अमेरिका और रूस के मुकाबले चीन के पास कितने परमाणु हथियार हैं? जानिए तीनों देशों की अंतर

China Nuclear Weapons: चीन अपने परमाणु हथियारों के भंडार और रणनीति को लेकर लंबे समय से गोपनीयता बरतता रहा है। बीजिंग का दावा है कि उसकी परमाणु नीति पूरी तरह आत्मरक्षा पर आधारित है और वह “नो फर्स्ट यूज़” यानी पहले परमाणु हमला नहीं करने की नीति पर कायम है। हालांकि, पश्चिमी देशों के विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में चीन ने अपनी परमाणु क्षमता को तेजी से बढ़ाया और आधुनिक बनाया है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, चीन की परमाणु तैयारियां अब सिर्फ हथियारों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वह मिसाइल सिस्टम, साइलो नेटवर्क और जवाबी हमले की क्षमता को भी मजबूत कर रहा है।

चीन हमेशा से कहता रहा है कि उसके परमाणु हथियार सीमित और राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरतों के हिसाब से हैं। बीजिंग का कहना है कि वह हथियारों की होड़ में शामिल नहीं है और उसका मकसद वैश्विक रणनीतिक संतुलन बनाए रखना है।

चीन अपनी “नो फर्स्ट यूज़” नीति को भी अपनी परमाणु रणनीति का अहम हिस्सा बताता है। इसके तहत चीन का दावा है कि वह किसी देश पर पहले परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं करेगा।

हालांकि, अमेरिका और रूस के साथ त्रिपक्षीय परमाणु हथियार नियंत्रण वार्ता में शामिल होने के प्रस्ताव को चीन लगातार खारिज करता रहा है। चीन का कहना है कि दुनिया के सबसे बड़े परमाणु भंडार अमेरिका और रूस के पास हैं, इसलिए हथियारों में कटौती की जिम्मेदारी भी उन्हीं देशों की है।

पश्चिमी सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, चीन ने हाल के वर्षों में अपने परमाणु हथियारों की संख्या में तेजी से इजाफा किया है।

अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा संगठन SIPRI की रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी 2026 तक चीन के पास करीब 620 परमाणु वॉरहेड होने का अनुमान है। एक साल पहले यह संख्या करीब 600 थी।

रिपोर्ट के अनुसार, 2023 से 2024 के बीच चीन ने अपने परमाणु भंडार में करीब 90 वॉरहेड जोड़े, जबकि 2024 से 2025 के बीच यह संख्या करीब 100 तक बढ़ी। हालांकि, इसके बाद विस्तार की रफ्तार कुछ धीमी हुई है।

अमेरिका के रक्षा विभाग ने भी अनुमान लगाया था कि 2030 तक चीन के परमाणु हथियारों की संख्या 1000 से अधिक हो सकती है।

चीन ने अपनी जमीन आधारित मिसाइल प्रणाली को मजबूत करने के लिए बड़ी संख्या में मिसाइल साइलो बनाए हैं। साइलो जमीन के अंदर बने ऐसे सुरक्षित ठिकाने होते हैं, जहां लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों को रखा और लॉन्च किया जा सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन साइलो का उद्देश्य चीन की “सेकेंड स्ट्राइक” क्षमता को मजबूत करना है। यानी अगर किसी हमले में चीन के परमाणु ठिकानों को नुकसान पहुंचता है, तो भी वह जवाबी परमाणु हमला करने में सक्षम रहे।

रिपोर्टों के अनुसार, चीन ने अपने उत्तरी क्षेत्रों में बड़े साइलो नेटवर्क तैयार किए हैं। इसके अलावा शिनजियांग क्षेत्र में भी लॉन्च पैड, बंकर और कमांड सेंटर जैसे सैन्य ढांचे विकसित किए जा रहे हैं।

चीन ने हाल के वर्षों में अपनी परमाणु क्षमता का सार्वजनिक प्रदर्शन भी बढ़ाया है।

2024 में चीन ने बिना परमाणु हथियार वाली एक अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) का परीक्षण प्रशांत महासागर में किया। यह 1980 के बाद इस तरह का पहला परीक्षण था।

इसके बाद 2025 में आयोजित सैन्य परेड में चीन ने पहली बार अपनी “न्यूक्लियर ट्रायड” दुनिया के सामने प्रदर्शित की।

न्यूक्लियर ट्रायड का मतलब ऐसी परमाणु क्षमता से है, जिसमें किसी देश के पास जमीन, समुद्र और हवा—तीनों माध्यमों से परमाणु हमला करने की क्षमता होती है।

इसमें चीन ने जमीन आधारित मिसाइलों के साथ-साथ पनडुब्बी से लॉन्च होने वाली मिसाइलों और हवाई प्लेटफॉर्म से परमाणु हथियार ले जाने वाली प्रणालियों को दिखाया।

चीन की सैन्य ताकत में लंबी दूरी की मिसाइलों की अहम भूमिका है।सरेड में चीन ने डीएफ-31 सीरीज और डीएफ-5C जैसी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों का प्रदर्शन किया। इन मिसाइलों की मारक क्षमता हजारों किलोमीटर बताई जाती है और ये दुनिया के कई हिस्सों तक पहुंचने में सक्षम मानी जाती हैं।

चीनी मीडिया ने इन हथियारों को देश की रणनीतिक ताकत का अहम हिस्सा बताया है।

हालांकि चीन तेजी से अपनी परमाणु क्षमता बढ़ा रहा है, लेकिन अभी भी अमेरिका और रूस के पास उससे कहीं ज्यादा परमाणु हथियार हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, अगर चीन 2030 तक 1000 से ज्यादा वॉरहेड तक पहुंच भी जाता है, तब भी यह अमेरिका और रूस के मौजूदा परमाणु भंडार का एक हिस्सा ही होगा।

लेकिन चिंता सिर्फ संख्या को लेकर नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि चीन जिस गति से मिसाइल तकनीक, साइलो नेटवर्क और आधुनिक परमाणु प्रणालियों को विकसित कर रहा है, वह वैश्विक सुरक्षा संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

भारत और दुनिया की नजर चीन की रणनीति पर

चीन की बढ़ती परमाणु क्षमता पर अमेरिका समेत कई देशों की नजर है। एशिया में भारत के लिए भी चीन की परमाणु रणनीति महत्वपूर्ण मुद्दा है, क्योंकि दोनों देशों के बीच लंबे समय से सीमा और सुरक्षा संबंधी तनाव रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में परमाणु हथियारों की संख्या के साथ-साथ मिसाइल डिफेंस, अंतरिक्ष तकनीक और अत्याधुनिक हथियार प्रणालियां भी वैश्विक सुरक्षा समीकरणों को प्रभावित करेंगी।

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