Trending

पंजाब में आपरेशन लोटस : जनादेश नहीं तो षड्यंत्र सही  

पंजाब की राजनीतिक गलियारों में इन दिनों आये भूचाल के बाद यह कथन एक बार फिर सिद्ध हो रहा है  । आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रमुख नेता और राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने न केवल अपनी पार्टी से इस्तीफा दे दिया, बल्कि भाजपा का दामन थाम लिया है। उनके साथ संदीप  पाठक, अशोक मित्तल और हर्भजन सिंह जैसे अन्य नेता भी भाजपा में शामिल हो चुके हैं। यह महज एक व्यक्तिगत विद्रोह नहीं, बल्कि भाजपा की लंबे समय से चली आ रही रणनीति का हिस्सा है – विपक्षी दलों को अंदर से कमजोर करना, विधायकों की खरीद-फरोख्त कर सत्ता हथियाना। पंजाब विधानसभा में AAP के पास अभी भी 91 विधायकों का मजबूत बहुमत है, जहां बहुमत का आंकड़ा 59 होता  है, लेकिन खबरें हैं कि राघव चड्ढा के निशाने पर 63 AAP विधायक हैं। यह संख्या बड़ी है, क्योंकि यदि 32 विधायक भी पाला बदल लें, तो सरकार गिर सकती है।

भाजपा को अच्छी तरह पता है कि पंजाब की जनता ने 2022 में AAP को 92 सीटें देकर स्पष्ट जनादेश दिया था, और सीधे चुनाव लड़कर भाजपा को कभी पूर्ण बहुमत नहीं मिला। इसलिए, भाजपा अब अपने पुराने रणनीति – पार्टी तोड़ो, सरकार बनाओ की रह पर है ।

पंजाब विधानसभा का वर्तमान गणित फिलहाल स्पष्ट रूप से AAP के पक्ष में है। 117 सीटों वाली इस सभा में AAP के 91, कांग्रेस के 14, शिरोमणि अकाली दल (SAD) के 3, भाजपा के 1 और अन्य स्वतंत्रों के पास बाकी सीटें हैं। कुछ सीटें उपचुनावों या अन्य कारणों से खाली भी हैं। लेकिन भाजपा की नजर AAP विधायकों पर है। राघव चड्ढा का पंजाब से गहरा जुड़ाव रहा है – वे राज्यसभा सदस्य के रूप में यहां की राजनीति को अच्छी तरह समझते हैं। भाजपा ने जानबूझकर उन्हें चुना, ताकि वे AAP के असंतुष्ट विधायकों को लुभा सकें।

दूसरी तरफ भगवंत मान सरकार पर किसान आंदोलन के बाद से कई मोर्चों पर दबाव है – बेरोजगारी, ड्रग्स समस्या, पानी विवाद और केंद्र से टकराव। इन मुद्दों का फायदा उठाकर भाजपा विधायकों को ‘विकास’ और ‘केंद्र की योजनाओं’ का प्रलोभन दे रही है।

यह वही पुरानी चाल है जो गोवा, मणिपुर और मध्य प्रदेश में चली, जहां जनादेश का धता बता कर सत्ता हथियाई गई। लोकतंत्र में जनता का फैसला सर्वोपरि होता है, लेकिन मोदी शाह की भाजपा की राजनीति में ‘ऑपरेशन लोटस’ सर्वोपरि है।

गहराई से विश्लेषण करें तो भाजपा का यह आपरेशन  पंजाब की 2027 विधानसभा चुनावों से ठीक एक साल पहले क्यों हो रहा है ? कारण साफ है – भाजपा का पंजाब में पारंपरिक वोटबैंक कमजोर है। हिंदू वोटों के एक हिस्से पर निर्भर यह पार्टी पंजाबी सिख बहुल राज्य में कभी मजबूत नहीं हुई। 2022 में उसे सिर्फ 2% वोट मिले थे। सीधे जनादेश से जीत असंभव लगती है, इसलिए ‘बायपास ‘ रणनीति अपनाई जा रही है । चड्ढा जैसे युवा, पढ़े-लिखे चेहरे को आगे लाकर वे AAP के युवा वोटरों को लुभा सकते हैं।

