ट्रंप का ‘मिशन ईरान’ या दूसरा वियतनाम? पहाड़ों के नीचे दबे यूरेनियम पर छिड़ी महाजंग

जुबिली स्पेशल डेस्क
मध्य-पूर्व (मिडिल ईस्ट) की जंग अब एक ऐसे खतरनाक मुहाने पर आ खड़ी हुई है, जहां मिसाइलों और बारूद से ज्यादा घातक ‘न्यूक्लियर जासूसी’ का खेल शुरू हो चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जिस सैन्य कार्रवाई को महज 4 से 6 हफ्ते का ‘क्विक स्ट्राइक ऑपरेशन’ समझ रहे थे, वह अब अमेरिका के लिए दूसरा ‘वियतनाम युद्ध’ साबित होता जा रहा है।
ईरान के पहाड़ों की सैकड़ों फीट गहराई में दबे उस अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम (HEU) को निकालने के लिए, जिसे अमेरिका के सबसे विनाशकारी बम भी नष्ट नहीं कर पाए, ट्रंप ने दुनिया के 100 सबसे बड़े परमाणु वैज्ञानिकों की एक सीक्रेट टीम खड़ी कर दी है। लेकिन तेहरान ने अमेरिका के इस चक्रव्यूह के आगे 24 बिलियन डॉलर (करीब 2 लाख करोड़ रुपये) का ऐसा वित्तीय और बारूदी रोड़ा अटका दिया है, जिसने व्हाइट हाउस के पसीने छुड़ा दिए हैं।
लियोन पैनेटा की चेतावनी: “विनाशकारी दिशा में बढ़ रहा है अमेरिका”
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप भले ही इस दलदल को दुनिया से छिपाने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन पूर्व अमेरिकी रक्षा सचिव लियोन पैनेटा ने सच का आईना दिखा दिया है। पैनेटा के मुताबिक:
“ईरान युद्ध काफी हद तक वियतनाम युद्ध जैसा होता जा रहा है। वियतनाम में हमने वर्षों बातचीत की, लेकिन अंत में उत्तरी वियतनाम ने पूरे क्षेत्र पर नियंत्रण कर लिया और हम जैसे-तैसे अपनी सेनाओं को सुरक्षित निकाल पाए थे। यह युद्ध भी उसी विनाशकारी दिशा में आगे बढ़ रहा है।”
हालांकि, ट्रंप ने NBC को दिए इंटरव्यू में इन दावों को खारिज करते हुए कहा, “ईरान पर बहुत तेजी से कार्रवाई की जा रही है। तीन महीने बीत चुके हैं और हम इसी महीने इसका अंत चाहते हैं। ईरान कभी परमाणु हथियार हासिल नहीं कर पाएगा।” लेकिन जानकारों का मानना है कि ट्रंप अपनी साख बचाने के लिए पर्दे के पीछे से एक ऐसा खुफिया ऑपरेशन चला रहे हैं, जो इस युद्ध को और घातक मोड़ पर ले जाएगा।
‘ऑपरेशन मलबे से यूरेनियम’: ओक रिज लैब में बना सीक्रेट ब्लूप्रिंट
दावा है कि ट्रंप के खास दूत विटकॉफ और कुशनर इस समय ‘HEU एक्सट्रैक्शन ऑपरेशन’ को लीड कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने टेनेसी स्थित दुनिया की सबसे एडवांस ‘ओक रिज नेशनल लेबोरेटरी’ का दौरा किया है। यहाँ जुटे 100 शीर्ष वैज्ञानिकों ने एक ‘मोबाइल यूरेनियम तकनीक’ का ब्लूप्रिंट तैयार किया है।
अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक, जून 2025 में हुए ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ के दौरान इस्फहान परमाणु केंद्र पर भीषण बमबारी की गई थी, लेकिन यूरेनियम नष्ट होने के बजाय मलबे और पहाड़ों की गहराई में सुरक्षित दब गया। अब इसे निकालने के लिए अमेरिका 4 बेहद जटिल चरणों पर काम कर रहा है:
[चरण 1: साइट मुआयना] ➔ अंडरग्राउंड प्लांट की सुरंगों और यूरेनियम कंटेनर्स का सटीक पता लगाना।
[चरण 2: रेडियोलॉजिकल सर्वे] ➔ विकिरण (Radiation) के स्तर और ढांचागत जोखिम की जांच करना।
[चरण 3: एक्सपर्ट्स की एंट्री] ➔ न्यूक्लियर वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की स्पेशल टीम को प्लांट में भेजना।
[चरण 4: रोबोटिक निष्कासन] ➔ 'मोबाइल प्रोसेसिंग यूनिट' और रोबोटिक हाथों से यूरेनियम की पैकेजिंग व लोडिंग।
इस ऑपरेशन में इंसानों की जान को खतरे से बचाने के लिए रिमोट कंट्रोल और पूरी तरह से ऑटोमैटिक (मैनलेस) ट्रकों का इस्तेमाल किया जाएगा, जो यूरेनियम को सुरक्षित अमेरिकी ठिकानों तक पहुंचाएंगे।
ईरान की दो टूक: ‘कागजी वादों पर नहीं झुकेंगे, पहले 24 बिलियन डॉलर दो’
अमेरिका का यह हाई-टेक प्लान जमीन पर तभी उतर सकता है जब ईरान इसके लिए तैयार हो, और ईरान ने साफ कर दिया है कि वह झुकने वाला नहीं है। मुज्तबा खामेनेई के सैन्य सलाहकार मोहसिन रिजाई ने एक इंटरव्यू में दो टूक कहा:
“बातचीत पूरी तरह से गतिरोध में फंस चुकी है और गेंद अब ट्रंप के पाले में है। जब तक हमारी फ्रीज की गई संपत्ति की शर्तें पूरी नहीं होतीं, कोई समझौता नहीं होगा। MoU (सहमति पत्र) साइन होते ही हमें 24 बिलियन डॉलर में से 12 बिलियन डॉलर तुरंत चाहिए और बाकी के 12 बिलियन डॉलर अगले दो महीनों के भीतर रिलीज होने चाहिए।”
इसके अलावा ईरान ने अमेरिका और इजरायल से भारी मुआवजे की मांग भी की है। साफ है कि परमाणु ढांचे पर पेच पूरी तरह फंस चुका है। ट्रंप भले ही अपनी सफलता का ढिंढोरा पीट रहे हों, लेकिन हकीकत यह है कि वाशिंगटन के कूटनीतिक गलियारों में सन्नाटा पसरा है। अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या ट्रंप इस न्यूक्लियर थ्रिलर के चक्रव्यूह से अपनी साख बचाकर निकल पाते हैं, या ईरान वाकई उनके लिए दूसरा वियतनाम साबित होने जा रहा है।


