Sunday - 27 September 2020 - 3:37 PM

इनको कश्मीरी पंडितों का दर्द महसूस क्यों नहीं होता ?

राजीव ओझा

आजादी-आजादी चिल्लाने, शाहीनबाग-शाहीनबाग खेलने और सीएए और एनआरसी के विरोध में पतंग उड़ाने से कुछ नहीं होगा। विरोध करने वाले मुस्लिम उसी तरह देशद्रोही नहीं हैं जिस तरह नागरिकता संशोधन क़ानून का समर्थन करने वाले मुस्लिम विरोधी नहीं हैं। लेकिन समर्थन और प्रदर्शन के इस शोर में 19 जनवरी को कश्मीरी पंडितों का “विस्थापना दिवस” चुपचाप बीत गया।

शहर-शहर सीएए और एनआरसी विरोध की तख्ती लेकर धरना देने वालों को अभी नहीं समझ आ रहा क्योंकि इन्होंने अपने देश में रिफ्यूजी बन कर रहने का दंश नहीं झेला, इनकी आँखों के सामने इनकी मां, बहन और बेटी का रेप नहीं हुआ, हत्या नहीं हुई, इनका घर नहीं लूटा गया। ये कश्मीर की आज़ादी-आजादी तो चिल्लाते हैं लेकिन 30 साल पहले कश्मीर से बेघर कर दिए गए 4 लाख से अधिक कश्मीरी पंडितों के लिए इनके मुहं से एक शब्द नहीं निकलता, आखिर क्यों? क्या सिर्फ इसलिए कि ये विस्थापित हिन्दू हैं, मुसलमान नहीं।

ऐसी स्थिति में इनको क्या भेदभाव का आरोप लगाने का नैतिक अधिकार है? स्वरा भास्कर जैसे बनावटी लोग जो कश्मीर की आजादी और कश्मीरियों के अधिकार की बात करते हैं, लेकिन शाहीनबाग में धरने के समर्थन में इन बेघर कश्मीरियों को बुलाने में इनको शर्म और ग्लानी नहीं महसूस होती। इनको पड़ोसी मुस्लिम देशों और मुस्लिम बहुल कश्मीर से धर्म के आधार पर सताये, भगाए गए शरणार्थियों और अवैध रूप से भारत में आये घुसपैठियों में कोई फर्क इस लिए नजर नहीं आता क्योंकि ज्यादातर घुसपैठिये मुस्लिम हैं।

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यहाँ बात हिन्दू-मुस्लिम की नहीं, दोहरी सोच की है। अभी तक भारत के मुसलमान नागरिकों के लिए देश में रहने के हालात, दुनियाभर के किसी भी इस्लामिक देश में रहने वाले मुसलमानों से कहीं बेहतर थे। यह भारतीय मुसलमान भी मानते हैं। लेकिन अचानक उनके मन में डर बैठा कर उनको भड़काया जा रहा। समर्थन और प्रदर्शन के बीच मुसलमानों को यह समझना होगा कि कहीं वह एकतरफा सोच के शिकार तो नहीं?

सीएए, एनआरसी और एनपीआर इस लिए जरूरी है क्योंकि घुसपैठिये भारतीय नागरिकों का हक़ छीन लेंगे। इसमें मुस्लिम नागरिकों का हक़ भी शामिल है।

चिंता की बात है कि मुसलमानों को आगे कर राजनीति करने वालों को चार लाख से अधिक कश्मीरी विस्थापित नहीं दिख रहे लेकिन उन्हें घुसपैठियों को स्थापित करने की चिंता सता रही। कारण बिलकुल साफ़ है। इन तथाकथित मुस्लिम हितैषी नेताओं की नजर अपने वोटबैंक पर है। इस वोट की राजनीति का खामियाजा हिन्दू और मुसलमान दोनों को भुगतना पड़ेगा। उसी तरह जैसे समाज रूपी शरीर जब बीमार रहेगा तो उसका असर शरीर के सभी अंगों पर होगा। भारतीय मुसलमानों को यह भी समझना होगा कि जो घुसपैठिया है, भले ही वह मुसलमान ही क्यों न हो, वह इस लिए चोरी छिपे घुसा है क्योंकि वह आराम की जिन्दगी जी सके। उनके आराम की कीमत मुसलमानों को भी चुकानी पड़ेगी।

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पिछले कुछ दिनों में पूरे उत्तर भारत में काफी ठण्ड पड़ी, बारिश भी अच्छी खासी हुई। शाहीनबाग, इलाहाबाद, आगरा और अब उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ जैसे और भी कई शहर हैं जहां सीएए और एनआरसी के विरोध में प्रदर्शन के कारण माहौल में गरमी है। इसमें दिल्ली विधान सभा चुनाव की गर्मी भी शामिल है। कुल मिला कर मीडिया के लिए सहालग है, हर तरह की खबरे हैं।

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समाज और मीडिया ‘भक्त’ और ‘एंटी’ भक्त में बंट गया है। पहाड़ी क्षेत्रों में बर्फ की मोटी परत है। ये बर्फ कुछ दिन में पिघल जाएगी लेकिन आम लोगों से जुड़ी समस्याओं और असली मुद्दों पर, गर्म सियासी माहौल के बावजूद बर्फ की परत मोटी होती जा रही है जो आसानी से पिघलने वाली नहीं। इसी वजह से 19 जनवरी बीत गई लेकिन कश्मीरी पंडितों का दर्द इन प्रदर्शनकारियों को नहीं महसूस हुआ। ऐसे में क्यों न माना जाये कि इन अन्दोलनकारियों की सोच भी पक्षपातपूर्ण है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, लेख में उनके निजी विचार हैं)

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