पश्चिम बंगाल: विधानसभा में विद्रोह के बाद TMC में सबसे बड़ा संकट, यूसुफ पठान का इस्तीफा देने से इनकार

पश्चिम बंगाल की सत्ता गंवाने के बाद अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपने 28 साल के इतिहास के सबसे गंभीर राजनीतिक दौर से गुजर रही है। विधानसभा में पार्टी के 58 विधायकों के खुले विद्रोह ने ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इस बीच, चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी को संसद (लोकसभा) भेजने की कोशिशों को भी बड़ा झटका लगा है।

सूत्रों के मुताबिक, ममता बनर्जी को संसद पहुंचाने के लिए टीएमसी नेतृत्व ने एक खास रणनीति बनाई थी। इसके तहत पूर्व क्रिकेटर सौरव गांगुली के जरिए बहरामपुर से लोकसभा सांसद यूसुफ पठान तक एक संदेश भिजवाया गया था। पार्टी चाहती थी कि यूसुफ पठान अपनी सीट से इस्तीफा दे दें, ताकि वहां होने वाले उपचुनाव में ममता बनर्जी चुनाव लड़कर सांसद बन सकें। हालांकि, यूसुफ पठान ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया और इस्तीफा देने से मना कर दिया।

बहरामपुर से झटका लगने के बाद, अब टीएमसी नेतृत्व की नजरें बसीरहाट लोकसभा सीट पर टिकी हैं। पार्टी के सांसद हाजी नूरुल के निधन के बाद यह सीट फिलहाल खाली है। टीएमसी अब इसी सीट पर होने वाले उपचुनाव में ममता बनर्जी को उम्मीदवार बनाने की तैयारी में है।

बदल रहे हैं समीकरण: पिछले 28 वर्षों से टीएमसी का एक ही सिद्धांत रहा है पार्टी यानी ममता बनर्जी और ममता बनर्जी यानी पार्टी’। लेकिन इतिहास में पहली बार यह समीकरण इतनी गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है।

टीएमसी के भीतर मचा यह घमासान सिर्फ सत्ता खोने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नेतृत्व की एकछत्र सत्ता पर भी बड़ा सवालिया निशान है। दिलचस्प बात यह है कि असंतुष्ट विधायक अभी भी ममता बनर्जी के नेतृत्व को स्वीकार कर रहे हैं, लेकिन ममता के भतीजे और उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जाने वाले अभिषेक बनर्जी के खिलाफ पार्टी में खुला विरोध शुरू हो गया है।

पार्टी आलाकमान का दावा है कि फिलहाल लोकसभा या राज्यसभा सांसदों के बीच किसी बड़े विद्रोह के संकेत नहीं हैं। हालांकि, नेतृत्व के भीतर यह डर लगातार गहरा रहा है कि विधानसभा से शुरू हुआ यह संकट कहीं दोनों सदनों के सांसदों तक न पहुंच जाए।

वर्तमान में संसद के दोनों सदनों में टीएमसी की स्थिति इस प्रकार है..

सदनसांसदों की संख्या
लोकसभा28
राज्यसभा13

यदि पार्टी के भीतर यह गुटबाजी और बढ़ती है, तो विपक्षी राजनीति में टीएमसी का प्रभाव बेहद कमजोर हो जाएगा। सबसे बड़ा संकट तब खड़ा होगा जब यह अंदरूनी लड़ाई चुनाव आयोग के दरवाजे तक पहुंचेगी। ऐसे में सवाल उठेगा कि पार्टी के चुनाव चिन्ह ‘घास-फूल’ पर किसका अधिकार होगा? यह प्रतीक सिर्फ एक चुनाव चिन्ह नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी के उस ऐतिहासिक आंदोलन की पहचान है जिसने वामपंथियों के 34 साल के किले को ढहा दिया था।

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