नहीं रहीं गायिका सुमन कल्याणपुर

‘आजकल तेरे-मेरे प्यार के चर्चे’ की आवाज खामोश: लता मंगेशकर की ‘ट्विन वॉइस’ कही जाने वाली सुमन कल्याणपुर का 89 वर्ष की उम्र में निधन, संगीत के एक सुनहरे अध्याय का अंत
जुबिली स्पेशल डेस्क
मुंबई। भारतीय संगीत के स्वर्णिम युग (Golden Era) की एक और अनमोल कड़ियां टूट गई हैं। अपनी मखमली और रूहानी आवाज से तीन दशकों तक करोड़ों दिलों पर राज करने वाली दिग्गज गायिका सुमन कल्याणपुर अब हमारे बीच नहीं रहीं। 89 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने आवास पर अंतिम सांस ली। हिंदी, मराठी, गुजराती और असमिया समेत देश की कई भाषाओं में 850 से अधिक अमर गीत देने वाली सुमन जी के जाने से संगीत इंडस्ट्री में शोक की लहर है।
‘लता जी की परछाई’ का ठप्पा, लेकिन अपनी काबिलियत से बनाई पहचान
सुमन कल्याणपुर के करियर का एक दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण पहलू यह रहा कि उनकी आवाज सुर कोकिला लता मंगेशकर से बेहद मिलती-जुलती थी। कई बार रेडियो पर गाना सुनकर लोग भ्रमित हो जाते थे कि यह लता जी हैं या सुमन जी। इंडस्ट्री ने उन्हें ‘दूसरी लता मंगेशकर’ का तमगा भी दिया।
नया नजरिया: हालांकि, लता जी की आवाज से तुलना होना जहां एक तरफ तारीफ की बात थी, वहीं दूसरी तरफ इसने सुमन जी की स्वतंत्र पहचान को थोड़ा सीमित भी किया। इसके बावजूद, उन्होंने अपनी बेमिसाल गायकी, शुद्ध उच्चारण और शास्त्रीय पकड़ के दम पर फिल्म इंडस्ट्री में अपनी एक ऐसी मजबूत और स्वतंत्र जगह बनाई, जिसे कोई धुंधला नहीं कर सका।
रफी साहब के साथ वो ऐतिहासिक जुगलबंदी, जिसने दिए कालजयी गीत
भारतीय सिनेमा का एक दौर ऐसा भी था जब लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी के बीच कुछ मतभेदों के कारण बातचीत बंद थी और दोनों साथ नहीं गा रहे थे। उस दौर में सुमन कल्याणपुर, मोहम्मद रफी के लिए सबसे बड़ा संबल बनीं। दोनों की जोड़ी ने बैक-टू-बैक ऐसे सुपरहिट रोमांटिक गाने दिए जो आज भी सदाबहार हैं…
- ‘आजकल तेरे-मेरे प्यार के चर्चे हर ज़ुबान पर’ (ब्रह्मचारी)
- ‘ना-ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे’ (जब जब फूल खिले)
- ‘तुझे देखा तुझे चाहा तुझे पूजा मैंने’
इसके अलावा ‘जिंदगी इम्तेहान लेती है’ और रक्षाबंधन का अमर गीत ‘बहना ने भाई की कलाई से प्यार बांधा है’ जैसी उनकी आवाज आज भी हर घर में गूंजती है।
ऑल इंडिया रेडियो से पद्म भूषण तक का सफर
1952 में ऑल इंडिया रेडियो (AIR) से शुरू हुआ उनका सफर कामयाबी की बुलंदियों तक पहुंचा। उन्होंने 1953 में मराठी फिल्म ‘शुक्राची चांदनी’ और हिंदी में फिल्म ‘दरवाजा’ से कदम रखा था। कला के क्षेत्र में उनके इसी अतुलनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से नवाजा था। इसके अलावा उन्हें गदिमा प्रतिष्ठान का गदिमा पुरस्कार भी मिला था।
सुमन कल्याणपुर का जाना सिर्फ एक गायिका का जाना नहीं है, बल्कि उस दौर का अंत है जब गानों में शब्दों की मर्यादा, सुरों की शुद्धता और आवाज का ठहराव सबसे अहम हुआ करता था। उनके गाए गीत हमेशा भारतीय संगीत प्रेमियों के दिलों में जिंदा रहेंगे।



