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी। साथ ही किसानों को अपनी फसलों का बेहतर दाम मिलने का रास्ता भी खुलेगा।

पिछले कुछ महीनों में सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में वाहन मालिकों ने दावा किया है कि E20 पेट्रोल इस्तेमाल करने के बाद उनकी गाड़ियों का माइलेज कम हो गया है। कई लोगों ने इंजन की परफॉर्मेंस में गिरावट और सर्विसिंग का खर्च बढ़ने की भी शिकायत की है। दिल्ली में कुछ वाहन चालकों ने इस नीति के विरोध में प्रदर्शन करते हुए मांग की कि उन्हें E10 और E20 पेट्रोल में से अपनी पसंद का विकल्प दिया जाए।

मुंबई के कई सर्विस सेंटरों और मैकेनिकों ने भी अलग-अलग अनुभव साझा किए हैं। कुछ मैकेनिकों का कहना है कि पुरानी मोटरसाइकिलों में कार्ब्युरेटर के भीतर फ्यूल रेजिड्यू जमा होने जैसी समस्याएं देखने को मिली हैं। वहीं कुछ कार सर्विस सेंटर संचालकों का कहना है कि ग्राहक पहले की तुलना में कम माइलेज मिलने की शिकायत कर रहे हैं। हालांकि, कई मैकेनिकों का यह भी कहना है कि उन्हें इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से जुड़ी कोई बड़ी तकनीकी समस्या अब तक देखने को नहीं मिली है।

वाहन चालकों के दावों के बीच केंद्र सरकार ने साफ किया है कि E20 कार्यक्रम किसी जल्दबाजी में लागू नहीं किया गया। सरकार के मुताबिक इस पर वर्षों तक वैज्ञानिक अध्ययन, फील्ड ट्रायल और वाहन निर्माता कंपनियों के साथ व्यापक चर्चा की गई। पेट्रोलियम मंत्रालय का कहना है कि इथेनॉल मिश्रित ईंधन में उच्च ऑक्टेन संख्या होती है, जिससे दहन बेहतर होता है और इंजन की कार्यक्षमता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।

हाल ही में छह प्रमुख वाहन निर्माता कंपनियों ने भी सरकार के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दावा किया कि वर्षों के परीक्षण और सर्विस डेटा में E20 पेट्रोल से वाहनों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचने का कोई प्रमाण नहीं मिला है। हालांकि कंपनियों ने यह स्वीकार किया कि माइलेज में लगभग 3 से 3.5 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।

नीति आयोग की 2021 में प्रकाशित विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, जो वाहन मूल रूप से E0 या E10 ईंधन के लिए डिजाइन किए गए हैं, उनमें माइलेज 6 से 7 प्रतिशत तक कम हो सकता है। वहीं E10 के अनुरूप तैयार किए गए वाहनों में यह कमी केवल 1 से 2 प्रतिशत तक रहने का अनुमान जताया गया था।

उधर पेट्रोलियम मंत्रालय ने भी हाल ही में स्वीकार किया है कि कुछ वाहनों में माइलेज 3 से 5 प्रतिशत तक घट सकता है, लेकिन इंजन को नुकसान पहुंचने के दावों को खारिज किया है। सरकार का कहना है कि व्यापक फील्ड ट्रायल में इंजन पर किसी तरह का नुकसान दर्ज नहीं किया गया।

सरकार ने दावा किया है कि भारत ने पेट्रोल में औसतन 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य तय समय से पहले हासिल कर लिया है। वर्ष 2013-14 में जहां इथेनॉल ब्लेंडिंग 1.5 प्रतिशत से भी कम थी, वहीं 2025-26 तक यह बढ़कर 20 प्रतिशत हो गई है। सरकार के मुताबिक इस दौरान इथेनॉल की खरीद 38 करोड़ लीटर से बढ़कर करीब 1,200 करोड़ लीटर तक पहुंच गई है।

सरकार का कहना है कि अगर पेट्रोल में इथेनॉल का मिश्रण नहीं बढ़ाया जाता तो भारत को और अधिक कच्चा तेल आयात करना पड़ता। इसलिए इस नीति से आयात पर निर्भरता कम करने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने में मदद मिली है।

हाल के दिनों में कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में E20 कार्यक्रम को “चल रहा प्रयोग” बताया है और इसके प्रभाव अगले कुछ वर्षों में स्पष्ट होने की बात कही है। हालांकि विवाद बढ़ने के बाद केंद्र सरकार और कानून मंत्रालय ने इस दावे का खंडन करते हुए कहा कि अदालत में E20 कार्यक्रम को किसी भी स्तर पर “एक्सपेरिमेंट” नहीं बताया गया था।

आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि लोगों को अपनी जरूरत के मुताबिक ईंधन चुनने का विकल्प मिलना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार उपभोक्ताओं की शिकायतों को नजरअंदाज कर रही है। उनका कहना है कि यदि लोग E10 और E20 में से अपनी पसंद का ईंधन चाहते हैं तो उन्हें यह सुविधा मिलनी चाहिए।

कांग्रेस नेता प्रियांक खड़गे ने भी सरकार की नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि इतने बड़े स्तर पर इसे लागू करने से पहले पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण और व्यापक सार्वजनिक चर्चा होनी चाहिए थी। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार नागरिकों से नुकसान साबित करने की चुनौती नहीं दे सकती, जबकि उसका अपना अध्ययन अभी जारी है।

केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि यदि किसी एक भी व्यक्ति की गाड़ी इथेनॉल की वजह से खराब हुई है तो वह सामने आए। उन्होंने लोगों से अपील की कि यदि कोई शिकायत है तो उसे संबंधित डीलर या सरकार तक पहुंचाया जाए।

वहीं पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि इथेनॉल मिश्रित ईंधन का इस्तेमाल दुनिया के कई देशों में सफलतापूर्वक किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि रेसिंग कारों में भी इथेनॉल का उपयोग होता है और इससे एक्सेलेरेशन बेहतर होता है। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि कुछ मामलों में माइलेज थोड़ा कम हो सकता है, लेकिन इसे लेकर फैलाई जा रही कई बातें भ्रांतियां हैं।

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि इथेनॉल नीति पर बहस केवल माइलेज या इंजन तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उनका कहना है कि इस नीति का मूल्यांकन ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण, किसानों की आय और उपभोक्ताओं के अनुभव जैसे सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकार, वाहन निर्माता कंपनियां, तेल कंपनियां, किसान, बीमा कंपनियां और उपभोक्ता संगठनों को साथ लेकर एक साझा मंच बनाया जाए, जहां सभी पक्षों की चिंताओं पर चर्चा हो सके। साथ ही उपभोक्ताओं को उनकी गाड़ी के अनुरूप ईंधन चुनने का विकल्प देने पर भी विचार किया जाना चाहिए।

फिलहाल E20 पेट्रोल को लेकर सरकार अपने फैसले पर कायम है, जबकि वाहन चालकों और विपक्ष की ओर से उठ रहे सवालों ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है। आने वाले समय में इस नीति के वास्तविक प्रभाव और उपभोक्ताओं के अनुभव इस विवाद की दिशा तय करेंगे।

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