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कमिश्नर जांच में दोषी मिला यूपी का ये कृषि विश्वविद्यालय

प्रमुख संवाददाता

लखनऊ. चन्द्रशेखर आज़ाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय कानपुर के खिलाफ शिकायतों का अम्बार है. शिकायतें होती रहती हैं. जांच भी होती है. जांच की रिपोर्ट भी विश्वविद्यालय प्रबंधन के खिलाफ ही आती है लेकिन यह जांच रिपोर्ट कहाँ चली जाती हैं यह बताने वाला कोई नहीं है.

कानपुर मंडल के कमिश्नर डॉ. राज शेखर ने 19 जनवरी 2021 को विशेष सचिव कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान विभाग को ताज़ा जांच रिपोर्ट भेजी है. यह जांच एमएलसी रमेश मिश्र की मांग पर की गई है. इस जांच में कई मुद्दे शामिल किये गए थे. सभी मुद्दों में विश्वविद्यालय प्रशासन को दोषी भी ठहराया गया है.

जांच रिपोर्ट में शिकायतों का जो जवाब विश्वविद्यालय की तरफ से आया है उन्हीं से यह स्पष्ट हो जाता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन को शिकायतें और जांचें बिलकुल फ़िज़ूल का मुद्दा लगती हैं.

शिकायत करने वाले का कहना है कि 27 जुलाई 2009 को चन्द्रशेखर आज़ाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय ने जनसूचना जारी की थी. जिसमें बताया गया था कि डॉ. पी.के.सिंह सेलकर और डॉ. राम कृष्ण 1993 से स्टे के आधार पर विश्वविद्यालय में कार्यरत रहे. कोर्ट ने अनियमित नियुक्ति पर 1993 में स्टे लगाया था. 93 से 2009 तक स्टे के आधार पर नौकरी करते हुए इन्होंने सहायक प्रोफ़ेसर से प्रोफ़ेसर तक प्रमोशन भी हासिल कर लिए.

इस शिकायत के जवाब में विश्वविद्यालय ने बताया कि विश्वविद्यालय में वर्ष 2001 में विधिक प्रकोष्ठ का गठन हुआ था. इससे पहले कोर्ट में मामलों की पैरवी निदेशक प्रशासन और मानीटरिंग कार्यालय के सहायक करते थे. वर्ष 1993 से 96 के बीच 16 वैज्ञानिकों और शिक्षकों ने कुलाधिपति के आदेश के खिलाफ स्टे ले लिया था. इस स्टे के आधार पर वह 2015 तक विश्वविद्यालय में कार्यरत रहे लेकिन क्योंकि विश्वविद्यालय ने इस स्टे के खिलाफ कोर्ट में प्रतिशपथपत्र ही दाखिल नहीं किया इसलिए कोर्ट ने वादी के पक्ष में फैसला सुना दिया. जांच कमेटी ने विश्वविद्यालय द्वारा कोर्ट में प्रभावी पैरवी न करने के लिए उसे दोषी माना है.

याचिका संख्या 874 / 1996 के बारे में शिकायतकर्ता ने बताया कि यह याचिका 17 दिसम्बर 2009 को डिस्पोज़ कर दी गई. कोर्ट ने बताया कि विश्वविद्यालय ने न तो इस मामले में पैरवी की और न ही काउन्टर ही दाखिल किया.

इस सम्बन्ध में विश्वविद्यालय ने बताया कि याचिका संख्या 874 डॉ. मिथिलेश वर्मा बनाम कुलाधिपति मामले में साल 1995 में कोर्ट ने स्टे देते हुए प्रतिवादियों को प्रतिशपथपत्र दाखिल करने को कहा था लेकिन विश्वविद्यालय ने प्रतिशपथपत्र दाखिल नहीं किया इसका नतीजा यह हुआ कि कोर्ट ने 17 दिसम्बर 2009 को इस याचिका को निस्तारित कर दिया. जांच टीम ने इस मामले में कोर्ट में पैरवी न किये जाने की वजह से विश्वविद्यालय को ही दोषी माना.

