नेपाल की नई सरकार: पॉपुलिज्म की चकाचौंध या संस्थागत पुनर्निर्माण?

सम्पादकीय

डा. उत्कर्ष सिन्हा
बालेंद्र शाह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की सरकार ने मार्च 2026 में सत्ता संभालते ही 100-बिंदु शासन सुधार एजेंडे के साथ तूफान मचा दिया। पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और अन्य पूर्व मंत्रियों की गिरफ्तारी, छात्र संगठनों (छात्र संघ) और ट्रेड यूनियनों का विखंडन, और शिक्षा क्षेत्र में बड़े बदलाव—ये सब कदम मात्र 60-90 दिनों के अल्टीमेटम के साथ लिए गए। जनता की नजर में ये “एक्शन” दिखते हैं, लेकिन सवाल उठता है: क्या ये वास्तविक सुधार हैं या पॉपुलिस्ट अपील का हिस्सा, जो पुरानी संस्थाओं को तोड़कर नया निर्माण करने का दावा करते हुए लोकतंत्र की नींव हिला रहे हैं?
नई सरकार का उदय जेन-जेड आंदोलन की देन है। सितंबर 2025 के प्रदर्शनों में हुई मौतों और राजनीतिक अस्थिरता के बाद सत्ता में आए युवा प्रधानमंत्री शाह ने तुरंत “खाता साफ” करने का संकेत दिया। पूर्व नेताओं की गिरफ्तारियां जवाबदेही का प्रतीक लगती हैं, लेकिन ये प्रतीकात्मक भी हैं। क्या ये पुराने सिस्टम को साफ करने का तरीका है या विपक्ष को कुचलने का? इसी तरह, सरकारी निकायों में दलीय ट्रेड यूनियनों का खात्मा और शिक्षकों-कर्मचारियों पर राजनीतिक संबद्धता का प्रतिबंध “प्रोफेशनलिज्म” का नाम लेकर लिया गया। मकसद है—राजनीतिक हस्तक्षेप खत्म कर सेवा वितरण सुधारना। लेकिन ट्रेड यूनियन मजदूरों के अधिकारों की रक्षा का माध्यम भी हैं। इन्हें अचानक खत्म करने से क्या कर्मचारियों की आवाज दब जाएगी? क्या यह श्रम अधिकारों का हनन नहीं?
सबसे विवादास्पद फैसला शिक्षा क्षेत्र का है। स्कूलों और विश्वविद्यालयों से राजनीतिक छात्र संगठनों को 60 दिनों में हटाना और उनकी जगह “स्टूडेंट काउंसिल” या “वॉयस ऑफ स्टूडेंट्स” जैसी गैर-दलीय संरचना खड़ी करना। सरकार का तर्क साफ है—कैंपस पर हड़तालें, हिंसा और राजनीतिक दखल से शिक्षा की गुणवत्ता गिर रही है। क्लास 5 तक आंतरिक परीक्षाएं खत्म करना, प्राइवेट स्कूलों में 10 प्रतिशत छात्रवृत्ति अनिवार्य करना जैसे कदम भी इसी दिशा में हैं।
ये फैसले शुरुआत में सकारात्मक लग सकते हैं, खासकर तब जब नेपाल की शिक्षा विदेशी सहायता पर निर्भर रही हो और छात्र राजनीति कई बार अराजकता का सबब बनी हो। लेकिन दूरगामी असर क्या है ? छात्र संघों ने दुनिया भर के लोकतांत्रिक आंदोलनों में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। नेपाल की क्रांति के बाद भी छात्र संगठनो ने राजनीती को बहुत कुछ दिया है । इन्हें बिना व्यापक संवाद के खत्म करने से छात्रों की असली आवाज दब सकती है। “स्टूडेंट काउंसिल” जैसी नई संरचना कितनी स्वतंत्र और प्रभावी होगी, जब सत्ता स्वयं उसे आकार दे रही हो? यह संस्थागत सुधार है या पुरानी संस्थाओं को तोड़कर सत्ता के अनुकूल नई संरचना थोपना?
सरकार के कामो में पॉपुलिज्म की छाप साफ दिखती है। नई सरकार युवा वोटों पर सवार होकर आई, जहां पुरानी पार्टियों का “एंटी-एस्टेब्लिशमेंट” नारा चल रहा था। गिरफ्तारियां, यूनियन-बैन और “पॉलिटिक्स-फ्री” कैंपस—ये सब छोटे-छोटे वादों की बजाय बड़े, दिखावटी कदम हैं जो जनता को “परिवर्तन” का एहसास कराते हैं। लेकिन पॉपुलिज्म का खतरा यहीं है—यह अल्पकालिक लोकप्रियता पर टिका होता है, लंबी संस्थागत मजबूती पर नहीं। नेपाल की राजनीति पहले ही अस्थिर है। यदि ट्रेड यूनियन और छात्र संगठन जैसे लोकतांत्रिक वाल्व बंद कर दिए गए, तो असंतोष कहां जाएगा?
क्या यह “व्यवस्था सुधार” है या संस्थागत ढांचे को गिराकर सत्ता के इर्द-गिर्द नया ढांचा खड़ा करना? संवैधानिक अधिकार—संगठन की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी—पर सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह लोकतंत्र को जोखिम में डाल सकता है।
फिर भी, कुछ हद तक कहा जा सकता है कि नेपाल को बदलाव की जरूरत थी। दलीय हस्तक्षेप ने शिक्षा, प्रशासन और श्रम क्षेत्र को जकड़ रखा था। अगर नई सरकार इन सुधारों को संवाद, कानूनी प्रक्रिया और विकल्पों के साथ लागू करती, तो यह सकारात्मक दिशा हो सकती थी। लेकिन 60-90 दिन के अल्टीमेटम और बिना व्यापक बहस के कदम पॉपुलिस्ट जल्दबाजी लगते हैं।
दूरगामी असर यह होगा कि यदि नई संरचनाएं कमजोर साबित हुईं, तो शिक्षा की गुणवत्ता सुधरने की बजाय छात्र असंतोष बढ़ेगा। ट्रेड यूनियन खत्म होने से कर्मचारी अधिकार कमजोर होंगे। और पुरानी पार्टियों की गिरफ्तारियां अगर सही हैं तो जवाबदेही, लेकिन अगर दिखावा तो प्रतिशोध।
समय बताएगा कि बालेंद्र शाह की सरकार नेपाल को सकारात्मक दिशा दे पाती है या सिर्फ पुरानी संस्थाओं को गिराकर नया पॉपुलिस्ट मॉडल खड़ा कर रही है। अभी तो चिंता यही है कि सुधार की आड़ में संस्थागत विखंडन न हो जाए। लोकतंत्र में बदलाव जरूरी है, लेकिन वह तोड़-फोड़ से नहीं, संवाद और मजबूती से आता है। नई सरकार को याद रखना चाहिए—जनता ने उन्हें “परिवर्तन” के लिए चुना है, न कि लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए।



