प्रवाहित शवों पर लिखी थी कविता लेकिन किसने बताया ‘साहित्यिक नक्सल’

जुबिली स्पेशल डेस्क
कोरोना की दूसरी लहर भले ही कमजोर पड़ती नजर आ रही है लेकिन इस दौरान लोगों की मौतों का सिलसिला थमा नहीं है।अप्रैल-मई के महीने में कोरोना की दूसरी लहर के बीच हर दिन खबरे-तस्वीरें लोगों को परेशान करती नजर आई है।
इतना ही नहीं लोग ऑक्सीजन व बेड की कमी की वजह से दम तोड़ते नजर आये। आलम तो यह रहा कि श्मशान घाट व कब्रिस्तान में शवों का अंतिम संस्कार करने के लिए जगह तक कम पड़ गई।
इस दौरान सोशल मीडिया पर नदियों में शवों का प्रवाह करने की भयानक तस्वीरे भी चर्चा का विषय बनी रही। गंगा में जिस तरह से कई शवों को प्रवाहित किया जा रहा था उसे देखकर हर कोई दहल गया।
गंगा नदी में शवों को प्रवाहित करने की घटना पर गुजरात में कवियित्री पारुल खाखर एक कविता भी लिखी।

इस कविता को लेकर उस समय कवियित्री पारुल खाखर सुर्खियों में आ गई थी लेकिन राज्य सरकार की गुजरात साहित्य अकादमी को यह कविता रास नहीं आई और उसने जमकर इसकी आलोचना की है।
इसके साथ ही राज्य सरकार की गुजरात साहित्य अकादमी ने इस साहित्यिक नक्सल बता डाला है।
उसने यह बात अपने संपादकीय में लिखकर इस कविता की आलोचना की है और निशाने साधते हुए कहा है कि ऐसी कविताओं के जरिए अराजकता फैलाने का प्रयास हो रहा है।
हालांकि उसने अपने संपादकीय उस घटना का कही भी जिक्र नहीं किया है लेकिन उसने इशरों में बहुत कुछ कह डाला है। लेख में बताया गया है कि जो
कविता लिखी गई वो कही से कविता नहीं है। इसमें केवल अराजकता फैलाने का काम किया है। उसने साफ कर दिया है ये किसी भी एंगल से कविता नहीं है। भारतीय प्रजा, लोकतंत्र और समाज पर लांछन लगाने का प्रयास किया गया है।
कुल मिलाकर पारुल खाखर की एक छोटी-सी कविता से गुजरात में काफी बवाल मचा डाला है और कुछ लोगों में काफी गुस्सा है।



