राम मंदिर में कथित चोरी के बाद बड़ा प्रशासनिक फेरबदल! तिरुपति मॉडल पर आएगा CEO? संतों और VHP ने जताई कड़ी आपत्ति

Highlights
- चढ़ावे में कथित चोरी के बाद राम मंदिर के वित्तीय और प्रशासनिक ढांचे को बदलने की कवायद तेज
- तिरुपति बालाजी की तर्ज पर रिटायर्ड IAS अधिकारी को मिल सकती है CEO के रूप में कमान
- संतों और वीएचपी (VHP) का तीखा विरोध- “मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं”
अयोध्या। अयोध्या स्थित भव्य राम मंदिर में चढ़ावे में कथित चोरी के सनसनीखेज मामले ने जहाँ करोड़ों रामभक्तों की आस्था को गहरा आघात पहुँचाया है, वहीं अब इस घटना ने एक बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया है।
रामलला के चरणों में आने वाले करोड़ों रुपये के चढ़ावे की सुरक्षा और पारदर्शिता को लेकर अब मंदिर के प्रशासनिक ढांचे में आमूलचूल बदलाव पर मंथन तेज हो गया है। सूत्रों के मुताबिक, राम मंदिर में तिरुपति बालाजी मॉडल की तर्ज पर एक ‘CEO व्यवस्था’ लागू करने पर गंभीर विचार किया जा रहा है, जिसके तहत किसी वरिष्ठ रिटायर्ड आईएएस (IAS) अधिकारी को पूरी कमान सौंपी जा सकती है।
सरकारी नियंत्रण के खिलाफ भड़का संत समाज और VHP
पारदर्शिता के नाम पर शुरू हुई इस प्रशासनिक कवायद का राम मंदिर ट्रस्ट, विश्व हिंदू परिषद (VHP) और संत समाज के भीतर तीखा विरोध शुरू हो गया है। इसे मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में लेने की एक छिपी हुई कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष आलोक कुमार ने इस पूरे घटनाक्रम पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा:
“इस कथित चोरी की घटना का फायदा उठाकर राम मंदिर या अन्य किसी मंदिर को सरकारी नियंत्रण में लेने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। संगठन का स्पष्ट मत है कि मंदिर स्वायत्त रहने चाहिए। हालांकि, जिन्हें प्रशासन का बेहतर अनुभव है, उन्हें व्यवस्था में शामिल किया जा सकता है, लेकिन पूरी टीम को बदलने की कोई आवश्यकता नहीं है।”
दूसरी तरफ, अखिल भारतीय संत समिति के महासचिव जितेंद्रानंद सरस्वती ने भी मंदिर की परंपरागत व्यवस्था में किसी सरकारी या प्रशासनिक सीईओ की नियुक्ति का खुलकर विरोध करना शुरू कर दिया है।
क्या सुलझ पाएगा पारदर्शिता और स्वायत्तता का पेंच?
सूत्रों के अनुसार, सुरक्षा, चढ़ावे का सटीक डिजिटल प्रबंधन और भक्तों की सुविधाओं को अपग्रेड करने के लिए एक कॉर्पोरेट या अर्ध-सरकारी मॉडल (जैसे तिरुपति देवस्थानम) पर विचार किया जा रहा है। लेकिन संत समाज का मानना है कि सनातन परंपराओं और मंदिरों के आंतरिक मामलों में किसी प्रशासनिक अधिकारी का एकाधिकार उचित नहीं होगा।
अब सबकी निगाहें आगामी 7 जुलाई को होने वाली राम मंदिर ट्रस्ट की प्रस्तावित बैठक पर टिकी हैं। इस बैठक में इस बात पर अंतिम फैसला हो सकता है कि:
- क्या मंदिर में पहली बार किसी रिटायर्ड आईएएस को CEO बनाकर भेजा जाएगा?
- क्या वीएचपी, संत समाज और ट्रस्ट किसी ऐसे ‘साझा फॉर्मूले’ पर सहमत हो पाएंगे जिससे पारदर्शिता भी बनी रहे और मंदिर की स्वायत्तता पर भी आंच न आए?