शिकायतकर्ता ने यह शिकायत भी की कि यशपाल मालिक बनाम सीएसए मामला इस वजह से डिस्पोज़ हो गया क्योंकि सीएसए विश्वविद्यालय ने न तो कोर्ट में काउन्टर लगाया और न ही पैरवी की. इस शिकायत के जवाब में विश्वविद्यालय ने यह माना कि इस मामले में 19 अक्टूबर 1995 को कोर्ट ने स्टे देते हुए विश्वविद्यालय को प्रतिशपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया था लेकिन क्योंकि प्रतिशपथपत्र दाखिल नहीं किया गया इसलिए कोर्ट ने 17 दिसम्बर 2009 को इस याचिका को निस्तारित कर दिया. जांच अधिकारियों ने इस मामले में भी विश्वविद्यालय प्रशासन को दोषी ठहराया है.

शिकायतकर्ता ने डॉ. अरविन्द कुमार सिंह बनाम कुलाधिपति मामले में भी विश्वविद्यालय द्वारा कोर्ट में पैरवी न करने का आरोप लगाया गया. विश्वविद्यालय ने भी यह स्वीकार किया कि इस मामले में कोर्ट ने विश्वविद्यालय को प्रतिशपथपत्र दाखिल करने के साथ अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी किये थे. प्रतिवादियों ने इस मामले में प्रतिशपथपत्र दाखिल नहीं किया नतीजा यह हुआ कि कोर्ट ने इस याचिका को भी निस्तारित कर दिया. जांच अधिकारियों ने इस मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन को याचिकाओं में प्रभावी पैरवी न करने का दोषी पाया.

शिकायतकर्ता ने विश्वविद्यालय में नियुक्त 15 वैज्ञानिकों की नियुक्तों को नियम विरुद्ध बताया. शिकायतकर्ता ने कहा कि यह वैज्ञानिक 15 साल तक स्टे के आधार पर विश्वविद्यालय में नौकरी करते रहे लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन को न कोर्ट में पैरवी का समय मिला और न ही काउन्टर दाखिल करना ज़रूरी समझा गया जबकि विश्वविद्यालय के पास वकीलों का एक पैनल भी है जिन्हें फीस अदा की जाती है.

इस शिकायत के जवाब में विश्वविद्यालय ने बताया कि यह वैज्ञानिक हाईकोर्ट से स्टे के आधार पर विश्वविद्यालय में कार्यरत रहे. विश्वविद्यालय ने कोर्ट में प्रतिशपथपत्र दाखिल नहीं किया. हालांकि कुलपति ने इस मामले में 15 जून 2020 और आठ अक्टूबर 2020 को कुलसचिव को पत्र लिखकर वकीलों के ज़रिये प्रभावी कार्रवाई के लिए कहा था.

जांच अधिकारियों ने इस मामले में यह पाया कि कुलपति ने कुलसचिव को पत्र तो लिखे लेकिन प्रभावी कार्रवाई के लिए समय पर प्रतिशपथपत्र दाखिल नहीं किया गया.

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शिकायतकर्ता ने अपनी शिकायत में यह मुद्दा भी उठाया कि जो वैज्ञानिक, शिक्षक और दूसरे लोग स्टे के आधार पर नौकरी कर रहे थे उन्हें प्रमोशन कैसे मिले और उनकी नियुक्तियां प्रशासनिक पदों पर कैसे हो गईं.

इस शिकायत के जवाब में कुलसचिव का कहना है कि कोर्ट ने जब इन्हें निरंतर काम करने के आदेश दिए तो नियमानुसार इन्हें प्रमोशन भी दिए गए. जांच अधिकारियों ने इस मामले में कोर्ट में सही तरीके से पैरवी न करने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन को दोषी माना है.

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