भगवंत मान ने इसे ‘डिफेक्शन प्लॉट’ कहा है, जो सही भी लगता है। AAP के 63 विधायकों के संपर्क में होने की अफवाहें मीडिया में हैं, और यदि यह सच साबित हुई, तो यह महाभियोग का आधार बनेगा। लेकिन भाजपा के पास संसाधन हैं – केंद्रीय एजेंसियों का दबाव, आर्थिक प्रलोभन और दिल्ली से निर्देश। अरविंद केजरीवाल को दिल्ली में ही ED-CBI का सामना करना पड़ रहा है; पंजाब में वैसा ही दबाव बन सकता है।

इस षड्यंत्र का ऐतिहासिक संदर्भ देखें तो भाजपा की यह राजनीति नई नहीं है । 2019 में कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन को तोड़कर सत्ता ली। मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार ज्योतिरादित्य सिंधिया के 22 विधायकों के साथ गिरी। गोवा में भाजपा ने अल्पमत में आकर फिर बहुमत जुटाया। पंजाब में भी यही फॉर्मूला – पहले छोटे स्तर पर तोड़ो, फिर सरकार बनाओ। लेकिन पंजाब अलग है। यहां सिख समुदाय की मजबूत पहचान है, जो दल-बदल को धोखा मानता है। यदि विधायक भाजपा में गए, तो जनता का गुस्सा उमड़ेगा। कांग्रेस, हालाकि पहले से कमजोर है, फिर भी वह इस परिस्थिति  का लाभ ले सकती है। नवजोत सिंह सिद्धू जैसे नेता फिर सक्रिय हो सकते हैं। शिरोमणि अकाली दल  भी फिलहाल अलग-थलग पड़ी है।

कुल मिलाकर, भाजपा का लक्ष्य AAP को 50 सीटों के नीचे लाना है, ताकि गठबंधन या अल्पमत सरकार संभव हो। लेकिन गणितीय रूप से, 91 से 59 तक गिरावट के लिए 32 विधायकों का पलायन जरूरी है । क्या इतने विधायक इतने बेईमान हैं? यह सवाल पंजाब की जनता के सामने है।

गंभीर नजरिए से देखें तो इस तरह के षड्यंत्र भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा है। संविधान की  दसवीं अनुसूची में दल-बदल विरोधी कानून है, लेकिन ‘मर्जर’ के बहाने इसे तोड़ा जाता है। चड्ढा ने AAP के 7 राज्यसभा सांसदों को ‘मर्ज’ कर लिया, जो दल-बदल नहीं माना जाएगा। भाजपा इसी खामी का फायदा उठाती है। पंजाब में यदि सरकार गिरी, तो राष्ट्रपति शासन लग सकता है, जो केंद्र (भाजपा) के हाथ में सत्ता दे देगा।

कुल मिला कर पंजाब की  स्थिति पर अगले कुछ दिनों तक निगाह बनाये रखनी होगी.  पंजाब विश्वविद्यालय  में राजनीति विज्ञान विभाग के प्रमुख प्रो. अशविनी कुमार महाजन कहते हैं –  “भाजपा का यह षड्यंत्रपूर्ण खेल पंजाब के लोकतंत्र के मूलभूत ताने-बाने को चुनौती दे रहा है, जहां जनादेश की जगह ‘ऑपरेशन लोटस’ की साजिशें सत्ता का आधार बन रही हैं। यदि 63 AAP विधायकों का पलायन साकार हुआ, तो न केवल भगवंत मान सरकार खतरे में पड़ जाएगी, बल्कि पंजाब की राजनीति में स्थायी अविश्वास की संस्कृति जन्म लेगी।”

Related Articles

Back to top button