Thursday - 9 July 2020 - 12:33 PM

‘राइट टू हेल्थ’ पर मध्यप्रदेश का क्या होगा स्टैण्ड

मध्य प्रदेश ब्यूरो

नीति आयोग ने देश में योग्य चिकित्सकों की कमी को दूर करने के लिए एक सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल प्रस्तुत किया है, जिसके अंतर्गत पीपीपी के माध्यम से कार्यात्मक जिला अस्पतालों के साथ नए या मौजूदा निजी मेडिकल कॉलेजों को संचालित किये जायेंगे। नीति आयोग ने प्रस्तुत मॉडल के संबंध में राज्यों से सुझाव मांगे हैं। हालांकि इस प्रस्ताव को मध्यप्रदेश के पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री ने विरोध करते हुए सिरे से खारिज कर दिया है। जबकि मध्यप्रदेश सरकार ने अभी इस पर कोई स्टैण्ड नहीं लिया है। यहां तक कि वह इस प्रस्ताव पर बात तक करने को राजी नहीं हुए।

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प्रस्ताव का मुख्य आधार डॉक्टरों की भारी कमी बताई गई है, जबकि मध्यप्रदेश सरकार राइट टू हेल्थ की बात कर रही है। प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री तुलसी सिलावट का कहना है, कि वे डॉक्टरों की कमी को कम करने की दिशा में कार्य कर रहे हैं। खाली पदों को भरने की लगातार कोशिश की जा रही है। जबकि प्रस्ताव में यह भी कहा गया है, कि इस अंतर को केवल केंद्रीय और राज्य के वित्तपोषण द्वारा पूरा नहीं किया जा सकता है। इस बात पर गंभीर संदेह है कि क्या ऐसे संस्थानों को स्थापित करने के लिए कॉरपोरेट एजेंसियों को बैंक ऋण देंगे या गैर-निष्पादित आस्तियों में जोड़ देंगे। यह प्रस्ताव गुजरात और कर्नाटक में पीपीपी के अनुभव पर आधारित है, लेकिन लोगों को कर्नाटक में ऐसे किसी अनुभव की जानकारी नहीं हैं जो कि इस पर आधारित हो सकता है।

रायचूर में एक असफल प्रयास किया गया था, जिस पर सरकार के आकलन, रिपोर्ट्स उपलब्ध हैं। दूसरी ओर, यह प्रस्ताव गुजरात के भुज में ‘गुजरात अडानी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज’ मॉडल के समान है। इस मॉडल में भारी सरकारी निवेश था और अडानी द्वारा भी 100 करोड़ रुपये का निवेश में लाया गया था लेकिन 10 साल बाद भी इसमें संचयी घाटा बताया गया और यह तब, जबकि प्रति छात्र 3 लाख रुपये और एनआरआई छात्र से 8 लाख रुपये लिए गए।

इस प्रस्ताव के अनुसार जिला अस्पताल की जमीन और सभी संपत्तियां साठ साल के लिए रियायतकर्ता को सौंप दी जाएगी। यह अवधि और अधिक हो सकती है। भुज मॉडल में यह अवधि 99 वर्षों के लिए है। 60 साल के अंत में विस्तार का प्रावधान है। मेडिकल कॉलेज द्वारा 60 साल के बाद अस्पताल और सम्पत्ति सरकार को लौटाई जाएगी यह स्पष्ट नहीं हालाँकि स्पष्ट रूप से इरादा यह है कि मेडिकल कॉलेज भूमि और संपत्ति को हमेशा के लिए रख सकता है। इसके अलावा अगर वह चाहे तो अपना मेडिकल कॉलेज अस्पताल भी बना सकता है और वह भी रख सकता है।

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सरकारी डॉक्टरों को जिला अस्पताल और साथ ही कुछ शिक्षण कार्यों में सेवा देने के लिए निजी प्रबंधन में प्रतिनियुक्ति दी जा सकती है। लेकिन, एक खंड के अनुसार, यदि वे मेडिकल कॉलेज में इसके नियमित कर्मचारी के रूप में शामिल होते हैं, तो उन्हें सरकारी सेवाओं से कार्य मुक्त किया जा सकता है।

इसके अलावा यदि कर्मचारी प्रतिनियुक्ति पर हैं, तो सरकार को वेतन का भुगतान करना होगा- लेकिन अगर निजी मेडिकल कॉलेज को लिया जाता है तो वह इसका भुगतान करेगा। जो सरकार को अपने कर्मचारियों को जाने देने के लिए प्रोत्साहित करता है।

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प्रस्ताव का एक भाग, जिस पर सबसे ज्यादा चिंता जताई जा रही है वह यह है कि विवादों के मामले में, इसे अंतर्राष्ट्रीय पंचाट प्रक्रियाओं (43.3) की तर्ज पर देखा जायेगा। जबकि ऐसे समझौतों में सामान्य प्रावधान यह बताना होता है कि कौन सा उच्च न्यायालय मामले को देखेगा।

