ATM मशीनों को ढूंढ़ना क्‍यों हो रहा है मुश्किल

न्‍यूज डेस्‍क

नोटबंदी के बाद से देश में डिजिटल ट्रांजेक्शन और ATM  से पैसे को लेने देने का चलन बढ़ा है। लेकिन ये भी सच्‍चाई है कि नोटबंदी के तीन साल बाद भी कैश का सर्कुलेशन पहले से ज्यादा बढ़ चुका है।

साथ ही ATM मशीन की संख्या कम होती जा रही है। सख्त नियमों के कारण देश में ATM चलाना ज्यादा महंगा पड़ रहा है। यही वजह है कि सैकड़ों ATM के बंद होने पर खतरा मंडरा रहा है। ग्राहकों के लिए एटीएम मशीनों को ढूंढ़ना मुश्किल होता जा रहा है।

जानकारों की माने तो अगर कुछ दिनों तक ऐसा ही होता रहा तो इसका असर पूरे देश पर होगा और लोगों को कैश निकालने में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है और एटीएम की घटती संख्या आबादी के एक बड़े हिस्से को प्रभावित करेगी।

आरबीआई की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में ATMs से ट्रांजेक्शन में वृद्धि के बावजूद पिछले दो सालों में मशीनों की संख्या घटी है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक, ब्रिक्स देशों में भारत ऐसा देश है जहां प्रति 100,000 लोगों पर कुछ ही एटीएम हैं।

सूत्रों की माने तो एटीएम मशीन की ये किल्‍लत जारी रह सकती है, पिछले साल केंद्रीय बैंक द्वारा अनिवार्य किए गए सॉफ्टवेयर और उपकरणों के अपग्रेडेशन की लागत को सिक्योर करने के लिए बैंक और एटीएम ऑपरेटर संघर्ष कर रहे हैं।

जानकार बताते हैं कि ATM मशीन कम होने की वजह उसके मेंटिनेंस की लागत है।  जैसे-जैसे सिक्योरिटी कॉस्ट बढ़ती जा रही है, एटीएम ऑपरेटरों को घाटा उठाना पड़ रहा है। इसके अलावा एटीएम के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर अपग्रेड को लेकर जो नए नियम आए हैं उनके चलते पुराने ATM को चलाना मुश्किल हो गया है।

इसके अलावा कैश मैनेजमेंट स्टैंडर्ड और कैश लोडिंग को लेकर भी नियम जारी हुए हैं। इससे एटीएम कंपनियां, ब्राउन लेबल और व्हाइट लेबल एटीएम प्रदाता पहले ही नोटबंदी के दौरान हुए घाटे से जूझ रहे हैं।

साथ ही राजस्व के लिए वे जिस शुल्क पर भरोसा करते हैं वह कम रहता है और उद्योग समिति की मंजूरी के बिना यह नहीं बढ़ सकता। यही कारण है कि पिछले दो वित्तीय वर्षों में भारत में एटीएम मशीनों की संख्या में गिरावट आई है।

आपको बता दें कि कई भारतीयों ने खाते तब खोले, जब प्रधानमंत्री ने नवंबर 2016 में 86% बैंक नोटों को अवैध बना दिया। इसने लोगों के खातों में कल्याणकारी लाभों के डायरेक्ट ट्रांसफर को बढ़ावा दिया, जिससे ATMs पर निर्भरता बढ़ गई।

एटीएम की घटती संख्या के पीछे सरकारी बैंकों द्वारा ब्रांचों को कम करना भी बड़ी वजह है। 2018 के शुरुआती 6 महीनों में पांच असोसिएट बैंकों और एक लोकल बैंक को खरीदने के बाद स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने अपनी 1000 ब्रांच बंद कर दीं। बैंक के हर दो एटीएम में से एक बैंक ब्रांच में इंस्टॉल होते हैं।

डिजिटलाइजेशन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद

एटीएम की संख्या घटने से मोबाइल बैंकिंग को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। पिछले पांच सालों में ही मोबाइल बैंकिंग ट्रांजैक्शन 65 फीसदी बढ़ा है। देश की युवा आबादी ऑनलाइन बैंकिंग और मोबाइल ऐप की तरफ शिफ्ट हो रही है।

नई तकनीकों के हिसाब से एटीम में बदलाव के लिए बैंकों को ज्यादा खर्च करना पड़ेगा। इन मशीनों के कैश लॉजिस्टिक और कैसेट स्वैम मेथड में बदलाव करने में ही 3,500 करोड़ का खर्च आ सकता है। अगर बैंक इस खर्च का बोझ नहीं उठाते हैं तो एटीएम सर्विस देने वाली कंपनियां इन्हें बंद करने का फैसला कर सकती हैं।

 

 

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