मुख्य कारण यह पीपीपी अन्य सभी से अलग है, क्योंकि यह सार्वजनिक अस्पताल और मेडिकल कॉलेज को कॉर्पोरेट गतिविधि के रूप में स्थापित करता है, जो राजस्व उत्पादन आधार आंकलन किया जायेगा। समझौते में कहा गया है कि अनुबंध से सम्मानित ‘रियायतकर्ता’ या एजेंसी को इक्विटी समर्थन के रूप में अनुदान दिया जाएगा। यह केवल उन कंपनियों के साथ काम करेगा जो कॉर्पोरेट चरित्र के हैं, अंशधारक हैं, जो इक्विटी बढ़ाते हैं, और जिनके पास निदेशक मंडल है।

सबसे अधिक हानिकारक बिन्दुओं में से एक यह है, कि मरीजों को “निः शुल्क मरीजों” और अन्य सभी में वर्गीकृत किया जाएगा। एक निशुल्क रोगी होने के लिए जिला स्वास्थ्य प्राधिकरण से एक विशिष्ट प्राधिकरण प्रमाणपत्र की आवश्यकता होगी। ऐसे रोगियों को निः शुल्क परामर्श, निशुल्क दवाएं और डायग्नोस्टिक्स प्रदान किए जा सकते हैं, लेकिन यहां उनसे 10 रुपये का पंजीकरण शुल्क भी लिया जायेगा । अन्य सभी रोगियों को ‘बाजार प्रतिस्पर्धी दरों’ पर ईलाज उपलब्ध कराया जाएगा।

सभी रोगी बिस्तर को ‘विनियमित बिस्तर’ और ‘मार्केटबिस्तर’ में वर्गीकृत किया गया है। बाजार आधारित बिस्तर प्रतिस्पर्धी दरों पर होंगे। विनियमित बिस्तर उन रोगियों के लिए निहित हैं जो अन्य बीमा द्वारा कवर किए गए हैं। हालांकि यह निः शुल्क देखभाल है, यह किसी भी तरह से क्रॉस-सब्सिडी पर कोई प्रयास नहीं करता है। आगे इस बात पर स्पष्ट जोर दिया गया है कि ये मुफ्त बेड शिक्षण प्रशिक्षण उद्देश्यों के लिए आवश्यक रोगियों को भर्ती करने की अनुमति देंगे।

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ड्राफ्ट दस्तावेज के आर्टिकल 23.2.5 के अनुसार मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं पहले आओ पहले पाओ के सिद्धांत पर दी जाएगी जिससे की जरूरतमंद मरीज ईलाज से वंचित रहेगा। यह व्यवस्था इसी दस्तावेज के आर्टिकल 23.2.2 का ही उल्लंघन है जिसमे कहा गया है की किसी भी मरीज से किसी भी प्रकार का भेदभाव नही किया जायेगा।

ड्राफ्ट दस्तावेज के आर्टिकल 23.5 के अनुसार मुफ्त दवाएं केवल मुफ्त ईलाज पाने वाले मरीजों को ही मिलेगी बाकी सभी मरीजों के लिए राज्य सरकार की योजना के अनुसार व्यवस्था करने का मात्र सुझाव है, यह प्रावधान भी वर्तमान अधिकारों एवं जनता की मिल रही स्वास्थ्य सेवाओं में कटौती करेगा ।

गौरतलब है, कि मध्यप्रदेश की पिछली सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं को निजी हाथों में सौंपने की भरपूर कोशिश की थी। पहले शिवराज सरकार ने इंदौर मेडिकल कॉलेज को नॉलेज पार्टनरशिप के नाम पर इंदौर स्थित निजी संस्थान अरविंदों मेडिकल कॉलेज को देने की कोशिश की, लेकिन स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं और डॉक्टरों के विरोध के चलते उन्हें पीछे हटना पड़ा। इसके बाद पूर्व सरकार ने 27 जिलों के जिला अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को निजी हाथों में सौंपने की कोशिश की। इसे भी विरोध के चलते रोकना पड़ा।

शिवराज सरकार ने अपने कार्यकाल में अलीराजपुर जिला अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जोबट को गुजरात की संस्था दीपक ग्रुप ऑफ फाउन्डेशन को दे दिया था, साथ ही उनका इरादा सारे आदिवासी इलाके के अस्पतालों को निजी हाथों में सौंपने का था। जिसे जनहित याचिका दायर कर रोका गया था। अब जब सरकार स्वयं ही राइट टू हेल्थ के तहत प्रदेश की अवाम को निःशुल्क स्वास्थ्य उपलबध कराने की बात कर रही है, ऐसे वक्त में बाकी सरकारी सेवाओं की तरह स्वास्थ्य सेवाओं को भी निजी संस्थानों को सौंपने की नीति आयोग के प्रस्ताव पर सरकार क्या स्टैण्ड लेती है, यह देखना दिलचस्प होगा।

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